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दंतकथा से दस्तावेज तक... क्या तमिलों को अक्षर ज्ञान देने खुद महादेव आए थे

तमिल भाषा केवल एक भाषा नहीं, बल्कि तमिलों की सभ्यता और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है. इसकी उत्पत्ति को लेकर कई मिथक और व्याकरणीय प्रमाण मौजूद हैं, जिनमें संगम सभाओं, ऋषि अगस्त्य और भगवान शिव की भूमिका प्रमुख है.

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तमिल भाषा और तमिल साहित्य का इतिहास संगम काल की प्राचीनता में ले जाता है
तमिल भाषा और तमिल साहित्य का इतिहास संगम काल की प्राचीनता में ले जाता है

तमिलों के लिए तमिल सिर्फ एक भाषा नहीं है, वह उसे सभ्यता-संस्कृति से जोड़कर देखते हैं. इसलिए इस भाषा की पैदाइश को लेकर बहुत से मिथक भी हैं तो वहीं कई दस्तावेजों में व्याकरणीय प्रमाण भी मिलते हैं. तमिल परंपरा के लोग मानते हैं कि इसकी शुरुआत संगम सभाओं, ऋषि अगस्त्य और शिव से हुईं. वहीं मॉर्डर्न स्टडी इसे एक परिपक्व और आत्मनिर्भर भाषा के रूप में देखती है. 

पहले संगम के आयोजन से आधुनिक इतिहास तक

बात जब शुद्ध तमिल की आती है तो तमिलियन ये मानते हैं कि इसकी उत्पत्ति महादेव शिव ने ही की और इसकी ध्वनियां उनके ही गान या नाद से प्रकट हुई हैं. मान्यता का स्तर यह है कि वह इसे ही सबसे पुरानी (और पहली भी) मानते हैं. कहानी शुरू होती है प्रथम संगम से. माना जाता है कि महर्षि अगस्त्य ने पहले संगम का आयोजन किया था.

इसके अधिष्ठाता (अध्यक्ष) परमेश्वर थे और पांड्य वंश इसके संरक्षक रहे और उत्तराधिकारी भी. तमिल भाषा को लेकर सबसे खास बात ये है कि यही मिथक उसकी उत्पत्ति का सच है. इसे इग्नोर नहीं किया जा सकता है. क्योंकि इसकी उत्पत्ति संवाद की परंपरा से है. किसी आकाशवाणी या दैवीय ऐलान में नहीं. बातचीत की ये परंपरा आज तक जीवित है.

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तमिल भाषा के जनक थे महर्षि अगस्त्य

तमिलों ने खुद को किसी बाहरी कनेक्शन से जोड़ने से पहले खुद को स्वदेशी और सक्षम माना. कीलाडी में हाल में ही हुई खुदाई से मिले निष्कर्ष इस मिथक को साबित तो नहीं करते लेकिन इसे हास्यास्पद होने से जरूर बचा लेते हैं. इसी तरह तमिल लोग उस पुरानी लोक कहावत में बहुत विश्वास करते हैं जो उन्हें धरती-पुत्र बताती है. जो पत्थर से रेत पीसने वाले औजार बनाते थे. यानी वह मानते हैं कि उन्हें धातुकर्म की जानकारी थी और इस मामले में एक्सपर्ट भी थे.

खैर, हम फिर से प्रथम संगम की बात पर लौटते हैं. महर्षि अगस्त्य को तमिल भाषा का जनक माना जाता है, जिन्हें यह भाषा भगवान शिव मिली. उन्हें 4440 वर्षों तक चले प्रथम तमिल संगम के आयोजन और ‘अगत्तियम’ नामक पहले तमिल व्याकरण ग्रंथ की रचना का श्रेय दिया जाता है, जो अब गायब हो चुका है. तमिल परंपरा अपने साहित्यिक अतीत को तीन संगमों के कालखंड में बांटती है.  समय की ये गिनती वर्षों या सदियों में नहीं की जाती है, बल्कि युगों में की जाती है और यही इसकी निरंतरता का संकेत है.

प्रथम संगम (मुतल संगम), थेनमदुरै में हुआ जो 4440 वर्षों तक चला.  शिव व मुरुगन इसके अध्यक्ष रहे. इस संगम की कहानी लुप्त ‘अगत्तियम’ से जुड़ी है. दूसरा संगम (इडै संगम), कपाटपुरम में लगभग 3700 वर्षों तक चला. यह भी गायब ही है, लेकिन इसके कुछ संकेत जरूर लोक मान्यताओं में जिंदा हैं. तीसरा संगम (कडै संगम), मदुरै में हुआ. यही हमें इतिहास से जोड़ता है और संगम साहित्य का प्रमाण और भंडार भी सामने रखता है.

