पहले बेड खुला, फिर सोफा. उसके बाद फॉल्स सीलिंग हटाई गई और आखिर में दीवारों पर हथौड़े चले. विजिलेंस टीम जिस जगह हाथ डालती गई, वहां से कभी नोटों के पैकेट निकले, कभी सोने और चांदी के आभूषण .आगरा में पूर्व एआरटीओ ललित कुमार के घर हुई छापेमारी के बाद जांच एजेंसियां अब यह समझने में जुटी हैं कि पूरा घर ही आखिर एक 'हाई-सिक्योरिटी वॉल्ट' में कैसे बदल गया था.
उत्तर प्रदेश विजिलेंस की कार्रवाई में सामने आई तस्वीरें और शुरुआती जांच से जुड़े दावे परिवहन विभाग में चर्चा का विषय बने हुए हैं. आरोप है कि वर्षों में जुटाई गई कथित अवैध संपत्ति को छिपाने के लिए घर के सामान्य हिस्सों को भी सीक्रेट स्टोरेज में बदल दिया गया था. जांच के दौरान करीब 13 किलोग्राम सोना, 1.62 करोड़ रुपये नकद, निवेश संबंधी दस्तावेज और कई संपत्तियों के रिकॉर्ड मिलने का दावा किया गया है. ऐसे में लोग अब पूरे आरटीओ ऑफिस के सिस्टम पर ही सवाल करने लगे हैं.
शुरुआत शिकायत से हुई, लेकिन कहानी कहीं बड़ी निकली
विजिलेंस अधिकारियों के मुताबिक, ललित कुमार के खिलाफ लंबे समय से आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने की शिकायतें मिल रही थीं. पहले गोपनीय सत्यापन किया गया. जब प्रारंभिक जांच में आरोपों के समर्थन में सामग्री मिली तो विशेष अदालत से सर्च वारंट लिया गया. इसके बाद एक साथ कई ठिकानों पर कार्रवाई शुरू हुई. शुरुआत में जांच सामान्य तलाशी जैसी थी, लेकिन जल्द ही अधिकारियों को समझ आ गया कि मामला साधारण नहीं है. जांच से जुड़े सूत्रों का दावा है कि घर में कई जगह ऐसी संरचनाएं बनाई गई थीं जिनका सामान्य उपयोग नहीं था. बेड के भीतर विशेष खांचे. सोफे के अंदर छिपे बॉक्स. फॉल्स सीलिंग में बने बंद चेंबर. दीवारों के भीतर सीक्रेट लॉकर. स्टोर रूम में अलग कैविटी. हर नई जगह खुलने के साथ कथित तौर पर नकदी, सोना या दस्तावेज मिलने लगे. जांच अधिकारियों के मुताबिक, सामान्य नजर से इन स्थानों का पता लगाना लगभग असंभव था.
जब दीवारें ही सबूत बन गईं
जांच के दौरान सबसे अहम मोड़ तब आया जब टीम ने कुछ दीवारों पर संदेह जताया. सूत्रों के अनुसार, दीवारों की मोटाई और निर्माण में अंतर देखकर जांच टीम ने उन्हें खंगालना शुरू किया. जैसे-जैसे परतें हटती गईं, अंदर बने सीक्रेट कम्पार्टमेंट सामने आते गए. बताया जा रहा है कि इन्हीं स्थानों से बड़ी मात्रा में सोना, नकदी और संवेदनशील दस्तावेज मिले. जांच एजेंसियों के लिए यह सबसे अहम बरामदगी मानी जा रही है क्योंकि इससे कथित तौर पर संपत्ति छिपाने के सुनियोजित तरीके का संकेत मिलता है.
