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सिर्फ ट्रेन टिकट न होने से रेल एक्सीडेंट का दावा खारिज नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

साल 2015 में हुए एक रेल दुर्घटना मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीड़ित के परिवार को सिर्फ इस आधार पर मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता कि मृतक के पास से ट्रेन का टिकट नहीं मिला था. कोर्ट ने मृतक की विधवा को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया.

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सुप्रीम कोर्ट ने दिया यात्रियों के हक में बड़ा फैसला. (Photo: ITG)
सुप्रीम कोर्ट ने दिया यात्रियों के हक में बड़ा फैसला. (Photo: ITG)

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (17 जुलाई) को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि ट्रेन हादसों में जान गंवाने वाले व्यक्ति के पास से टिकट बरामद नहीं होने भर से उसके परिजनों को मुआवजा देने से इनकार नहीं किया जा सकता. यह फैसला 2015 में हुए एक रेल हादसे में जान गंवाने वाले व्यक्ति की पत्नी की याचिका पर सुनवाई के दौरान आया. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चार सप्ताह के भीतर विधवा लता को 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने रेलवे यात्रियों और उनके परिवारों के अधिकारों को मजबूती दी है. कोर्ट ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के समान आदेशों  को रद्द कर दिया. न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने विधवा की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि केवल टिकट नहीं मिलने के आधार पर किसी व्यक्ति को बोना फाइड पैसेंजर मानने से इनकार नहीं किया जा सकता.आरसीटी और हाईकोर्ट ने इसी आधार पर मुआवजे का दावा खारिज कर दिया था.

 पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेलवे एक्ट एक कल्याणकारी कानून है और इसकी व्याख्या लिबरल और उद्देश्यपूर्ण तरीके से की जानी चाहिए. फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति संजय करोल ने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कल्याणकारी कानूनों की व्याख्या शब्दों के संकीर्ण अर्थ के आधार पर नहीं, बल्कि लेजिस्लेचर के उद्देश्य को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए, ताकि कानून का वास्तविक मकसद पूरा हो सके.

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इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में रेलवे सुरक्षा और यात्रियों के कल्याण को लेकर भी कई अहम टिप्पणियां कीं. अदालत ने कहा कि तकनीकी आधार या प्रक्रिया में छोटी-मोटी कमियां कानून के उस कल्याणकारी उद्देश्य को कमजोर नहीं कर सकतीं, जिसका मकसद पीड़ितों और उनके परिवारों को राहत देना है। अदालत ने कहा कि रेलवे जैसी सरकारी संस्था को इतना संकीर्ण और तकनीकी नजरिया नहीं अपनाना चाहिए।

कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने कहा कि रेलवे एक्ट की धारा 124ए के तहत मुआवजे की व्यवस्था 'नो-फॉल्ट लाइबिलिटी' के सिद्धांत पर आधारित है. इसका मतलब है कि किसी रेल हादसे में पीड़ित या उसके परिजनों को मुआवजा पाने के लिए रेलवे की लापरवाही साबित करना जरूरी नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर मृतक के पास ट्रेन का टिकट नहीं मिला, तो केवल इसी आधार पर उसे बोना फाइड पैसेंजर मानने से इनकार नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा कि शुरुआती स्तर पर दावेदार एफिडेविट और मामले से जुड़े परिस्थितिजन्य तथ्यों के जरिए अपना दावा साबित कर सकता है. इसके बाद यह जिम्मेदारी रेलवे की होगी कि वह उस दावे को गलत साबित करे.

क्या था पूरा मामला?

यह मामला चंद्रकांत ठक्कर की मौत से जुड़ा है। आरोप है कि नवंबर 2015 में रायपुर से अहमदाबाद की यात्रा के दौरान वह अहमदाबाद-हावड़ा मेल ट्रेन से गिर गए थे.हादसे के बाद उनका ट्रैवल बैग, जिसमें ट्रेन का टिकट भी रखा हुआ था वह गायब हो गया था. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए रेलवे दुर्घटना और अप्रिय घटनाएं (मुआवजा) नियमों के तहत 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया. अदालत ने केंद्र सरकार को चार सप्ताह के भीतर राशि जारी करने का निर्देश दिया. तय समय में भुगतान नहीं होने पर दावा याचिका दायर करने की तारीख से 8 फीसदी सालाना ब्याज भी देना होगा. अदालत ने कहा कि इस मामले से यह सवाल भी उठता है कि यात्रियों के प्रति रेलवे की जिम्मेदारी क्या है. कोर्ट ने कहा कि ट्रेनों से गिरकर यात्रियों के घायल होने या जान जाने की घटनाएं देश में नई नहीं हैं और ऐसी घटनाएं बार-बार सामने आती रहती हैं.

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नियमो का पालन करना अभी भी चुनौती

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय रेलवे ने टिकट जांच,भीड़ प्रबंधन और यात्री सुरक्षा को लेकर विस्तृत ऑपरेशनल मैनुअल बनाए हैं. लेकिन उनका प्रभावी तरीके से पालन अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. अदालत ने कहा कि ट्रेनों में अत्यधिक भीड़ आज भी आम बात है और इसी वजह से देशभर में कई जानलेवा हादसे हो चुके हैं. कोर्ट ने सुझाव दिया कि रेलवे अपने कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने पर विचार करे। इससे यात्रियों की सुरक्षा बेहतर होगी और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे.

रेलवे को दिया सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय रेलवे को एक और सुझाव दिया. अदालत ने कहा कि रेलवे के मैनुअल और अन्य दस्तावेजों में इस्तेमाल होने वाला 'सेकेंड क्लास पैसेंजर' शब्द उचित नहीं है, क्योंकि इससे यात्रियों के बीच वर्ग का भाव पैदा होता है. कोर्ट ने सुझाव दिया कि 'सेकेंड क्लास' शब्द का इस्तेमाल यात्री के बजाय केवल कोच के लिए किया जाना चाहिए, ताकि यह संविधान में निहित समानता और गरिमा के मूल्यों के अनुरूप हो.

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