राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि संघ का काम बेहद अनोखा है, पूरी दुनिया में ऐसा काम नहीं है. अब तो प्रत्यक्ष रूप से इसका अनुभव हो रहा है. हिंदू संज्ञा नहीं, विशेषण है. भारत में रहने वाले सभी हिंदू ही हैं.
भागवत ने आरएसएस के 100 वर्ष पूरा होने के मौके पर मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि संघ ने पहले से तय किया कि संपूर्ण समाज को संगठित करने के अलावा संघ को और कोई दूसरा काम नहीं करना है. जिसको आप आरएसएस कहते हो, आप कैसे कहते हो पता नहीं. बहुत से लोग कहते हैं कि नरेंद्र भाई प्रधानमंत्री हैं. आरएसएस के प्रधानमंत्री हैं. उनकी एक पॉलिटिकल पार्टी है. वो बीजेपी है, जो अलग है. उसमें बहुत स्वयंसेवक है, प्रभावी भी हैं.
उन्होंने कहा कि संघ किसी दूसरी संस्था की प्रतिस्पर्धा में नहीं निकला है, न ही किसी रिएक्शन या विरोध में निकला है. हमारा काम बिना किसी के विरोध किए है. संघ को लोकप्रियता नहीं चाहिए. संघ को पावर नहीं चाहिए. जितने भी भले काम देश में हो रहे हैं, वे ठीक से हो जाएं, उन्हें करने के लिए संघ है.
उन्होंने कहा कि हम लोगों का जो आपस का व्यवहार है वो सौदे पर नहीं, अपनेपन पर चलता है. हिंदुस्तान का सनातन स्वाभाव नहीं बदलता. ऋषि-मुनियों ने सोचा सब अपने हैं तो सारा ज्ञान दुनिया को देना चाहिए. भारत धर्म प्राण है, सबको साथ में चलना है. किसी को छोड़ना नहीं है. अकेले रहना है तो कोई अनुशासन नहीं है, लेकिन सबके साथ रहना है तो अनुशासन है. सृष्टि जब से चल रही है तब से धर्म से ही चल रही है.
भागवत ने कहा कि हम विश्व गुरु बनेंगे. लेकिन सिर्फ भाषणों से नहीं बल्कि उदाहरणों के जरिए. अगर आप भारतीय हैं तो ये हुनर आपको विरासत में मिला है. भारत के मुस्लिम और ईसाई भारत के हैं.
उन्होंने कहा कि भारत में चार तरह के हिंदू हैं. पहले वो जो गर्व से कहते हैं कि हम हिंदू हैं. दूसरे वो जो कहते हैं कि हम हिंदू हैं तो क्या? इसमें गर्व करने वाली क्या बात है. तीसरे, वो जो कहते हैं कि धीरे से बोलो कि हम हिंदू हैं. अगर आप हमसे घर में पूछेंगे तो हम आपको बताएंगे कि हम हिंदू हैं और चौथे, वो जो भूल गए हैं कि हम हिंदू हैं. या फिर जिन्हें भूलने को विवश किया गया है कि वे हिंदू हैं.
भागवत ने हेडगेवार का जिक्र करते हुए कहा कि संघ ने पहले से तय किया है कि संपूर्ण समाज को संगठित करने के अलावा संघ को और कोई दूसरा काम नहीं करना है. बहुत कठिन परिस्थितियों में भी डॉ. हेडगेवार ने दो बातों को कभी नहीं छोड़ा. एक, अपनी पढ़ाई में हमेशा फर्स्ट क्लास आना; दूसरा, देश के लिए जो कुछ चल रहा था उसमें सक्रिय भाग लेना. ये उनके जीवन के स्थायी कार्य थे. संघ को लोकप्रियता नहीं चाहिए. संघ को पावर नहीं चाहिए. जितने भी भले काम देश में हो रहे हैं, वे ठीक से हो जाएं, उन्हें करने के लिए संघ है.
उन्होंने कहा कि हिंदू संज्ञा नहीं, विशेषण है, भारत में रहने वाले सभी हिंदू ही हैं. धर्मनिरपेक्षता गलत शब्द है. उसे पंथनिरपेक्षता कहना चाहिए क्योंकि धर्म जीवन का आधार है.