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'ये रोग मेरा जिस्म और रिश्ते सब खा गया, मैं गाली बन गया था...' आपबीती एक कुष्ठ रोगी की

एक दौर था जब लोग कुष्ठ रोग से बहुत डरते थे. गांवों में ऐसे रोग‍ियों से लोग दूरी बना लेते थे. इस एक रोग के कारण कितने ही लोगों ने समाज का तिरस्कार सहा और एक मुख्य धारा से कटकर जीवन जिया. यहां हम आपको ऐसे ही व्यक्त‍ि की कहानी उन्हीं की जुबानी बता रहे हैं जो मेड‍िकल साइंस और इलाज से ठीक तो हो गए, लेकिन उनके दिल के जख्म आज भी ताजा हैं.

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मो खान नियाज (Special Permission)
मो खान नियाज (Special Permission)

मैं 15 साल का एक लड़का था, जब मेरे हाथों में पड़े छाले जख्म बनने लगे थे. गांव के कुनबे में इसकी बातें होने लगी थीं. उड़ते-उड़ते मेरे कानों तक भी वो लफ्ज पहुंचा...वो लफ्ज था 'कोढ़'. मैं अंदर से बहुत डर रहा था. रोग से ज्यादा डर उस तसव्वुर से लग रहा था कि अब मुझे लोग छुएंगे तक नहीं. मैं अब अपने आपको चादर से ढककर रखता था. नीम-हकीम, ओझा-मौलवी से लेकर अस्पतालों की चौखट तक गया, लेकि‍न जख्म थे कि भरने के बजाय रिसने को तैयार होने लगे थे.

अपना' कोई था तो वो था मेरा भाई.

आप दुनिया में रहो तो चादर के भीतर भी सच कहां छुपता है. यार-दोस्त मजाक मस्ती में ही चादर हटा देते. फिर जैसे ही वो घाव देखते तो कुनबे में मेरे रोग के बारे में उड़ रही अफवाहों से जोड़ने लगते. मेरे इतने करीबी दोस्त जो मेरे बिना एक कदम न बढ़ाते थे, धीरे धीरे मुझसे बचकर निकलने लगे. कभी अनदेखा करके तो कभी रास्ता बदलकर मुझे नजरंदाज करने लगे. खानदान का जो कुनबा था, उसमें भी मेरी बीमारी से चिढ़ झलकने लगी थी. अम्मी-अब्बू के बाद अगर अब दुनिया में 'अपना' कोई था तो वो था मेरा भाई.

'तुझे हल नहीं छूने दूंगा तू कोढ़ी है'

मेरा भाई स्वभाव से तेजतर्रार और दबंग स्वभाव का नवयुवक था. हर गलत बात पर भ‍िड़ने से वो कभी ह‍िचकता नहीं था. उससे गली-जवार के मेरी उम्र के लड़के भी खौफ खाते थे. उसी दौर की एक बात जो मेरे भीतर आज 65 साल की उम्र में भी बैठी है, वो बताता हूं. मैं खेतों के लिए जा रहा था तो मुझसे मेरे भाई ने बगल के घर से हल (तब हल सबके घरों में नहीं होते थे) लाने को कहा. मैं उनके दरवाजे गया तो उन्होंने सीधे सीधे कह दिया, 'तुझे हल नहीं छूने दूंगा तू कोढ़ी है, भाग यहां से'. वो चंद अल्फाज जैसे तेजाब बनकर मेरे कानों से होते हुए रूह तक जलाने लगे. आंखों में आंसू भरे मैं अपने घर लौट आया. जैसे ही भाई को यह बात पता चली, वो लगभग गरजने लगा. उसने जैसे घोषणा कर दी कि कोई मेरे भाई को ये लफ्ज नहीं बोलेगा वरना मैं जान ले लूंगा.

