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इमरजेंसी विशेष: वो नेता जिन पर लगे आपातकाल के दाग को भुला BJP ने लगाया गले

आपातकाल के कांग्रेस में रहे कुछ नेताओं ने बाद में अलग पार्टी बनाई, जिनके साथ बीजेपी ने हाथ मिलाकर सरकार बनाई. हालांकि, आज भी बीजेपी आपातकाल को लेकर कांग्रेस पर सवाल खड़े करती रही है.

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संजय गांधी और मेनका गांधी.(फाइल फोटो)
संजय गांधी और मेनका गांधी.(फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • आपातकाल में संजय गांधी की अहम भूमिका रही
  • विद्या चरण शुक्ल को बताया गया था प्री-सेंसरशिप का सूत्रधार

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 46 साल पहले आज ही के दिन 25 जून 1975 को देश में आपातकाल का ऐलान किया था. आपातकाल के ऐलान के साथ ही तमाम विपक्षी नेताओं को उसी समय जेल में डाल दिया था, जिसमें जनसंघ से लेकर समाजवादी नेता तक शामिल थे. इस फैसले के पीछे सीधे तौर पर इंदिरा गांधी थीं, लेकिन आपातकाल के दौरान जो जुल्म और ज्यादतियां हुईं उसके पीछे कांग्रेस के कुछ नेताओं का हाथ था.

इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी ने अपने करीबियों के साथ मिलकर आपातकाल में नसबंदी, दिल्ली के सौंदर्यीकरण के लिए जबरन झुग्गियों को उजाड़े जाने जैसे कई फैसले लिए. इनमें से कई नेता ऐसे थे, जो बाद में बीजेपी में शामिल हो गए. इसके अलावा आपातकाल के कांग्रेस में रहे कुछ नेताओं ने बाद में अलग पार्टी बनाई, जिनके साथ बीजेपी ने हाथ मिलाकर सरकार बनाई. हालांकि, आज भी बीजेपी आपातकाल को लेकर कांग्रेस पर सवाल खड़े करती रही है.

जगमोहन मलहोत्रा

संजय गांधी के करीबियों में एक नाम जगमोहन मलहोत्रा का आता है, जिन्होंने आपातकाल के दौरान दिल्ली को लेकर कई फैसले लिए. जगमोहन एक आईएएस अधिकारी थे और दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी के वाइस चेयरमैन थे. आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने दिल्ली को खूबसूरत बनाने का काम जगमोहन के जिम्मे सौंपा, जिसके बाद जगमोहन ने कई झुग्गियों को हटाना शुरू कर दिया. इसे लेकर जमकर विरोध हुआ, लेकिन जगमोहन ने अपने कदम पीछे नहीं खींचा. इसी का नतीजा था कि जनता पार्टी के बाद 1980 में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की तो जगमोहन को दिल्ली का उपराज्यपाल बनाया गया.

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कांग्रेस ने 1984 में जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का गवर्नर बनाया. संजय गांधी के करीबी रहे जगमोहन के इंदिरा गांधी के निधन के बाद राजीव गांधी के साथ भी रिश्ते बेहतर रहे, लेकिन जम्मू-कश्मीर को लेकर दूरियां बढ़ गई. जगमोहन ने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया. 1990 में बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा में भेज दिया. बीजेपी में रहते हुए जगमोहन 1996, 1998 और 1999 का लोकसभा चुनाव लगातार जीते. 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तो जगमोहन को शहरी विकास, पर्यटन मंत्रालय और सूचना मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली.

संजय की पत्नी मेनका गांधी

1975 में देश में आपातकाल लगाया गया तो उसके पीछ संजय गांधी की अहम भूमिका रही. संजय गांधी ने अपनी युवा नेताओं की टीम के साथ आपातकाल के दौरान काफी जुल्म किए थे. मेनका गांधी संजय गांधी की पत्नी थीं, ऐसे में संजय के हर फैसले में उनकी भूमिका मानी जाती है. मेनका गांधी ने संजय गांधी के निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी घोषित करने के लिए अमेठी से चुनाव भी लड़ा था, लेकिन जीत नहीं सकीं.

मेनका गांधी ने संजय के खास रहे अकबर अहमद डंपी के साथ मिलकर राष्ट्रीय संजय मंच बनाया, जो लोगों को रोजगार देने के उद्देश्य से बनाया गया था. 1988 में वो वीपी सिंह के जनता दल में शामिल हो गईं और1989 में पीलीभीत से जीतकर लोकसभा पहुंचीं. 1999 में बतौर निर्दलीय उम्मीदवार पीलीभीत से सांसद बनी मेनका गांधी ने उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी का केंद्र में समर्थन किया और उन्हें केंद्र में मंत्री भी बनाया गया. 2004 में आधिकारिक तौर पर मेनका गांधी बीजेपी में शामिल हो गईं. मेनका लगातार चौथी बार बीजेपी के टिकट पर लोकसभा पहुंच चुकी हैं. इसके बाद उनके बेटे वरुण गांधी भी बीजेपी के टिकट से तीसरी बार सांसद हैं.

