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1971 युद्ध में भारत का जांबाज इयान कारदोजो, जिनको रणभूमि में खुखरी से काटना पड़ा अपना ही पैर

मेजर जनरल इयान कारदोजो ने कहा कि चाहे जो हो जाए पाकिस्तानी का खून नहीं लूंगा. किसी तरह से उनका ऑपरेशन किया गया. वो कहते हैं कि अब भी मेरे नाम से बांग्लादेश में एक फुट बाय एक फुट की जमीन है जहां वो कटी हुई टांग दबाई गई है.

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मेजर जनरल इयान कारदोजो (रि.) फोटो- वीकिपीडिया
मेजर जनरल इयान कारदोजो (रि.) फोटो- वीकिपीडिया
स्टोरी हाइलाइट्स
  • युद्धभूमि में अदम्य साहस की मिसाल
  • जब जख्मी मेजर ने अपने ही पैर को काट डाला
  • पाकिस्तान के डॉक्टर ने किया ऑपरेशन

1971 की स्वर्णिम विजय के 50 साल पूरे हो गए हैं. ये वो जीत है जिसे सैन्य इतिहास में भारतीयों की वीरता और बहादुरी को याद करने के लिए पढ़ाया जाता है. कैसे मात्र 13 दिन के युद्ध में पाकिस्तान ने भारत के सामने घुटने टेक दिए थे और पाकिस्तान की सेना के नाम दुनिया के एक सबसे बड़ा सरेंडर का ऐसा तमगा लगा जिससे वो कभी भी पीछा नहीं छुड़ा पाएगा. 

इस युद्ध के नतीजे ने दक्षिण एशिया के नक्शे को हमेशा हमेशा के लिए बदल दिया और विश्व के मानचित्र पर बांग्लादेश नाम के शिशु राष्ट्र का उदय हुआ, साथ ही इस युद्ध के परिणामस्वरूप पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए. इस युद्ध में विश्व ने तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी के नेतृत्व और भारत के तत्कालीन फील्ड मार्शल सैम मानकेशॉ का शौर्य देखा. इसके अलावा रणभूमि में अनगिनत भारतीय सैनिकों ने अभूतपूर्व पराक्रम का परिचय दिया. 

ऑफिसर इयान कारदोजो की रोंगटे खड़ी कर देने वाली कहानी

ऐसे ही एक ऑफिसर थे मेजर जनरल इयान कारदोजो. इयान कारदोजो पांचवीं गोरखा राइफल्स के मेजर जनरल थे. 1971 की भारत-पाक जंग के दौरान एक वाकया ऐसा आया जब मेजर जनरल इयान कारदोजो को खुद ही अपना पैर काट देना पड़ा. 

मेजर जनरल इयान कारदोजो ने बीबीसी के साथ बातचीत में रोंगटे खड़े कर देने वाले उस युद्ध का आंखों देखा अनुभव साझा किया था. 

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मेजर जनरल इयान कारदोजो ने बताया था कि 1971 के युद्ध की बात है. उस समय के पूर्वी पाकिस्तान यानी कि आज के बांग्लादेश में हेली की लड़ाई चल रही थी. भारत की सेना तत्कालीन पाकिस्तान की सीमा के अंदर थी. इंडियन आर्मी पाकिस्तानियों को शिकस्त देने के करीब पहुंच चुकी थी. 

मेजर जनरल इयान कारदोजो की गोरखा राइफल्स सिलहट में युद्ध लड़ रही थी, जबकि कारदोजो डिफेंस सर्विस कॉलेज वेलिंग्टन में ट्रेनिंग ले रहे थे. युद्ध के दौरान इस बटालियन के सेकेंड कमांडिंग ऑफिसर वीरगति को प्राप्त हुए थे. इसके बाद मेजर जनरल इयान कारदोजो को उनका स्थान लेने के लिए भेजा गया था. 

लैंडमाइन पर पड़ा मेजर जनरल इयान कारदोजो का पैर

लड़ाई चल रही थी. एक ऑपरेशन के दौरान मेजर जनरल इयान कारदोजो का पैर लैंडमाइन पर पड़ा और तेज धमाका हुआ. कुछ क्षण के लिए उनका दिमाग सुन्न हो गया. 

कुछ देर बाद जब उनकी चेतना लौटी तो उनका पांव बुरी तरह से जख्मी था. मेजर जनरल इयान कारदोजो ने इस घटना का वर्णन इस तरह से किया था, "एक स्थानीय निवासी ने मुझे देखा और मुझे उठा कर पाकिस्तानियों के बटालियन मुख्यालय में ले गया. वहां मैंने डॉक्टर से कहा कि मुझे मॉरफीन दे दीजिए, लेकिन उनके पास शायद मॉरफीन भी नहीं थी."

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मेजर जनरल इयान कारदोजो

मेजर जनरल इयान कारदोजो ने कहा कि वे गोरखा राइफल्स में थे तो उनके पास खुखरी रहा करती थी. खुखरी लगभग एक फीट लंबी एक तेज कटार होती है. इयान कारदोजो ने अपने साथ मौजूद एक दूसरे गोरखा जवान से कहा कि वह उनका पैर काट दे, लेकिन वह गोरखा सैनिक इससे इनकार कर गया. 

अपनी ही खुखरी से काट डाला अपना पैर

इसके बाद मेजर जनरल इयान कारदोजो ने जो किया वो इतिहास में अमर हो गया. उन्होंने अपनी ही खुखरी से अपने पैर को काट डाला. इसके बाद एक पाकिस्तानी डॉक्टर मेजर मोहम्मद बशीर ने उनका ऑपरेशन किया. मेजर जनरल इयान कारदोजो कहते हैं कि उस समय विचित्र स्थिति पैदा हो गई जब मुझे खून की जरूरत पड़ी. 

 जो हो जाए पाकिस्तानी का खून नहीं लूंगा...

इयान कारदोजो ने बताया कि चाहे जो हो जाए पाकिस्तानी का खून नहीं लूंगा. इन सब के बीच किसी तरह से उनका ऑपरेशन किया गया.  इसके बाद अस्पताल में उनका उचित इलाज किया गया. वो बताते हैं कि अब भी मेरे नाम से बांग्लादेश में एक फुट बाय एक फुट की जमीन है जहां वो कटी हुई टांग दबाई गई है.

बता दें कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हमें ऐसा ही जिक्र मिलता है जब स्वतंत्रता सेनानी वीर कुंवर सिंह ने गोली लगे अपने हाथों को खुद से काटकर गंगा नदी में प्रावहित कर दिया था. 

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टांग नहीं थे मगर ब्रिगेड का नेतृत्व किया
  
मेजर जनरल इयान कारदोजो कहते हैं कि आगे चलकर वे पहले ऐसे अधिकारी बने जिनकी टांग नहीं थी बावजूद इसके उन्होंने ब्रिगेड का नेतृत्व किया. तत्कालीन चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल तपीश्वर नारायण रैना ने उन्हें ब्रिगेड को लीड करने की इजाजत दी. मेजर जनरल इयान कारदोजो को बटालियन में लोग कारतूस साहब कहकर पुकारते थे, क्योंकि उन्हें उनके नाम का उच्चारण करने में मुश्किल होती थी. 

 

 

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