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ये बीमारी मेरे लिए गाली बन गई 

समय बीतने के साथ ही कोढ़ी शब्द जैसे मेरे लिए प्रचलित गाली बनता जा रहा था. मेरे दिन रात आंसुओं में डूबने लगे थे. मुझे समझ आने लगा था कि ये रोग मेरा जिस्म और रिश्ते सब खा जाएगा. मैं एक दिन घर से पैसे लेकर पीलीभीत से आगरा के अस्पताल आया.यहां मैंने कुछ दिन इलाज कराया तो घावों को आराम मिलने लगा, लेक‍िन रोज-रोज आगरा आकर ड्रेस‍िंग कराना मुमकिन नहीं था. अब मैं 20 साल  होने वाला था. उसी दौरान मुझे पता चला कि दिल्ली में कुष्ठ अस्पताल हैं जहां मेरे जैसे रोग‍ियों का उपचार होता है. मैंने इस रोग के साथ गांव में बड़ी मुश्क‍िलों में पांच साल काटे थे. लोग मेरे हाथ से खाना नहीं खाते थे. उर्स में या दावतों में मेरे लिए अलग खाना परोसने को कहा जाता, मैं भूखा ही वहां से उठ आता. कोई झगड़े न हों, इसलिए अब भाई से भी श‍िकायत करना बंद कर दिया था.

मेरा खर्च चलने लगा...

मेरे सब्र का बांध अब टूटने लगा था. मैंने अब दिल्ली आने की ठान ली थी और इस तरह 45 साल पहले मैं एक दिन दिल्ली आ गया.  यहां शुरू में जब आया तो सीमापुरी इलाके में हमारे जैसे और मरीज रहते थे. वहां कुछ ही महीने में लोग व‍िरोध करने लगे. हमें वहां से हटाया गया. दो-तीन जगह बदलने के बाद साल 1996 में मैं कोढ़‍ियों के लिए बनी जेल में रहा. यहां समाज कल्याण मंत्रालय की तरफ से रोग‍ियों का ध्यान रखा जाता था. खाना-पीना और दूध वगैरह मिलता था. मैंने साथ में कुछ दिन एक क्र‍िश्च‍ियन परिवार के घर के बाहर चौकीदार का काम किया. फिर मुझे यहीं पास की मस्ज‍िद में अजान पढ़ने का काम मिल गया. अब मुझे यहां से भी पैसे मिलने लगे थे. सरकार की पेंशन और मस्ज‍िद से पैसे मिलने लगे तो मेरा खर्च आराम से चलने लगा था.

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अपने से 15 साल बड़ी उम्र की बेवा से किया न‍िकाह 

इसी बीच, कोढ़ी कॉलोनी के एक घर में मौत होने पर मैं गया था. उसकी बेवा और परिवार में दो बच्चे थे. उसके कुछ ही दिन बाद मुझसे मस्ज‍िद के मौलवी ने कहा कि तुम इस बेवा के संग निकाह कर लो. वो मुझसे करीब 15 साल बड़ी थी. मुझे अपने दीन की सीख याद आई और मैंने उससे न‍िकाह कर लिया. उसके बच्चों की परवरिश की, उसे कुष्ठ रोग नहीं था. वो बहुत भली महिला थी. उसका मेरा करीब 10 साल का साथ रहा. उसके बच्चे शादी करके चले गए, अब अकेलेपन में उम्र के इस पड़ाव में मैंने अब दूसरा न‍िकाह भी कर लिया है, क्योंकि मुझे अब इस उम्र में एक अदद साथी की जरूरत थी.

हमें भी अपनेपन की जरूरत है

इस तरह मेरी कहानी आज भी जारी है. आज भी स‍िलस‍िला थमा नहीं है. कई बार अपनी बीमारी को गाली की तरह सुनना पड़ जाता है, लेकिन अब रोने के बजाय उसे मुंह तोड़ जवाब देता हूं. अब पढ़े लिखे लोगों के बीच समझ आ चुकी है. हमारे पर‍िवारों को जब हमसे ये बीमारी नहीं हुई, आसपास के लोगों को नहीं हुई तो भला हमें इतना दुत्कारने की क्या जरूरत...अब मुझे समाज से बस यही उम्मीद है कि आप हमें अपनाएं और अपने जैसा समझें, हमारे जैसे लोगों को भी प्यार और अपनेपन की जरूरत है. हमें मुख्यधारा का जीवन जीने का हक है.

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