भारत में जब किसी के सीने में दर्द होता है, तो पूरा परिवार तुरंत अस्पताल भागता है. लेकिन जब किसी का चेहरा लटक जाए, आवाज लड़खड़ाने लगे या हाथ-पैर सुन्न हो जाएं, तो अक्सर इसे 'लकवा' समझकर मालिश या घरेलू नुस्खों में वक्त बर्बाद कर दिया जाता है. यही वह फर्क है जो एक इंसान को ताउम्र के लिए दूसरों पर निर्भर बना देता है.
AIIMS ऋषिकेश के न्यूरोसर्जन डॉ. निशांत गोयल के मुताबिक भारत में 'स्ट्रोक' यानी ब्रेन अटैक एक बड़ा संकट बन चुका है, जिसे वह 'साइलेंट क्राइसिस' कहते हैं. इसे पहचानने के लिए नीचे बताई गई फास्ट तकनीक जानना जरूरी है.
हार्ट अटैक बनाम स्ट्रोक
आंकड़ों की तुलना करें तो दोनों ही बीमारियां एक ही रफ्तार से भारतीयों को अपना शिकार बना रही हैं. ब्रेन स्ट्रोक की बात करें तो भारत में हर साल लगभग 15 लाख से 25 लाख लोग स्ट्रोक का शिकार होते हैं. वहीं हार्ट अटैक के सालाना करीब 15 लाख से 30 लाख हार्ट अटैक के मामले सामने आते हैं.
दोनों ही स्थितियों में रक्त की आपूर्ति रुक जाती है, एक में दिल की नसों में, दूसरे में दिमाग की. लेकिन हमारी तैयारी सिर्फ दिल को बचाने की है. जबकि डॉक्टर्स ब्रेन स्ट्रोक को सीरियस लेने की बात करते हैं.
मौत से बदतर है अपंगता का बोझ
डॉ. गोयल एक बहुत गहरी बात कहते हैं. उनका कहना है कि हार्ट अटैक में जान जाने का दुख गहरा होता है, लेकिन वह सीमित है. मगर स्ट्रोक का मरीज अगर बच भी जाए, तो वह अक्सर गंभीर डिसेबिलिटी का शिकार हो जाता है. यही नहीं, अगर घर का कमाने वाला सदस्य जब बिस्तर पर आ जाता है, तो पूरा परिवार गरीबी के दुष्चक्र में फंस जाता है. साथ में भावनात्मक तनाव और सालों-दशकों तक देखभाल करने का बोझ परिवारों को तोड़ देता है.
क्या है FAST तकनीक जिसे सभी को पहचानना होगा
डॉ. निशांत गोयल कहते हैं कि हमें इसके लिए FAST को पहचानना सीखना होगा. इसमें F यानी फेस मतलब चेहरा डाउन होना. ए से आर्म यानी हाथ की कमजोरी, S यानी स्पीच यानी बोलने में दिक्कत... अगर ये लक्षण दिखते ही तुरंत अस्पताल भागें. टाइम न गवाएं.
इलाज है, पर पहुंच नहीं
हार्ट अटैक के लिए आज भारत में एम्बुलेंस, ईसीजी और कैथ लैब का जाल बिछा है. लेकिन स्ट्रोक के लिए वही सुविधाएं नदारद हैं. जैसे मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी स्ट्रोक का सबसे कारगर इलाज है. डॉ. गोयल बताते हैं कि अगर हम 2 मरीजों का इस तकनीक से इलाज करें, तो कम से कम 1 मरीज को पूरी तरह आत्मनिर्भर बना सकते हैं.
लेकिन हैरानी की बात ये है कि जिस कैथ लैब में हार्ट की एंजियोप्लास्टी होती है, उसी लैब में दिमाग की नसों को भी खोला जा सकता है. बुनियादी ढांचा मौजूद है, बस उसे स्ट्रोक के लिए इस्तेमाल करने की इच्छाशक्ति और ट्रेनिंग की कमी है.
क्यों पिछड़ रहे हैं हम?
इसके पीछे गलत धारणा बड़ी वजह है. देश में लोग हार्ट अटैक को 'इमरजेंसी' मानते हैं, लेकिन स्ट्रोक (लकवा) को धीरे-धीरे होने वाली बीमारी समझ लेते हैं. इसके अलावा स्ट्रोक में हर मिनट लाखों न्यूरॉन्स मरते हैं. इस मामले में देरी का मतलब है, हमेशा के लिए बोलने या चलने की शक्ति खो देना. साथ ही आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं में भी एडवांस्ड स्ट्रोक थेरेपी को और बेहतर तरीके से शामिल करने की जरूरत है.