पिछले साल जम्मू-कश्मीर के पहलगाम हमले के बाद भारत द्वारा सिंधु जल संधि (IWT) को निलंबित किए जाने के फैसले को एक साल पूरा हो चुका है. इस दौरान भारत ने न केवल कूटनीतिक कड़ाई दिखाई है, बल्कि अपने हिस्से के पानी का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने के लिए बुनियादी ढांचे पर भी अभूतपूर्व गति से काम किया है.
भारत ने अपनी जलविद्युत क्षमता बढ़ाने और भंडारण को बेहतर बनाने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई है. गाद सफाई की है. मौजूदा बैराजों से गाद निकालने का काम युद्ध स्तर पर जारी है, जिससे भंडारण क्षमता और बिजली उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है.
बहाव पर नियंत्रण पर भी विशेष तौर पर ध्यान दिया गया है. किश्तवाड़ की मेरुसुदार परियोजना चिनाब नदी के बहाव को नियंत्रित करने में गेम-चेंजर साबित हो सकती है.
डेटा साझाकरण पर रोक लगा दी गई है. 1960 के बाद पहली बार भारत ने संधि के तहत पाकिस्तान को पानी के बहाव का डेटा देना बंद कर दिया है.
नहर नेटवर्क और राज्यों को लाभ
उत्तर भारत में जल संकट को दूर करने के लिए नई नहर परियोजनाओं की डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार की गई है:
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जलविद्युत परियोजनाओं पर फोकस
भारत का लक्ष्य 2026 तक पक्कलडुल (1000 मेगावाट) और किरू (624 मेगावाट) परियोजनाओं को चालू करना है. ये परियोजनाएं जम्मू-कश्मीर की बिजली उत्पादन क्षमता में बड़ा बदलाव ला सकती हैं.
पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते
भारत ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद और संवाद (या संधि) साथ-साथ नहीं चल सकते. भारत का मानना है कि 1960 की यह संधि अब पुरानी पड़ चुकी है.
पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता
बढ़ती जनसंख्या, जलवायु परिवर्तन और पिघलते ग्लेशियरों को देखते हुए भारत इस संधि को 21वीं सदी की जरूरतों के हिसाब से दोबारा बातचीत करना चाहता है, जबकि पाकिस्तान इसमें लगातार बाधाएं उत्पन्न कर रहा है.
भारत का साफ संदेश
भारत का साफ कहना है कि जब तक सीमा पार आतंकवाद नहीं रुकता, जल कूटनीति पर उसका सख्त रुख बरकरार रहेगा.