कायदे-कानून को ताक पर रखकर देश के तमाम राज्यों में यात्रियों की जिंदगी से खुल्लम-खुल्ला खिलवाड़ हो रहा है. पूरा खेल परमिट की आड़ में चल रहा है. हम आपको सड़कों पर दौड़ रही स्लीपर बसों का डरावना सच दिखा रहे हैं कि कैसे यात्रियों से पूरा पैसा वसूला जाता है, लेकिन सुरक्षा की गारंटी के नाम पर आंखों में धूल झोंकने का खेल चल रहा है.
बस ऑपरेटर सुरक्षा मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं, सवाल यात्रियों की जिंदगी का है लिहाजा जरूरी है, जिम्मेदारों की नींद तोड़ना. आज हम उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली और पंजाब के परिवहन मंत्रियों से सवाल पूछ रहे हैं, आखिर स्लीपर बसों को जान लेने का परमिट कब तक मिलता रहेगा?
'आजतक' की टीम जब सरकारी दावों की पड़ताल करने निकली, तो दिल्ली से राजस्थान तक, मध्य प्रदेश से पंजाब तक, स्लीपर बसों में मौजूद सुरक्षा इंतजामों की रोंगटे खड़े कर देने वाली हकीकत कैमरे में कैद हुई. ये हालात तब हैं जब देश की संसद में सरकार ने माना कि बीते तीन सालों में 64 यात्रियों की मौत स्लीपर बस में जिंदा जलने से हुई. देश के केंद्रीय परिवहन मंत्री मौत का गोला बन रही स्लीपर बसों को लेकर नए नियम बनाने का दावा करते हैं.
यही नहीं, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 27 नवंबर को सभी राज्यों के प्रमुख सचिवों से सुरक्षा इंतजामों का कड़ाई से पालन करवाने का निर्देश दिया, लेकिन जमीन पर हालात जस के तस हैं. बस ऑपरेटर खुल्लम-खुल्ला कायदे और कानून को चुनौती दे रहे हैं और लगाम लगाने वाले जिम्मेदार आंख मूंदकर बैठे हैं.
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दिल्ली की स्लीपर बसों का हाल
'आजतक' स्लीपर बसों में मौजूद सुरक्षा इंतजामों का रियलिटी चेक करने दिल्ली के मोरी गेट पहुंचा. यहां हमें सफर एक्सप्रेस की स्लीपर बस दिखी, जिसके ऊपर सामान लादा जा रहा था. कायदे-कानून के हिसाब से बस की छत पर सामान लादना गैरकानूनी है, लेकिन यहां खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. स्लीपर बस में चार इमरजेंसी एग्जिट गेट होने चाहिए, लेकिन बस ऑपरेटर की तरफ से सिर्फ आपातकाल निकासी की खानापूर्ति की गई है. यानी यात्रियों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ जारी है.
दिल्ली से चलने वाली ज्यादातर स्लीपर बसों में सुरक्षा के इंतजाम नदारद हैं, चाहे फायर अलार्म सिस्टम हो, चार इमरजेंसी एग्जिट या फिर अग्निरोधी फैब्रिक से बनी सीट और पर्दे हों. कुछ बसों में आपातकाल दरवाजे को भी बस ऑपरेटरों ने सीट लगाकर घेर रखा है, मतलब यही है कि दिल्ली से चलने वाली ज्यादातर स्लीपर बसों में यात्री भगवान भरोसे सफर कर रहे हैं.
राजस्थान में भी ऐसे ही हालात
राजस्थान में भी यही हालात हैं. मंत्री का दावा यही है कि राजस्थान में चलने वाली स्लीपर बसों में सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन हो रहा है क्योंकि यात्रियों की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है. लेकिन मंत्री के दावे और कायदे-कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं.
बस में मौजूद कर्मचारी ने दावा किया कि मालिक के आदेश पर उसने इमरजेंसी एग्जिट गेट पर सीट लगा दी. यही नहीं, बस में सुरक्षा से जुड़े दूसरे इंतजाम भी मौजूद नहीं हैं. यह हाल सिर्फ एक बस का नहीं है, दूसरी स्लीपर बस में भी यात्रियों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ जारी है. न बस में तय मानकों के हिसाब से हथौड़ा है, न इमरजेंसी एग्जिट है और न ही अग्निशमन यंत्र.