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विद्या चरण शुक्ल प्री-सेंसरशिप के सूत्रधार

देश में आपातकाल लगने से पहले विद्याचरण शुक्ल रक्षा राज्यमंत्री थे और इंद्र कुमार गुजराल केंद्रीय सूचना मंत्री थे. 20 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने दिल्ली के बोट क्लब पर रैली की, जिसका दूरदर्शन पर लाइव कवरेज नहीं हो पाया. इसकी वजह से इंदिरा गांधी नाराज हो गईं और उन्होंने इंद्र कुमार गुजराल को सूचना मंत्री के पद से हटाकर रूस का राजदूत बना दिया.

वहीं, गुजराल की जगह विद्याचरण शुक्ल को सूचना-प्रसारण मंत्रालय सौंप दिया गया. राजेंद्र माथुर ने अपने लेख 'उन्नीस महीनों के बाद रोशनी' में लिखा है, 'सूचना और प्रसारण मंत्री विद्या चरण शुक्ल ने आजादी का दीया बुझाने में उल्लेखनीय रोल अदा किया.' इसके अलावा प्रेस पर लगी सेंसरशिप के लिए भी सीधे तौर पर विद्याचरण शुक्ल को ही जिम्मेदार ठहराया गया था.

विद्याचरण शुक्ल आपातकाल के सबसे बड़े खलनायकों में से एक थे. 1984 में जब कांग्रेस की कमान राजीव गांधी के हाथ में आई, तो राजीव ने फिर से विद्याचरण शुक्ल को ऐक्टिव किया. लेकिन 1989 में जब राजीव गांधी की सरकार बोफोर्स घोटाले पर घिरी हुई थी, तो उन्होंने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया. वीपी सिंह के साथ चले गए और मंत्री बन गए.

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इसके बाद चंद्रशेखर सरकार और नरसिम्हा राव में भी विद्याचरण शुक्ल मंत्री बने. 2004 में शुक्ल ने एक बार फिर कांग्रेस छोड़ दी और शरद पवार की बनाई हुई पार्टी एनसीपी में शामिल हो गए, लेकिन एक साल के बाद ही उन्होंने 2005 में बीजेपी का दामन थाम लिया. बीजेपी ने में केंद्रीय समिति का सदस्य भी बनाया गया, लेकिन बाद में 2007 में विद्याचरण शुक्ल एक बार फिर से कांग्रेस में वापसी कर गए, बाद में छत्तीसगढ़ में हुई नक्सली हमले में निधन हो गया.

बंसीलाल के साथ बीजेपी ने किया गठबंधन

हरियाणा के कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे बंसीलाल आपातकाल लगाने वाली इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी के बेहद करीबी थे. देश में 1975 में जब आपातकाल लगा था, तो बंसीलाल ही देश के रक्षा मंत्री थे और आपातकाल को लागू करवाने के बाद जो ज्यादातियां हुईं, उनमें उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. बीके नेहरू अपनी आत्मकथा, ''नाइस गाइज फिनिश सेकेंड' में लिखते हैं कि बंसीलाल इंदिरा गांधी को कितना पसंद करते थे, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उन्होंने सीधे-सीधे कहा था कि इंदिरा गांधी को प्रेसिडेंट फॉर लाइफ़ बना दीजिए. बाकी कुछ करने की ज़रूरत नहीं है.

बंसीलाल 1996 में कांग्रेस से अलग हो गए और अपनी पार्टी बनाई हरियाणा विकास पार्टी. 1996 के हरियाणा के विधानसभा चुनाव में बंसीलाल को बहुमत नहीं मिल पाया था. इसके बाद आपातकाल के खलनायाक माने जाने वाले बंसीलाल ने बीजेपी के सहयोग से तीन साल तक सरकार चलाई.

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हालांकि इस गठबंधन का सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी को ही मिला. हरियाणा विकास पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने में बीजेपी को 25 सीटें ही मिलीं और बंसीलाल ने 11 सीटों पर जीत हासिल की. इसके बाद 1999 के चुनाव में बीजेपी ने हरियाणा विकास पार्टी के साथ गठबंधन तोड़ दिया था. राज्य सरकार से भी समर्थन वापस ले लिया था, जिसके बाद हरियाणा विकास पार्टी में टूट हो गई और बीजेपी को संजीवनी दे गए.

 

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