बरामदगी में करीब 13 किलोग्राम सोना सबसे ज्यादा चर्चा में है. मौजूदा बाजार मूल्य के अनुसार इसकी कीमत कई करोड़ रुपये बैठती है. लेकिन जांच एजेंसियां केवल सोने की कीमत नहीं जोड़ रहीं. उनकी कोशिश यह पता लगाने की है कि यह सोना कब खरीदा गया? भुगतान किस खाते से हुआ? खरीद के दस्तावेज मौजूद हैं या नहीं? क्या यह घोषित आय से मेल खाता है? यानी जांच का केंद्र अब बरामदगी से ज्यादा उसका स्रोत बन चुका है.
1.62 करोड़ नकद... लेकिन हर पैकेट की कहानी अलग
सूत्रों के अनुसार नकदी एक ही जगह नहीं मिली. अलग-अलग कमरों, अलमारियों और गुप्त स्थानों से पैकेटों में बंद नोट बरामद हुए. अब हर पैकेट की लिस्टिंग की जा रही है. यदि पैकेटों पर किसी बैंक, तारीख या अन्य पहचान संबंधी निशान मिलते हैं तो वे जांच में अहम साक्ष्य बन सकते हैं.
पासवर्ड भूलने का दावा और दो घंटे का इंतजार
छापेमारी के दौरान एक डिजिटल तिजोरी भी जांच के घेरे में आई. सूत्रों के मुताबिक अधिकारियों ने उसका पासवर्ड मांगा तो ललित कुमार ने कथित तौर पर पासवर्ड याद न होने की बात कही. इससे कार्रवाई कुछ समय के लिए रुक गई. बाद में तकनीकी विशेषज्ञ बुलाए गए और काफी मशक्कत के बाद तिजोरी खोली गई. उसके भीतर भी दस्तावेज और अन्य सामग्री मिलने की बात सामने आई है. विजिलेंस का मानना है कि जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा नकदी नहीं बल्कि वित्तीय दस्तावेज हैं. तलाशी के दौरान मिले म्यूचुअल फंड निवेश, फिक्स्ड डिपॉजिट, बैंक निवेश, संपत्ति की रजिस्ट्रियां, वित्तीय रिकॉर्ड अब इन सभी का मिलान आयकर, बैंक खातों और अन्य एजेंसियों के रिकॉर्ड से किया जाएगा.
तीन शहरों तक फैला संपत्तियों का नेटवर्क
प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि ललित कुमार और उनके परिवार के नाम पर लखनऊ, आगरा और नोएडा में कई संपत्तियां हैं. इनमें जमीन, मकान और प्लॉट शामिल बताए जा रहे हैं. अब जांच एजेंसियां यह देख रही हैं कि इन संपत्तियों की खरीद के समय घोषित आय क्या थी और भुगतान किस माध्यम से किया गया.
क्या अकेले संभव था इतना बड़ा नेटवर्क?
जांच एजेंसियों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है. यदि आरोप सही साबित होते हैं तो क्या इतने बड़े स्तर पर संपत्ति जुटाने और उसे छिपाने का काम अकेले संभव था? इसी वजह से अब बिचौलियों, कथित सहयोगियों और विभाग से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है. अब फॉरेंसिक और बैंक रिकॉर्ड बताएंगे पूरी कहानी. बरामद दस्तावेज अब फॉरेंसिक और वित्तीय जांच के लिए भेजे जा रहे हैं. जांच एजेंसियां बैंक ट्रांजैक्शन, निवेश, संपत्ति खरीद और डिजिटल रिकॉर्ड का मिलान करेंगी. इसी आधार पर आगे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई का दायरा तय होगा.
अब जांच का असली सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितना सोना और कितना कैश मिला. असल सवाल यह है कि कथित तौर पर यह संपत्ति वर्षों तक छिपी कैसे रही? क्या घर को पहले से ही गुप्त लॉकरों के हिसाब से तैयार कराया गया था? क्या इसमें और लोग भी शामिल थे? और क्या यह सिर्फ एक अधिकारी की कहानी है या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था? इन सवालों के जवाब अब विजिलेंस की वित्तीय और फॉरेंसिक जांच से सामने आएंगे.