हिमाचल प्रदेश के मैक्लोडगंज में बुधवार को तिब्बती निर्वासित सरकार के प्रमुख पेनपा त्सेरिंग ने दूसरी बार पद और गोपनीयता की शपथ ली. शपथ ग्रहण समारोह में तिब्बती समुदाय के लोगों के साथ कई अन्य मेहमान भी मौजूद रहे. शपथ के बाद पेनपा त्सेरिंग ने साफ किया कि उनकी सरकार दलाई लामा की 'मिडिल वे पॉलिसी' के तहत ही चीन के साथ बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगी.
एजेंसी के अनुसार, पेनपा त्सेरिंग ने कहा कि ये नीति अहिंसा, बातचीत और आपसी सहयोग के जरिए चीन-तिब्बत विवाद का शांतिपूर्ण समाधान निकालने पर आधारित है. उन्होंने बताया कि चीनी सरकार के साथ बैकचैनल बातचीत आगे भी धैर्य और सतर्कता के साथ जारी रहेगी, जब तक कोई स्थायी हल नहीं निकल जाता.
इसके अलावा उन्होंने चीन पर तिब्बती पहचान और संस्कृति को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया. उनका कहना हैं कि चीन तिब्बती लोगों के बीच गलत जानकारी फैलाकर उनकी एकता तोड़ने की कोशिश कर रहा है.
तिब्बती संस्कृति और धर्म को बचाने की अपील
अपने संबोधन में पेनपा त्सेरिंग ने दुनिया भर में रह रहे तिब्बतियों से अपनी भाषा, संस्कृति और धर्म को सुरक्षित रखने की अपील की. उनके मुताबिक केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) की 17वीं काशाग यानी कैबिनेट दलाई लामा के विचारों और मार्गदर्शन को प्राथमिकता देती रहेगी.
उन्होंने कहा, 'हम नियम और कानून के आधार पर समान न्याय सुनिश्चित करेंगे. सिद्धांतों पर आधारित नीतियों के जरिए सामूहिक प्रयासों को मजबूत किया जाएगा और साझा लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आगे बढ़ेंगे. केंद्रीय तिब्बती प्रशासन राजनीतिक और सामाजिक कल्याण से जुड़े कार्यक्रमों को जारी रखेगा, ताकि तिब्बती संघर्ष को लंबे समय तक मजबूती मिल सके और तिब्बत-चीन विवाद का न्यायपूर्ण समाधान निकाला जा सके.'
पेनपा त्सेरिंग ने अपनी सरकार की उपलब्धियों का श्रेय दलाई लामा के आशीर्वाद और उनके महान कार्यों को दिया. साथ ही भारत, अमेरिका और अन्य देशों की सरकारों और लोगों का तिब्बत के समर्थन के लिए आभार जताया. अपने भाषण के अंत में उन्होंने दलाई लामा की लंबी उम्र की कामना की और उम्मीद जताई कि भविष्य में तिब्बत के अंदर और बाहर रह रहे लोग फिर से एकजुट होंगे.
धर्मशाला में तिब्बती सांस्कृतिक महोत्सव
केंद्रीय तिब्बती प्रशासन की ओर से धर्मशाला के पुलिस ग्राउंड में 28 से 30 मई तक तिब्बती सांस्कृतिक महोत्सव आयोजित किया जा रहा है. इस कार्यक्रम में तिब्बती कला, संस्कृति और परंपराओं की झलक देखने को मिलेगी.
भारत दुनिया की सबसे बड़ी तिब्बती शरणार्थी आबादी का केंद्र माना जाता है. अनुमान के अनुसार, देश में करीब 80 हजार से 1 लाख तक तिब्बती शरणार्थी और उनके परिवार रहते हैं. 1959 में दलाई लामा के भारत आने के बाद से तिब्बती समुदाय ने यहां अपनी भाषा, संस्कृति और बौद्ध परंपराओं को सुरक्षित रखा है. तिब्बती निर्वासित सरकार, जो तिब्बती समुदाय का राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र मानी जाती है, मैक्लोडगंज से काम करती है. दलाई लामा ने अपनी इच्छा से सभी राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियां लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए तिब्बती नेताओं को सौंप दी थीं. इसके साथ ही धार्मिक और राजनीतिक प्रमुख के रूप में चली आ रही करीब 400 साल पुरानी परंपरा का अंत हो गया.