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अस्पताल में टीबी से मौत, महिला के शव को नहीं मिली एंबुलेंस, ठेले पर ले गया पति

फरीदाबाद के बीके सिविल अस्पताल में टीबी से पीड़ित महिला की मौत के बाद सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की अमानवीय सच्चाई सामने आई. एंबुलेंस और शव वाहन न मिलने पर पति को पत्नी का शव ठेले पर ले जाना पड़ा. यह घटना दिखाती है कि गरीबों के लिए सरकारी इलाज सिर्फ दावों तक सीमित है, जमीनी हकीकत बेहद शर्मनाक और असंवेदनशील है.

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मरने के बाद भी पत्नी को नहीं मिली एंबुलेंस (Photo: itg)
मरने के बाद भी पत्नी को नहीं मिली एंबुलेंस (Photo: itg)

हरियाणा में फरीदाबाद के बीके सिविल अस्पताल से सामने आई यह घटना किसी एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के पूरी तरह ध्वस्त हो चुके सिस्टम की जीती-जागती और शर्मनाक मिसाल है. जिस अस्पताल को गरीबों के लिए जीवन रक्षक कहा जाता है, वहीं एक महिला की मौत के बाद उसके शव को सम्मान तक नसीब नहीं हुआ. टीबी जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही 35 वर्षीय महिला सुमित्रा की मौत के बाद अस्पताल प्रशासन की बेरुखी और लापरवाही ने इंसानियत को तार-तार कर दिया.

डेढ़ घंटे इंतजार के बाद भी नहीं मिला शव वाहन

मृतका का घर अस्पताल से महज 7 किलोमीटर दूर सारण गांव में था, लेकिन इसके बावजूद सरकारी एंबुलेंस उपलब्ध नहीं कराई गई. यह वही एंबुलेंस सेवा है, जिसे सरकार मुफ्त और 24 घंटे उपलब्ध होने का दावा करती है. हकीकत यह रही कि एक गरीब मजदूर को अपनी पत्नी का शव ठेले पर रखकर ले जाना पड़ा, क्योंकि अस्पताल परिसर में डेढ़ घंटे तक इंतजार करने के बाद भी एक भी सरकारी एंबुलेंस अथवा शव वाहन नहीं मिला था.

चार लाख रुपये खर्च कर चुका था परिवार

मृतका के पति गुनगुन ने बताया कि उनकी पत्नी पिछले तीन महीने से टीबी से पीड़ित थी और सिविल अस्पताल में इलाज चल रहा था. हालत बिगड़ने पर उन्हें सफदरजंग और एम्स जैसे बड़े अस्पतालों में रेफर किया गया, लेकिन वहां भी सिस्टम की मार झेलनी पड़ी. इलाज के नाम पर परिवार तीन से चार लाख रुपये खर्च कर चुका था. जब पैसे खत्म हो गए, तो मजबूरी में पत्नी को फिर सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां बुधवार दोपहर उसकी मौत हो गई.

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दाह संस्कार तक के पैसे नहीं

मौत के बाद अस्पताल ने हाथ खड़े कर दिए. एंबुलेंस विभाग ने साफ कह दिया कि कोई सरकारी वाहन उपलब्ध नहीं है. प्राइवेट एंबुलेंस वालों ने 7 किलोमीटर के लिए 500 से 700 रुपये मांगे, जो एक दिहाड़ी मजदूर के लिए उस वक्त असंभव थे. आखिरकार, जिस ठेले से गुनगुन रोज मजदूरी करता है, उसी ठेले पर पत्नी का शव लादकर वह अस्पताल से निकला- यह दृश्य पूरे सिस्टम पर करारा तमाचा है. गुनगुन ने बताया कि अब उनके पास पत्नी के दाह संस्कार तक के पैसे नहीं हैं और उन्हें इसके लिए भी कर्ज लेना पड़ेगा. आठ साल का मासूम बेटा भी बेशर्म सिस्टम का गवाह बना रहा.

इस मामले में जब फरीदाबाद के डिप्टी सिविल सर्जन से बात की गई तो उन्होंने कहा कि एंबुलेंस मेरे अंतर्गत आती हैं लेकिन किसी मृतक के शव को ले जाने के लिए रेड क्रॉस द्वारा वाहन मुहैया कराया जाता है. हालांकि उन्होंने कहा कि एक ऐसा मामला मैंने पता किया है. मामले की जांच की जाएगी. यह घटना साफ तौर पर दिखाती है कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं सिर्फ कागजों और भाषणों में जिंदा हैं, जमीनी हकीकत में गरीब के लिए न इलाज है, न सम्मान और न ही संवेदना.

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