उपभोक्ताओं की शिकायतों के जल्द, सटीक और संतोषजनक हल में आंध्र प्रदेश पहले नंबर पर रहा. वहीं, इस मामले में तेलंगाना सबसे पीछे रहा. इंडिया जस्टिस रिपोर्ट की लेटेस्ट रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ है.
इस रिपोर्ट के मुताबिक छोटे राज्यों में मेघालय अव्वल और हिंसाग्रस्त मणिपुर सबसे नीचे रहा. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल के हाथों जारी हुई इस रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादातर उपभोक्ताओं की शिकायत बीमा, बैंकिंग और आवास से जुड़ी रहीं.
राज्य के उपभोक्ता आयोगों में औसतन 35 फीसदी मामले और शिकायतें तीन साल से ज्यादा समय से लटकी हैं. रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 2025 में राज्य उपभोक्ता आयोगों में अध्यक्ष और सदस्यों के आधे से ज्यादा पद अरसे से खाली ही पड़े हैं.
इस रिपोर्ट की मानें तो 20 में से 10 राज्य उपभोक्ता आयोगों में 2021 से 25 के बीच सभी पांच सालों में अध्यक्ष पद पर नियुक्ति रही. राष्ट्रीय तौर पर केस निपटान दर 2020 में 50% से बढ़कर 2023 में 108% और 2024 में 98% रही. वहीं, 19 में से 16 राज्य आयोगों ने अध्यक्ष या सदस्यों के पद पर एक महिला होने के कानून का पालन किया.
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21 राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों SCDRCs में 2021-22 से 2024-25 के बीच बजट आवंटन 52% बढ़कर 201.9 करोड़ रुपए हो गया. सुधार की जरूरत वाले क्षेत्रों को लेकर रिपोर्ट कहती है कि 2025 में देश भर के 775 जिलों के लिए सिर्फ 685 जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग मौजूद थे.
39 जिला आयोगों में अध्यक्ष पद नहीं
इन 685 में कम से कम 39 जिला आयोगों में अध्यक्ष का पद ही नहीं था. RTI से मिली जानकारी के मुताबिक, 22 राज्य आयोगों ने 2022 से मार्च 2025 तक लोक अदालतों को सिर्फ 3,216 मामले भेजे. जबकि 23 राज्य आयोगों ने 2022 से मार्च 2025 तक मध्यस्थता के लिए सिर्फ 134 मामले भेजे.
साल 2020 से 2024 के बीच सभी 35 राज्य और 685 जिला आयोगों में दायर 7.6 लाख मामलों में से11% लंबित थे. SCDRCs में 2021 से 2025 के बीच कार्यरत कर्मचारियों की संख्या 208 से बढ़कर 215 हो गई. महिला कर्मचारियों की संख्या 48 पर ही बनी रही.