मंत्री, सांसद और विधायकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा तय करने की मांग पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की बेंच ने सुनवाई की. जिसमें चार जजों कहा कि उच्च पद पर बैठे व्यक्तियों की अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई अतिरिक्त पाबंदी की जरूरत नहीं है. वहीं मंत्री द्वारा दिए गए बयान को सरकार का बयान नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन इसी बेंच में शामिल एक और जज बीवी नागरत्ना ने एक बार फिर सभी जजों से अलग स्टेटमेंट दिया. उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी तो ठीक है, लेकिन सभी पार्टियों को यह तय भी करना होगा कि किसको क्या और कितना कहना है. पार्टियों को अपमानजनक बयानों को लेकर एक गाइडलाइन बनानी होगी.
बीते चौबीस घंटे में दो फैसलों पर अलग राय रख जस्टिस नागरत्ना ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है. अभिव्यक्ति की आजादी मामले में अपने ब्यान से पहले नोटबंदी के फैसले पर भी नागरत्ना ने अपनी अलग राय रही थी. दरअसल हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में केंद्र द्वारा किए गए नोटबंदी के फैसले को सही ठहराया. पांच जजों की बेंच में जहां 4 जजों ने फैसले को सही ठहराया तो दूसरी तरफ जस्टिस बीवी नागरत्ना की राय बाकी जजों से अलग रही. उन्होंने नोटबंदी के फैसले को गलत और गैरकानूनी बताते हुए कहा कि इसके लिए कानून बनना चाहिए था.
जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि 500 रुपये और 1,000 रुपये की सीरीज के नोटों को चलन से बाहर एक कानून के माध्यम से किया जाना था, न कि एक अधिसूचना के माध्यम से. उन्होंने कहा कि संसद में चर्चा के बाद सहमति से इस पर कानून बनाने की चर्चा थी. उन्होंने कहा कि नोटबंदी के कानून पर संसद में चर्चा होनी चाहिए थे. देश के लिए इतने अहम मुद्दे पर संसद को अलग नहीं छोड़ा जा सकता है. उन्होंने कहा कि आरबीआई और केंद्र ने जो जवाब दाखिल किए हैं, उनमें अंतर्निहित विरोधाभास है. उन्होंने कहा कि नोटबंदी की पूरी कवायद 24 घंटे में की गई. जबकि गंभीर आर्थिक प्रभाव वाले केंद्र के इस प्रस्ताव को विशेषज्ञ समिति के समक्ष रखा जाना चाहिए था.
हालांकि यह पहली बार नहीं है जब जस्टिस नागरत्ना ने केंद्र के किसी फैसले को गलत ठहराया. नागरत्ना ने इससे पहले साल 2017 में ‘द टोबैको इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया’ बनाम ‘यूनियन ऑफ इंडिया’ के मामले में फैसला सुनाते हुए केंद्र के फैसले को रद्द कर दिया था, जिसमें केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने तंबाकू उत्पाद की 85% पैकेजिंग को सचित्र स्वास्थ्य चेतावनी के साथ कवर किया जाना अनिवार्य कर दिया था.
कौन हैं जस्टिस बीवी नागरत्ना?
वर्तमान में जस्टिस बीवी नागरत्ना सुप्रीम कोर्ट में जज हैं. इससे पहले वे साल 2008 में कर्नाटक हाई कोर्ट में बतौर एडिशन जज आई थीं. इसके दो साल बाद उन्हें स्थायी जज बना दिया गया था. जस्टिस बीवी नागरत्ना द्वारा कई महत्वपूर्ण फैसले दिए गए हैं. साल 2012 में जब केंद्र को ब्रॉडकास्ट मीडिया को रेगुलेट करने के निर्देश दिए गए थे, तब हाई कोर्ट की उस बेंच का हिस्सा जस्टिस नागरत्ना भी थीं. वहीं साल 2019 में उनकी बेंच की तरफ से बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा गया था कि मंदिर "व्यावसायिक प्रतिष्ठान" नहीं हैं और उसके कर्मचारी ग्रेच्युटी के हकदार भी नहीं.
इतना ही नहीं बल्कि जस्टिस नागरत्ना के पिता ईएस वेंकटरमैया सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं. साल 1989 में CJI आरएस पाठक के रिटायर होने के बाद वेंकटरमैया चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बने. हालांकि उन्होंने 6 महीने तक ही पद को संभाला जिसके बाद वो रिटायर हो गए थे.
डिवोर्स मामले में महिला सशक्तिकरण पर टिप्पणी
साल 2020 में एक डिवोर्स मामले में भी महिला सशक्तिकरण पर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने जो टिप्पणी की थी, वो खूब सुर्खियों में रही. उन्होंने कहा था कि लोग हमेशा महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, लेकिन समाज को नहीं पता कि सशक्त महिलाओं संग कैसा व्यवहार करना चाहिए. माता-पिता भी अपने बेटों को नहीं सिखाते कि एक सशक्त महिला के साथ कैसा बर्ताव रखना चाहिए. लड़कों के साथ यही सबसे बड़ी समस्या है.
वैसे एक वक्त ऐसा था जब जस्टिस बीवी नागरत्ना को हाई कोर्ट के दो अन्य न्यायधीशों संग एक कमरे में बंद कर दिया गया था. ये घटना नवंबर 2009 की थी जब विरोध कर रहे कुछ वकीलों ने ये हैरान कर देने वाला कदम उठाया था. उस घटना पर तब जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा था कि वे नाराज नहीं हैं, लेकिन दुख जरूर है कि उनके साथ ऐसा किया गया.
कैसा रहा करियर?
जस्टिस बीवी नागरत्ना के करियर की बात करें तो उन्होंने बतौर वकील साल 1987 में अपने करियर की शुरुआत की थी. उनकी तरफ से संवैधानिक और वाणिज्यिक कानूनों के विषय पर प्रैक्टिस शुरू की गई थी. उन्होंने पूरे 23 साल तक वकालत की थी और उसके बाद बतौर जज भूमिका संभाली. अब कहा जा रहा है कि साल 2027 में वे देश की पहली महिला मुख्य न्यायधीश बन सकती हैं. हाई कोर्ट जजेस की सिनियोरिटी के मामले में अभी वे 33वें स्थान पर हैं. अगर भारत सरकार द्वारा उनके नाम पर मुहर लगा दी जाती है तो 23 सितंबर 2027 से 29 अक्टूबर 2 2027 तक वो पद संभाल सकती हैं.