राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि जाति आधारित राजनीति तभी खत्म होगी, जब समाज जातिगत पहचान से ऊपर उठेगा. उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण से समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी तक, सरकार की नीतियों के क्रियान्वयन के लिए जनसहयोग को जरूरी बताया. मोहन भआगवत ने अलग-अलग धर्म और संप्रदाय के बीच सौहार्द की भी अपील की. वह गुरुवार को कर्नाटक के मैसुरु में संवाद सत्र में बोल रहे थे.
संघ प्रमुख ने कहा कि सामाजिक जीवन में समानता केवल नारों से नहीं, बल्कि व्यवहार से लागू होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि समाज जाति को याद रखता है, इसलिए राजनेता उसका फायदा उठाते हैं. उनका वैध उद्देश्य वोट हासिल करना होता है. मोहन भागवत ने कहा कि अगर वे काम के आधार पर वोट नहीं ले सकते, तो जाति के आधार पर वोट लेंगे. राजनीति बदलने से पहले समाज को खुद बदलना होगा.
उन्होंने कहा कि समाज को जाति भूलनी होगी, तब राजनीति अपने आप सुधर जाएगी. मोहन भागवत ने कहा कि लोगों से केवल यह मत कहिए कि जाति भूल जाओ. ऐसा कहने पर वे जाति भूलने की कोशिश में भी जाति को याद रखेंगे. ऐसा व्यवहार कीजिए मानो जाति का अस्तित्व ही नहीं है. उन्होंने अंतरजातीय सामाजिक संबंध, अंतरजातीय विवाह का समर्थन करते हुए 1942 में हुए महाराष्ट्र के एक अंतरजातीय विवाह का उल्लेख किया और कहा कि इसे व्यक्तिगत बंधन नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए.
संघ प्रमुख ने कहा कि महाराष्ट्र में हुए इस पहले अंतरजातीय विवाह के लिए दो प्रमुख व्यक्तियों ने शुभकामना संदेश भेजे थे. एक थे भीमराव आंबेडकर और दूसरे थे गुरु गोलवलकर. उन्होंने धार्मिक सौहार्द पर कहा कि अलग-अलग परंपराओं और तरीकों के बावजूद सभी धर्म सत्य की ओर ले जाने का प्रयास करते हैं. समुदाय और धर्म हमें रखने ही होंगे. मोहन भागवत ने संस्कृत के एक श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग रास्ते आखिरकार उसी मंजिल तक पहुंचते हैं, जैसे नदियां समुद्र में मिल जाती हैं.
उन्होंने कहा कि धर्मों को यह समझना चाहिए कि मंजिल एक ही है और उनमें समन्वय और सहयोग होना चाहिए. मानवता के अस्तित्व के लिए यह जरूरी है. इसका कोई विकल्प नहीं है. मोहन भागवत ने हिंदू परंपराओं और आचरण पर बोलते हुए कहा कि रीति-रिवाज और संप्रदाय अलग हो सकते हैं, लेकिन धर्म आधारित व्यवहार ही सबसे महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि धर्म का उद्भव आचरण से होता है और संयम, अनुशासन, नैतिक व्यवहार उसके मूल तत्व हैं. हिंदू समाज को अपने आदर्श व्यवहार के जरिए अपनी परंपराओं को संरक्षित रखना चाहिए.
मोहन भागवत ने कहा कि भारत ने बार-बार आंतरिक विभाजनों के कारण अपनी स्वतंत्रता खोई है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय विकास और सामाजिक समरसता के लिए बंधुत्व की भावना बहुत जरूरी है. डॉक्टर आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि हम इसी तरह लड़ते रहे, तो अपनी स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर पाएंगे. मोहन भागवत ने कहा कि संविधान भी हमसे भावनात्मक एकता को बढ़ावा देने के लिए कहता है. वह भावना क्या है? यह भावना कि हम सब एक हैं. भारतीय सभ्यता समाज और राष्ट्र को पश्चिमी दृष्टिकोण से अलग तरीके से देखती है.
उन्होंने कहा कि यह सार्वभौमिक एकता के सिद्धांत पर आधारित है. भारतीय समाज पीढ़ियों से साथ रहने वाले लोगों के साझा उद्देश्य और भावनात्मक संबंधों से विकसित होता है. मोहन भागवत ने स्वामी विवेकानंद का उल्लेख करते हुए कहा कि हर राष्ट्र के पास दुनिया को देने के लिए एक संदेश होता है. हर राष्ट्र का एक मिशन होता है और हर राष्ट्र की एक नियति होती है, जिसे उसे पूरा करना होता है. उन्होंने कहा कि भारत में राष्ट्र की अवधारणा केवल राज्य पर नहीं, बल्कि लोगों और भूमि के बीच संबंध पर आधारित है.
जनसंख्या नियंत्रण पर क्या बोले भागवत
जनसंख्या नियंत्रण विधेयक और समान नागरिक संहिता को लेकर एक सवाल पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि आरएसएस सरकार नहीं, बल्कि एक सामाजिक संगठन है. किसी भी कानून की सफलता जनता की भागीदारी पर निर्भर करती है. उन्होंने कहा कि सबसे पहले लोगों को शिक्षित करना होगा. नीति जरूरी है, लेकिन नीति तभी सफल होगी जब जनता का सहयोग मिलेगा. इमरजेंसी के समय लागू जनसंख्या नियंत्रण उपायों का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि आक्रामक तरीके से लागू की गई नीतियों ने लोगों में नाराजगी पैदा की थी. उसका राजनीतिक नुकसान भी हुआ.
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उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा था, जब लोगों को जबरन नसबंदी के लिए ले जाया गया. बाद में वह सरकार पूरी तरह हार गई. मोहन भागवत ने कहा कि भविष्य की जनसंख्या नीतियां बनाते समय जनसांख्यिकीय असंतुलन, महिलाओं की शिक्षा, सशक्तिकरण और स्वास्थ्य जैसे पहलुओं पर भी विचार होना चाहिए. उन्होंने कहा कि जब एक बार नीति तय हो जाए और लोगों को उसके बारे में शिक्षित कर दिया जाए, तो वह बिना किसी अपवाद के सब पर समान रूप से लागू होनी चाहिए.
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यूसीसी पर संघ प्रमुख ने कहा कि कुछ राज्य पहले ही इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं. उन्होंने कहा कि उत्तराखंड ऐसा कानून ला चुका है और कुछ अन्य राज्यों ने भी इसी तरह के कदम उठाए हैं. यह राज्य दर राज्य यह आगे बढ़ रहा है. मोहन भागवत ने कहा कि संभव है कि एक दिन यह पूरे भारत में लागू हो जाए. धैर्य रखिए. लोकतंत्र में सब कुछ धीरे-धीरे होता है, क्योंकि यहां कोई एक व्यक्ति फैसला नहीं करता. निर्णय 142 करोड़ लोग मिलकर लेते हैं.