स्लीपर बसों में सुरक्षा इंतजाम के लिए सरकारी गाइडलाइन हैं. स्लीपर बसों में चार आपातकाल निकासी गेट होने चाहिए. किसी अनहोनी से निपटने के लिए स्लीपर बस में फायर अलार्म सिस्टम होना चाहिए. बस में अग्निशमन यंत्र होना चाहिए. स्लीपर बस में ऐसे कपड़ों और फैब्रिक का इस्तेमाल होना चाहिए, जिसमें आग न लगे. यहां तक कि स्लीपर बस में ड्राइवर और यात्रियों के बीच कोई केबिन नहीं होना चाहिए. कायदे और कानून तो हैं, लेकिन परिवहन विभाग की अनदेखी का नतीजा है कि बस ऑपरेटर परमिट लेकर यात्रियों की जिंदगी से खेल रहे हैं.
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मध्य प्रदेश में भी हैरान करती है रियलिटी
मध्य प्रदेश में 5787 स्लीपर बसें रजिस्टर्ड हैं और इनमें से 3472 बसें एसी बस हैं. भोपाल से रात के वक्त महाराष्ट्र के बड़े शहरों मुंबई, पुणे, नागपुर के लिए बसें रवाना होती हैं. इसके साथ-साथ गुजरात से लेकर यूपी और राजस्थान से लेकर दूसरे राज्यों के लिए भी स्लीपर बसें चलती हैं.
'आजतक' ने भोपाल से नागपुर जाने वाली एक स्लीपर बस का रियलिटी चेक किया तो नतीजे चौंकाने वाले थे. स्लीपर बस में इमरजेंसी गेट है लेकिन वह खुलता नहीं. समझौता सिर्फ इमरजेंसी गेट के साथ नहीं बल्कि सुरक्षा के दूसरे मानकों के साथ भी किया गया है. यही नहीं, स्लीपर बस का डिजाइन ऐसा है कि हादसे की स्थिति में यात्रियों का बच पाना असंभव है. हमारे रियलिटी चेक में भोपाल से चल रही स्लीपर बस सुरक्षा के हर मानक पर फेल साबित हुई.
यूपी-चंडीगढ़ में भी नियम ताक पर
'आजतक' ने लखनऊ में स्लीपर बसों में मौजूद सुरक्षा इंतजामों की पड़ताल की है. स्लीपर बसों में सुरक्षा के कायदे-कानूनों का पालन नहीं हो रहा है, यही तस्वीर लखनऊ के ट्रांसपोर्ट नगर से चलने वाली स्लीपर बसों में भी दिखी. यहां तो बस में इमरजेंसी एग्जिट के नाम पर हद ही कर दी गई, गेट से सटाकर सीट मिली वह भी तकिए के साथ. अगर बस में आग लगी तो सवाल यही है कि यात्री इमरजेंसी निकासी का इस्तेमाल कैसे करेंगे? मतलब यही है कि सिर्फ कागजी खानापूर्ति के लिए इमरजेंसी गेट का खेल खेला जा रहा है.
चंडीगढ़ में स्लीपर बसों का कमोवेश यूपी जैसा ही हाल है. बस के अंदर जाकर देखने पर सामने आया कि कई जगह खिड़कियां बनी हुई हैं, जबकि एग्जिट गेट को लेकर भी कायदों को ताक पर रखा गया. यानी कुछ मामलों में नियमों का पालन किया गया है, तो कई जगहों पर गंभीर लापरवाही है. न तो फायर सेफ्टी, न फायर प्रोटेक्शन सिस्टम मिला, हर सीट पर हथौड़ी और अलग कंपार्टमेंट समेत इमरजेंसी एग्जिट और रिफ्लेक्टर्स के नाम पर कायदे-कानून का उल्लंघन मिला.
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स्लीपर बसों में सुरक्षा के लिए कायदे-कानून हैं, केंद्रीय परिवहन मंत्रालय की तरफ से मानक तय हैं, लेकिन सुरक्षा के मानकों को बस ऑपरेटर ठेंगा दिखा रहे हैं. यह तब है जब एक के बाद एक हादसे हो रहे हैं और ऑपरेटरों की मनमानी आम यात्रियों की मौत का सबब बन रही है. बावजूद इसके, परिवहन विभाग की अनदेखी आज बस ऑपरेटरों के लिए अंधेरगर्दी का लाइसेंस बनी हुई है. अब देखना यही है कि आखिर कब जिम्मेदारों की नींद टूटेगी.
(जयपुर से शरत कुमार, लखनऊ से समर्थ श्रीवास्तव, दिल्ली से हिमांशु मिश्रा, चंडीगढ़ से अमन भारद्वाज और भोपाल से रवीश पाल सिंह की रिपोर्ट)