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'बिहार डायरी बिफोर इलेक्‍शन' पार्ट-7

लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही बिहार के तपे-तपाए सियासतदान अपनी-अपनी 'रोटी' और 'गोटी' की फिक्र में जुट गए हैं. बिहार की राजनीति में कैसी लहर चल रही है और किस ओर चल रही है, इसका जायजा ले रही है 'बिहार डायरी बिफोर इलेक्‍शन' की सातवीं किस्‍त...

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लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही बिहार के तपे-तपाए सियासतदान अपनी-अपनी 'रोटी' और 'गोटी' की फिक्र में जुट गए हैं. बिहार की राजनीति में कैसी लहर चल रही है और किस ओर चल रही है, इसका जायजा ले रही है 'बिहार डायरी बिफोर इलेक्‍शन' की सातवीं किस्‍त...

1.
''परवीन अमानुल्लाह ने कहा कि चांदनी चौक 'दूर' है और किशनगंज उनकी रगों में बहता है. उनके पिता पूर्व आईएफएस अधिकारी सैयद शहाबुद्दीन वहां से सांसद थे. साथ ही कहा कि बीजेपी में जाएंगी नहीं, कांग्रेस पर बोलेंगी नहीं. 'आप' से पुराना प्यार है. उनके पिता एक जमाने में वाजपेयी के करीब हो गए थे, जब वाजपेयी सन् 77 में विदेश मंत्री बने थे. उस हिसाब से परवीन का बीजेपी में एक दरवाजा खुला हुआ है. यों, सैयद शहाबुद्दीन बाबरी मस्जिद मूवमेंट कॉर्डिनेशन कमेटी के संयोजक भी रहे और 'मुस्लिम इंडिया' नामकी पत्रिका भी शुरू की. इसके नाम पर कई लोगों को आपत्ति थी.''

''सन् 1990 में उनके पति अफजल साहब पर भी आडवाणी को गिरफ्तार करने का भारी दवाब था. लेकिन लेकिन सफल हुए आरके सिंह जो, बीजेपी में जगह पा चुके हैं. उस वक्त अफजल साब ने कहा था कि दुनिया जानती है कि वे शहाबुद्दीन के दामाद हैं. ऐसे में उनके द्वारा आडवाणी की गिरफ्तारी का गलत संदेश जाएगा.''

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''वैसे किशनगंज से कांग्रेस का सीटिंग एमपी हैं, जिसे हटाकर परवीन को टिकट देना मुश्किल होगा. परवीन सन् 2009 में ही जेडीयू से किशनगंज का टिकट मांग रही थी, लेकिन मिला नहीं. इस बार वो कोई जोखिम नहीं लेना चाहती थीं. इस बार बीजपी की वहां से वैकेंसी है और डॉ. दिलीप जायसवाल तैयारी कर रहे थे. लेकिन मुस्लिम बहुल सीट होने की वजह से बीजेपी किसी मुस्लिम को ही टिकट देगी.''

''शाहनवाज हुसैन भागलपुर में हैं और किशनगंज से बचते हैं. ऐसे में बीजेपी के लिए एक मशहूर पत्रकार का नाम भी उछला है. उधर 'आप' का दावा है कि बिहार में सबसे ज्यादा मेम्बर किशनगंज से बने हैं. ऐस में परवीन का मामला पेचीदा है. परवीन ने घोषित तौर पर तो कहा है कि वो बीजेपी में नहीं जाएंगी. लेकिन पिछले कई सालों से वह बीजेपी की कटु आलोचना भी नहीं कर रही हैं.''

2.
''बिहार के कई शहरों में घूम चुका हूं. अभी भी घूम रहा हूं. लेकिन पूर्णिया की बात निराली है. खुला-खुला सा शहर है. ढेर सारी हरियाली है, गंदगी और भीड़भाड़ नहीं है. पूर्णिया में सड़क और बिजली का हाल ठीक-ठाक है. जमीन सस्ती है और जिले में आबादी का घनत्व उतना नहीं है, जितना बिहार के अन्य जिलों में है.''

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''कोसी पर पुल बन जाने से पूर्णिया की दूरी दरभंगा-मजुफ्फरपुर से बहुत कम हो गई है और चार लेन हाइवे ने बागडोगरा एयरपोर्ट, सिलीगुड़ी को बिल्कुल पड़ोस में ला दिया है. नौगछिया में गंगा पर पुल होने से भागलपुर 2 घंटे की दूरी पर है. बस, पूर्णिया में नहीं है, तो एक मेडिकल कॉलेज और यूनिवर्सिटी. हालांकि सुशासन बाबू ने वादा जरूर किया है. इस इलाके में बिजनेस करने आना हो, तो पूर्णिया में अड्डा बनाइए...अब गुंडागर्दी भी नहीं होती.''





(यह विश्लेषण स्वतंत्र पत्रकार सुशांत झा ने लिखा है. वह इन दिनों ‘बिहार डायरी बिफोर इलेक्शन’ के नाम से ये सीरीज लिख रहे हैं.)

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