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मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज, पद से हटाने के लिए 193 सांसदों ने किए थे साइन

संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ दायर महाभियोग प्रस्ताव खारिज कर दिया गया है. यह प्रस्ताव 12 मार्च को राज्यसभा में पेश किया गया था. इसमें 63 राज्यसभा सदस्यों समेत कुल 193 सांसदों के हस्ताक्षर थे. इस प्रस्ताव का उद्देश्य CEC ज्ञानेश कुमार को पद से हटाना था.

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193 सांसदों के हस्ताक्षर के बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त पर महाभियोग का प्रयास फेल (File Photo: PTI)
193 सांसदों के हस्ताक्षर के बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त पर महाभियोग का प्रयास फेल (File Photo: PTI)

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 193 सांसदों द्वारा पेश किए गए महाभियोग प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया है. सभापति ने प्रस्ताव के सभी पहलुओं का निष्पक्ष मूल्यांकन किया. न्यायाधीश (जांच) अधिनियम की शक्ति का प्रयोग करते हुए इसे अस्वीकार कर दिया. अब मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल सुरक्षित है.

12 मार्च को राज्यसभा में पेश किए गए इस प्रस्ताव पर राज्यसभा के सभापति ने गंभीर विचार-विमर्श किया. सभी प्रासंगिक पहलुओं और मुद्दों का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के बाद, सभापति ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए इसको स्वीकार करने से इनकार कर दिया.

इस निर्णय के बाद साफ हो गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल जारी रहेगा और उनके खिलाफ महाभियोग की कोई प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी. यह कदम संविधान और चुनाव प्रक्रिया की स्वतंत्रता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. गौरतलब है कि विपक्ष ने लोकसभा और राज्यसभा में नोटिस दिया था.

इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने का प्रस्ताव लाने की मांग की थी. विपक्ष ने उन पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार का आरोप लगाया. उनके खिलाफ सात गंभीर आरोप लगाए गए थे. इनमें दफ्तर में पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण रवैया, दुर्व्यवहार, चुनावी धोखाधड़ी और वोट देने का अधिकार छीनना जैसे आरोप थे.

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विपक्षी दलों ने विशेष रूप से बिहार और पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (SIR) अभियान को लेकर सवाल उठाए थे. उनका दावा था कि इस प्रक्रिया के कारण कई वोटरों का वोट देने का अधिकार छिन गया. यह भी कहा कि CEC ने कुछ राजनीतिक दलों का पक्ष लेते हुए पक्षपातपूर्ण तरीके से काम किया. 

इन आरोपों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला भी दिया गया था. बीजेपी की मदद करने के आरोपों को भी नोटिस में शामिल किया गया. विपक्ष का कहना था कि SIR अभियान का उद्देश्य केंद्र में सत्ताधारी पार्टी को लाभ पहुंचाना था. इसमें चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग की गई थी.

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