जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने एक अंतरराष्ट्रीय विवाद पर तीखी प्रतिक्रिया दी. अपने नए किताब ‘करुणा: द पावर ऑफ कम्पैशन’ के विमोचन के दौरान उन्होंने उन खबरों की आलोचना की, जिनमें कहा गया था कि एक अन्य नोबेल विजेता ने अपना शांति पुरस्कार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सौंप दिया.
कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि यह सुनकर वे हैरान रह गए. उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कभी किसी को नोबेल पुरस्कार के लिए इतना पागल होते नहीं देखा.
सत्यार्थी ने साफ किया कि नोबेल शांति पुरस्कार कोई ऐसा सम्मान नहीं है जिसे दिया या ट्रांसफर किया जा सके. उन्होंने मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए बताया कि नोबेल समिति ने साफ कहा है कि यह सम्मान ट्रांसफरेबल नहीं होता.
सत्यार्थी ने जोर देकर कहा कि नोबेल पुरस्कार राजनीतिक समर्थन का साधन नहीं, बल्कि नैतिक अधिकार और मानवीय मूल्यों का प्रतीक है. इस पर दर्शकों ने जोरदार तालियां और हंसी से प्रतिक्रया दी.
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उन्होंने 2014 में नोबेल पुरस्कार जीतने के बाद का अनुभव साझा करते हुए बताया कि तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें बुलाकर कहा था कि वे भारत के लिए यह गौरव लेकर आए हैं.
सत्यार्थी ने इसे केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं माना, बल्कि पूरे देश को समर्पित किया. शुरुआत में इसके लिए कोई प्रोटोकॉल नहीं था, लेकिन उन्होंने आग्रह किया कि यह पदक देश की धरोहर के रूप में रखा जाए. इसके बाद एक नया प्रोटोकॉल बना और नोबेल पदक राष्ट्रपति को सौंपा गया.
कार्यक्रम के अंत में लेखक अमीश त्रिपाठी ने कहा, “कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका सम्मान पुरस्कार मिलने से बढ़ता है, जबकि कुछ ऐसे होते हैं जो पुरस्कार का सम्मान बढ़ा देते हैं.” यह बात पूरे सत्र का सार बन गई और लंबे समय तक तालियों की गूंज होती रही.