मॉनसून की लगातार बारिश ने पहाड़ी राज्य उत्तराखंड को संकट की स्थिति में धकेल दिया है, जहां नदियां खतरनाक रूप अख्तियार कर लिया है. कई जिलों में बाढ़ जैसे हालात हैं. पिछले 24 घंटों में ही, राज्य में सामान्य से 424 फीसदी ज्यादा बारिश दर्ज की गई, यानी 70.3 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश केवल 13.4 मिमी होती है.
घाटी के कुछ सबसे ज़्यादा प्रभावित ज़िलों में सामान्य से कहीं ज़्यादा बारिश दर्ज की गई है. बागेश्वर में सामान्य से करीब 15 गुना ज़्यादा बारिश हुई, जबकि अल्मोड़ा और उधम सिंह नगर में सामान्य से दस गुना से ज़्यादा बारिश हुई, जिससे ये सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाकों में शामिल हो गए.
लेकिन यह सिर्फ़ एक दिन की बात नहीं है. अगस्त के पहले पांच दिनों में, उत्तराखंड में इस वक्त की सामान्य वर्षा की तुलना में कुल वर्षा में 97 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
उफान पर नदियां...
मौजूदा मौसम का असर नदियों के बढ़ते जलस्तर में दिखाई दे रहा है. केंद्रीय जल आयोग (https://ffs.india-water.gov.in/#/) के बाढ़ निगरानी आंकड़ों से पता चलता है कि अलकनंदा, सरयू और धौलीगंगा जैसी नदियां अब चेतावनी और खतरे के निशान से काफी ऊपर बह रही हैं, जो बाढ़ की स्थिति के बिगड़ने का इशारा है. अब तक, ग्यारह निगरानी केंद्रों ने गंभीर या सामान्य से ज्यादा स्थिति की जानकारी दी है.
हरिद्वार और ऋषिकेश में गंगा नदी खतरे के निशान को पार कर गई है और अब 'गंभीर बाढ़' के स्तर पर है. इसी तरह, बागेश्वर में, घाट स्टेशन पर सरयू नदी खतरे के निशान 465 मीटर को पार कर 466.6 मीटर तक पहुंच गई है, जो निशान से एक मीटर से ज़्यादा ऊपर है.
नदियों के जलस्तर में यह बढ़ोतरी सीधे तौर पर पूरे सूबे में देखी जा रही अत्यधिक वर्षा से जुड़ी है. इस बीच, कई अन्य नदी घाटियां खतरे के स्तर के करीब पहुंच रही हैं. रुद्रप्रयाग में अलकनंदा, सत्यनारायण में सोंग और डोसनी में सोलानी जैसी नदियां अपने चेतावनी स्तर को पार कर चुकी हैं, जबकि रामगंगा, गौरी गंगा और धौलीगंगा का जलस्तर भी लगातार बढ़ रहा है.
मंगलवार को उत्तरकाशी के धराली गांव में अचानक और तेज़ बाढ़ आई, जिसने पुलों और घरों को बहा दिया और कई जानें ले लीं. ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, करीब पांच लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और दर्जनों लोग अभी भी लापता हैं.
हालांकि, शुरुआती रिपोर्ट्स में इस त्रासदी को बादल फटने के कारण बताया गया था, लेकिन नई सैटेलाइट इमेज और मौसम संबंधी आंकड़ों से एक अलग वजह के बारे में मालूम चला है. अब एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह त्रासदी ऊपरी नदी में हिमनद झील के फटने से आई बाढ़ (GLOF) की वजह से हुई होगी.
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औसत के काफी ज्यादा बारिश...
उत्तरकाशी में पांच दिनों में अत्यधिक वर्षा दर्ज नहीं की गई, फिर भी एक ही दिन में औसत से 99 फीसदी ज्यादा वर्षा दर्ज की गई. पांच दिनों में, वर्षा सामान्य से केवल 13 प्रतिशत ज्यादा रही, लेकिन यह ज़िला अपनी खड़ी ढलान और ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों के पास स्थित होने की वजह से अभी भी संवेदनशील बना हुआ है.
पिछले कुछ साल में मौसम से जुड़ी बड़ी घटनाएं बढ़ी हैं. साल 2024 में, उत्तराखंड में 106 दिन चरम मौसम की घटनाएं देखी गईं और 85 मौतें हुईं. 2025 के पहले तीन महीनों में ही ऐसे 13 दिन हो चुके होंगे, जिनमें 12 मौतें हुई होंगी.
उत्तरकाशी में उभरता संकट जहां सुर्खियां बटोर रहा है, वहीं नदियों का बढ़ता जलस्तर भी उतना ही चिंताएं पैदा कर रहा है. बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही है, उत्तराखंड एक और मानसूनी आपदा की ओर बढ़ रहा है.