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मुरुगन को लेकर क्या है तमिल मान्यता
इन तीनों संगमों का ये महत्व नहीं है कि ये बहुत ऐतिहासिक हैं, बल्कि इनका महत्व उनके सांस्कृतिक कार्यों में है. क्योंकि इसके जरिए भाषा को दैवीय और राजसी संरक्षण दोनों मिलते हैं. अब देखिए कि बहस कैसे मोड़ लेती है. कट्टर तर्कवादी और पुरातत्वविद शिव-मुरुगन और अगस्त्य को मिथक तो मानते हैं, लेकिन वह इस बात पर भी भरोसा जताते हैं कि पहले दो संगमों के दस्तावेज समुद्र में डूब गए. वे गुजरात के द्वारका तट जैसे समुद्र-तल की खोज की भी मांग उठाते हैं और उनका तर्क है कि तमिलनाडु के आसपास का समुद्र भी इतिहास को उलट सकता है.

यहीं से तमिल परंपरा में बीच के रास्ते यानी मध्यमार्ग के तौर पर फिर से एक बाहरी की एंट्री होती है. तमिल राष्ट्रवादी बीच का रास्ता अपनाते हैं. सीमैन जो खुद ईसाई हैं, लेकिन उनकी निष्ठा मुरुगन में भी है. वह यह दावा करते हैं कि मुरुगन, तमिलों के देवता कोई ईश्वर नहीं, बल्कि तमिल जाति के पूर्वज हैं. 

तमिल भाषा के व्याकारण का आधार ग्रंथ तोलकाप्पियम है. इस ग्रंथ को विद्वान ईसा-पूर्व मध्य शताब्दियों का मानते हैं. परंपरावादी इसे और प्राचीन बताते हैं. यहां समय या तिथि का सवाल नहीं है, बल्कि सवाल है कि ग्रंथ किन मान्यताओं पर खड़ा है. 

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तोलकाप्पियम... तमिल भाषा के व्याकरण का ग्रंथ!

तोलकाप्पियम को पूरी तरह तमिल भाषा का शुरुआती व्याकरण नहीं कहा जाता है. क्योंकि यह पूरी तरह से व्यवस्थित और परिपक्व है. इसमें भाषा को बहुत गहराई से समझाया गया है. यह केवल अक्षरों और शब्दों की बात नहीं करता, बल्कि यह भी बताता है कि भाषा समाज और जीवन से कैसे जुड़ी होती है. तोलकाप्पियम तीन हिस्सों में बंटा है. पहला भाग ध्वनियों और अक्षरों से जुड़ा है, दूसरा शब्दों की रचना और वाक्य बनावट पर केंद्रित है, और तीसरा भाग, पोरुळतिकारम जीवन और समाज को समझने की कोशिश करता है. यही इसे खास बनाता है.

कोई भी ऐसा ग्रंथ किसी भाषा की शुरुआत नहीं कर सकता. कोई भाषा पहले लोगों के बीच जीती है, बोली जाती है, समय के साथ बदलती है और परिपक्व होती है. उसके बाद ही उसका व्याकरण लिखा जाता है. तोलकाप्पियम भी यही दिखाता है कि तमिल उससे पहले ही एक जीवित और विकसित भाषा थी.

इस कारण तोलकाप्पियम को एक “फॉसिल रिकॉर्ड” की तरह माना जा सकता है. जैसे फॉसिल हमें पुराने जीवन के बारे में बताते हैं, वैसे ही यह ग्रंथ हमें उस पुराने तमिल समाज की जानकारी देता है. तोलकाप्पियार ने नए नियम नहीं बनाए थे बल्कि समाज में पहले से चले आ रहे नियमों को डॉक्युमेंट की शक्ल में बदला था. वे अपवादों का भी ज़िक्र करते हैं, क्योंकि वे जीवन में पहले से मौजूद थे.

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इस विषय पर तर्कवादी और राष्ट्रवादी विद्वानों की राय काफ़ी हद तक मिलती है. दोनों मानते हैं कि तोलकाप्पियम से पहले तमिल एक समृद्ध भाषा थी. फर्क बस इतना है कि तर्कवादी इसे लंबे मानवीय विकास का परिणाम मानते हैं, जबकि धार्मिक और राष्ट्रवादी लोग इसे देवताओं और परंपरा से जोड़कर देखते हैं. तोलकाप्पियम का सबसे रोचक हिस्सा उसका तीसरा भाग है, जहां जीवन को दो हिस्सों में बांटा गया है. अकम और पुरम. अकम में प्रेम, परिवार और निजी भावनाएं आती हैं. पुरम में युद्ध, शासन, दान और समाज से जुड़े काम आते हैं.

यह सोच बहुत व्यावहारिक है. यहां जीवन को धर्म के नियमों से नहीं, अनुभव से समझा गया है. भावनाएं ईश्वर के आदेश से नहीं, इंसान के व्यवहार से तय होती हैं. राजनीति को पवित्र नहीं, जिम्मेदार माना गया है. देवता कहीं-कहीं दिखते हैं, लेकिन फैसले इंसान के कर्मों से होते हैं. यही सोच संगम साहित्य में भी दिखाई देती है. ये ग्रंथ स्वर्ग या मोक्ष की बात नहीं करते, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन को दिखाते हैं. कवि उपदेशक नहीं, बल्कि समाज को देखने वाले लोग हैं. इसी वजह से संगम काल को व्यावहारिक बन जाता है. यही कारण है कि तमिलों के लिए तमिल केवल भाषा नहीं, बल्कि जीवन को समझने का एक तरीका बन जाती है.

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