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अजित पवार का वो 80 घंटे का पावर गेम... उद्धव की उड़ी नींद और मच गया था सियासी बवाल

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का विमान हादसे में निधन हो गया. उनके जाने से न सिर्फ राज्य की राजनीति में शोक की लहर है, बल्कि उनके विवादों और सियासी दांव-पेच से भरे करियर पर भी चर्चा तेज हो गई है. खास तौर पर 2019 का 80 घंटे का सत्ता खेल, जिसने महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा बदल दी थी.

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अजित पवार ने अचानक देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर सरकार बनाई थी. (Photo- India Today)
अजित पवार ने अचानक देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर सरकार बनाई थी. (Photo- India Today)

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का एक विमान हादसे में निधन हो गया. वह पार्टी के गढ़ माने जाने वाले बारामती जा रहे थे, तभी लैंडिंग के दौरान उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया. उनके निधन की खबर ऐसे वक्त आई है, जब राजनीतिक गलियारों में उनके चाचा शरद पवार के खेमे में वापसी को लेकर अटकलें तेज थीं.

चर्चा थी कि अजित पवार महा विकास अघाड़ी गठबंधन में लौटने की संभावनाएं तलाश रहे थे. उनके अचानक निधन के बाद उनके लंबे और उतार-चढ़ाव भरे राजनीतिक करियर पर एक बार फिर नजर डाली जा रही है. इसी कड़ी में आइए जानते हैं उनके 80 घंटे के पावर गेम की पूरी कहानी.

अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति में "दादा" कहे जाते हैं. नवंबर 2019 वो दौर था, जब एक ही रात में महाराष्ट्र की सत्ता बदली, सुबह-सुबह शपथ हुई और 80 घंटे में सरकार गिर भी गई.

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असल में, 2019 के विधानसभा चुनावों के बाद महाराष्ट्र में कोई भी पार्टी बहुमत नहीं जुटा पाई थी. बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी जरूर बनी, लेकिन सरकार बनाने का आंकड़ा उसके पास नहीं था. शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी के बीच सरकार गठन की बातचीत चल रही थी. इसी राजनीतिक असमंजस के बीच राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था.

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यहीं से कहानी ने अचानक मोड़ लिया. एनसीपी के भीतर पहले से ही खींचतान चल रही थी. टिकट बंटवारे, नेतृत्व को लेकर नाराजगी और कुछ पुराने मामलों की जांच ने माहौल को और गर्म बना दिया था. अजित पवार को लगने लगा था कि पार्टी में उनकी भूमिका को वो अहमियत नहीं मिल रही, जिसके वे हकदार हैं.

22 नवंबर की देर रात, पर्दे के पीछे तेज हलचल शुरू हुई. अजित पवार ने तब के राज्यपाल रहे भगत सिंह कोशियारी को समर्थन पत्र सौंपा जिसमें उन्होंने एनसीपी के सभी 54 विधायकों के समर्थन का दावा किया था. बातचीत गोपनीय थी और मकसद साफ था - किसी भी तरह सरकार बना लेना है.

2019 में 23 नवंबर की सुबह महाराष्ट्र की राजनीति ने ऐसा माहौल देखा, जो पहले कभी नहीं देखा गया था. सुबह करीब 5:30 बजे देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार राजभवन पहुंचे. राष्ट्रपति शासन हटाने की सिफारिश हुई. कुछ ही घंटों बाद, सुबह करीब 8 बजे, बेहद गोपनीय तरीके से शपथ ग्रहण समारोह हुआ. देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बने और अजित पवार उपमुख्यमंत्री.

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लेकिन इस सरकार की कोई मजबूत नींव नहीं थी. शरद पवार ने तुरंत साफ कर दिया कि यह फैसला पार्टी का नहीं, बल्कि अजित पवार का निजी कदम है. एनसीपी ने उन्हें विधायक दल नेता के पद से हटा दिया. दूसरी तरफ कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी ने अपने विधायकों को एकजुट करना शुरू कर दिया. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

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अदालत ने फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया. बहुमत साबित करने से पहले ही सच्चाई सामने आ गई - देवेंद्र फडणवीस के पास संख्याबल नहीं था और ना ही अजित पवार इतने विधायक तोड़ पाए थे कि सरकार बच सके. 26 नवंबर को अजित पवार और देवेंद्र फडणवीस ने इस्तीफा दे दिया. सिर्फ 80 घंटे में सरकार इतिहास बन गई.

इसके बाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महा विकास आघाड़ी की सरकार बनी. अजित पवार कुछ समय बाद फिर एनसीपी में लौटे और पवार परिवार के भीतर रिश्ते संभालने की कोशिश हुई. बावजूद इसके अजित पवार अपने आपको हाशिये पर मान रहे थे. हालांकि, इस ट्रेलर की पूरी कहानी उन्होंने 2023 में फिर दोहराई जब वह एनसीपी को तोड़कर फडणवीस-शिंदे गठबंधन में डिप्टी सीएम बने और अपनी ही शर्तों पर वित्त मंत्रालय भी हासिल की और उपमुख्यमंत्री का पद भी मिला.

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