13 नवंबर का दिन था. अमेरिका में अचानक सरकारी कामकाज ठप (गवर्नमेंट शटडाउन) हो गया और देशभर में हजारों कमर्शियल फ्लाइट्स रद्द कर दी गईं. उसी दिन अमेरिकी डिप्लोमैटिक सिक्योरिटी सर्विस (DSS) के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई. भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस से तय समय पर एक अहम द्विपक्षीय बैठक के लिए पहुंचाना था. बैठक का वक्त तय था, बदला नहीं जा सकता था, लेकिन फ्लाइट्स बंद हो चुकी थीं.
इसके बाद जो हुआ, वो पर्दे के पीछे चला एक हाई-प्रेशर ऑपरेशन था, जिसमें DSS एजेंट्स की प्लानिंग, तालमेल, धैर्य और सूझबूझ की असली परीक्षा हुई.
जब हवाई यात्रा का विकल्प खत्म हो गया, तो DSS नेतृत्व ने एक बैकअप प्लान को मंजूरी दी जो बहुत कम मौकों पर इतने बड़े स्तर पर लागू होता है. तय हुआ कि जयशंकर को अमेरिका-कनाडा सीमा पर लुइस्टन-क्वीनस्टन ब्रिज से रिसीव किया जाएगा और वहां से बख्तरबंद वाहनों के काफिले में 400 मील से ज्यादा का सफर तय कर न्यूयॉर्क सिटी पहुंचाया जाएगा.
इस मिशन में डिग्निटरी प्रोटेक्शन डिविजन, न्यूयॉर्क फील्ड ऑफिस और बफेलो रेजिडेंट ऑफिस के 27 स्पेशल एजेंट शामिल हुए. तीन एजेंट रातभर ड्राइव कर टीम को मजबूत करने पहुंचे. मकसद सर्द मौसम और शटडाउन की सीमाओं के बीच सात घंटे लंबी सड़क यात्रा को सुरक्षित तरीके से पूरा करना था.
ऑपरेशन की शुरुआत सीमा पर हुई, जहां बफेलो ऑफिस के एजेंट्स ने संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन, कनाडा में सुरक्षा संभाल रही रॉयल कनाडियन माउंटेड पुलिस और अमेरिकी कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन के साथ रियल टाइम में तालमेल किया. हैंडओवर बेहद तेजी और सावधानी से हुआ ताकि सुरक्षा में कोई ढील न रहे.
अमेरिकी सीमा में दाखिल होने के बाद काफिला पश्चिमी, मध्य और दूर-दराज के अपस्टेट न्यूयॉर्क से गुजरा. रास्तों की पहले से वैकल्पिक योजना थी. ड्राइवरों की अदला-बदली तय समय पर की गई ताकि थकान न हो. एजेंट्स को सुरक्षा और विदेश मंत्री की सुविधा दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना था.
हालात आसान नहीं थे. तापमान जमाव बिंदु के करीब था, कई जगह दृश्यता कम थी और शटडाउन की वजह से संसाधनों पर दबाव था. इसके बावजूद टीम ने पूरे संयम और प्रोफेशनल अंदाज में मिशन आगे बढ़ाया ऐसा काम जो अक्सर दिखता नहीं, लेकिन मुश्किल वक्त में सबसे ज्यादा मायने रखता है.
यात्रा के बीच, जब बफेलो और न्यूयॉर्क फील्ड ऑफिस की टीमों के बीच जिम्मेदारी बदली जा रही थी, तभी सबसे गंभीर चुनौती सामने आई. ब्रोम काउंटी शेरिफ ऑफिस के बम सूंघने वाले K9 डॉग ने उस बख्तरबंद गाड़ी पर अलर्ट दिया, जिसमें विदेश मंत्री सवार थे.
तुरंत तय प्रक्रिया के मुताबिक कार्रवाई हुई. इलाके को सुरक्षित किया गया, बम निरोधक दस्ते के साथ जांच हुई और गाड़ी की पूरी तरह तलाशी ली गई. आखिरकार वाहन को क्लियर घोषित किया गया और काफिला बिना किसी घटना के आगे बढ़ा. ये दबाव में भी नियमों का पूरी तरह पालन करने का उदाहरण था बिना जल्दबाजी, बिना अनुमान लगाए.
लेकिन दिन यहीं खत्म नहीं हुआ. न्यूयॉर्क पहुंचने के बाद एक DSS एजेंट ने सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल एक महिला को देखा, जो हिट-एंड-रन का शिकार हुई थी. सुरक्षा मिशन को बाधित किए बिना एजेंट ने तुरंत मदद की, NYPD इंटेलिजेंस और मोटरकेड टीम के साथ तालमेल कर इलाके को सुरक्षित किया. ट्रैफिक संभाला गया और फायर डिपार्टमेंट व एंबुलेंस को मौके पर बुलाया गया. महिला को तुरंत इलाज मिला और सुरक्षा मिशन बिना रुकावट जारी रहा.
डॉ. जयशंकर तय समय पर सुरक्षित रूप से संयुक्त राष्ट्र पहुंचे. यह बैठक G7 विदेश मंत्रियों की बैठक के इतर आयोजित हुई थी, जिसमें भारत आमंत्रित साझेदार के रूप में शामिल था. संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में जयशंकर और गुतारेस के बीच वैश्विक व्यवस्था, बहुपक्षवाद, अलग-अलग क्षेत्रों में चल रहे तनाव और भारत के विकास को लेकर गुतारेस के समर्थन जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई. जयशंकर ने गुतारेस को भारत आने का निमंत्रण भी दोहराया. इससे पहले दोनों सितंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 80वें सत्र के दौरान भी मिल चुके थे.
DSS के भीतर इस पूरे ऑपरेशन को एक केस स्टडी की तरह देखा जा रहा है. जब योजना फेल हो जाए, लेकिन मिशन कायम रहे. यहे दिखाता है कि मुश्किल हालात में भी एजेंट्स कैसे खुद को ढालते हैं और अमेरिकी कूटनीति के लिए पूरी तैयारी के साथ खड़े रहते हैं. ये सिर्फ बर्फ और मुश्किलों के बीच लंबा सफर नहीं था, बल्कि इस बात की मिसाल थी कि दबाव में भी कैसे सटीक सुरक्षा, अनुशासन और मानवीय जिम्मेदारी निभाई जाती है वो भी एक बेहद अहम राजनयिक मिशन के बीच.