देश आज डिजिटल इंडिया, एक्सप्रेसवे और बुलेट ट्रेन की बात कर रहा है. लेकिन झारखंड के गिरिडीह से आई एक तस्वीर पूछ रही है- क्या आजादी के 78 साल बाद भी कुछ गांव सड़क के इंतजार में ही रहेंगे? गिरिडीह जिले के पारसनाथ तराई क्षेत्र में एक प्रेग्नेंट महिला को प्रसव पीड़ा होने पर परिजन और ग्रामीण उसे खाट पर लादकर करीब 4 किलोमीटर पैदल मुख्य सड़क तक ले गए. वजह सिर्फ इतनी थी कि गांव तक सड़क ही नहीं है.
यह मामला मधुबन पंचायत के दलुवाडीह गांव का है. यहां रहने वाली सुनीता को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई. परिवार वालों ने तुरंत एंबुलेंस को कॉल किया. लेकिन जवाब मिला- गांव तक सड़क नहीं है, इसलिए एंबुलेंस नहीं पहुंच सकती.
इसके बाद परिजनों और ग्रामीणों के सामने कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा. उन्होंने सुनीता को खाट पर लिटाया और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए करीब 4 किलोमीटर दूर पिपराडीह मुख्य सड़क तक पैदल लेकर पहुंचे. वहां किसी तरह वाहन का इंतजाम किया गया, तब जाकर महिला को अस्पताल भेजा जा सका.
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परिजनों का कहना है कि अगर गांव तक सड़क बनी होती तो एंबुलेंस सीधे घर तक पहुंच सकती थी और महिला को समय पर इलाज मिल जाता. ग्रामीणों के मुताबिक, पिपराडीह तक तो सड़क बनी हुई है, लेकिन उसके आगे आज तक सड़क निर्माण नहीं कराया गया. बारिश के दिनों में हालात और खराब हो जाते हैं. बीमार लोगों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को अस्पताल पहुंचाना किसी परीक्षा से कम नहीं रहता.
घटना के बाद गांव में नाराजगी भी देखने को मिली. ग्रामीणों ने जनप्रतिनिधियों और प्रशासन पर उपेक्षा का आरोप लगाया. ग्रामीण बुधन सोरेन, सुशील मुर्मू, सानो मरांडी, गोपाल मुर्मू, सोमरा मुर्मू, पतिराम मरांडी और बाबूलाल हांसदा समेत कई लोगों ने कहा कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही गांव को भुला दिया जाता है. ग्रामीणों का कहना है कि सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के अभाव में हर बार गांव वालों को अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती है.