सबरीमाला सहित कई धार्मिक मामलों में कोर्ट के दखल पर सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9‑जजों की संविधान पीठ ने 9वें दिन सुनवाई की. इसमें संवैधानिक नैतिकता बनाम धार्मिक स्वतंत्रता (संविधान के अनुच्छेद 25‑26) पर गहन बहस हुई.
कोर्ट ने कहा कि सामाजिक सुधार और परंपरा के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता. लेकिन आस्था के नाम पर मूर्ति छूने या मंदिर परिसर में दाखिले से रोकना भी भेदभाव है और संवैधानिक रूप से गलत है.
सुनवाई के दौरान पीठ ने संकेत दिया कि सभी प्रथाएं अनिवार्य धार्मिक प्रथाएं नहीं हैं. कोर्ट यह निर्धारित कर रहा है कि क्या धार्मिक आस्थाएं नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं?
9वें दिन की सुनवाई में बौद्ध अनुयायियों के वकील ने दलील दी कि सबरीमाला मंदिर दरअसल बौद्ध पैगोडा है. वहीं अश्विनी उपाध्याय ने तर्क दिया कि पिछले 2000 सालों में संप्रदायगत संघर्षों के कारण भारत 25 हिस्सों में बंटा, और पिछले 200 सालों में भारत 7 देशों में विभाजित हो गया.
यह कहते हुए कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, उन्होंने कहा कि पीठ को अपने फैसले के परिणामों का आकलन करना होगा. अगले 25 सालों में हम चीन, सिंगापुर या जापान जैसे वैज्ञानिक रूप से एकीकृत देश बनेंगे, या पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश जैसे देशों की तरह बन जाएंगे.
इन अप्रासंगिक और विषय से हटकर दलीलें देने पर पीठ ने उपाध्याय को फटकार लगाई. जस्टिस आर महादेवन ने उपाध्याय से कई बार कहा कि वे अपनी दलीलों को केवल विचाराधीन मुद्दों तक सीमित रखें. कोर्ट में बहस का मुख्य केंद्र यह है कि क्या निजी स्वतंत्रता यानी महिलाओं का मंदिर प्रवेश या अन्य संप्रदाय के धार्मिक अधिकारों पर वरीयता मिलनी चाहिए.
कोर्ट के लिए यह सबसे मुश्किल काम है कि वह सदियों पुरानी आस्था को सही या गलत ठहराए. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा कि क्या संविधान उस श्रद्धालु की रक्षा नहीं करेगा, जिसे मूर्ति छूने की इजाजत नहीं है? कोर्ट यह तय करेगा कि राज्य की शक्ति धार्मिक मामलों में कितनी हस्तक्षेप कर सकती है. यह सुनवाई सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं के खतना और अन्य धार्मिक प्रथाओं से संबंधित 2018 के फैसले की समीक्षा के लिए भी की जा रही है.