उत्तराखंड के कोटद्वार में 'बाबा' शब्द को लेकर हंगामा हो गया. यहां कपड़े की एक दुकान के नाम में 'बाबा' शब्द शामिल था और दुकान के मालिक मुस्लिम थे. यही बात हिंदू संगठनों को पसंद नहीं आई और वे पहुंच गए नाम बदलवाने. फिर जो-जो हुआ वो सब खबर है, लेकिन बात निकली तो बहुत दूर तक गई. इतनी दूर तक कि सोशल मीडिया पर ये सवाल भी खोजा जाने लगा कि 'बाबा' शब्द कहां से आया? क्या ये संस्कृत से निकला है, बाहरी है या फिर हिंदी में ही किसी समय इसका इस्तेमाल होने लगा.
शिवालयों में शिवजी को पुकारते हैं बाबा
हिंदू संगठनों की आपत्ति से ही बात शुरू करते हैं. उन्होंने कहा- 'बाबा' शब्द सिर्फ हम यानी हिंदू इस्तेमाल कर सकते हैं. क्योंकि हम अपने भगवान को बाबा कहते हैं. यहां (कोटद्वार में) सिद्धबली हनुमानजी का मंदिर है. जिन्हें बाबा सिद्धबली कहा जाता है. वैसे भी हिंदू लोग साधु-संतों और योगियों को बाबा कहते हैं. शिवजी महायोगी हैं इसलिए उन्हें देशभर में 'बाबा' कहा जाता है. बाबा बर्फानी, बाबा अमरनाथ, बाबा केदारनाथ, बाबा विश्वनाथ, बाबा बैद्यनाथ... शिवजी के ही नाम हैं.
शिवालयों में कहा जाता है 'बाबा बाबा सब कहें, मैया कहे न कोय, बाबा के दरबार में मैया कहे सो होय'.
यहां तक कि हनुमान जी, गांवों की सीमा के रक्षक, किसी जगह के कोई लोकल देवता और कुल देवता भी बाबा कहलाते हैं. जैसे कि आपने डीह बाबा, बरम बाबा, नागो बाबा.... ऐसे कई नाम सुने होंगे.
इन सब नामों से ये तो पता चलता है कि हिंदू लोग किसी सिद्ध, माननीय और बड़े-बुजुर्ग को बहुत पुराने समय से 'बाबा' कह रहे हैं, लेकिन इससे इस शब्द पर सिर्फ हिंदुओं का क्लेम नहीं बनता है. क्योंकि मुस्लिमों में भी सूफी संतों को 'बाबा' कहा गया है. मुगल बादशाह अकबर शेख सलीम चिश्ती का मुरीद था. शेख सलीम चिश्ती बाबा चिश्ती के नाम से जाने जाते थे. उनकी ही दुआ से अकबर के घर सलीम पैदा हुआ था, इसलिए अकबर सलीम को 'शेखू बाबा' पुकारता था.

किस भाषा-बोली से आया बाबा?
अब इसी इतिहास के सहारे चलें तो सामने आता है कि, 'बाबा' असल में फारसी मूल का शब्द है. इसका प्रयोग वेस्ट और साउथ एशिया में सबसे पहले शुरू हुआ, लेकिन इसका मूल बाल्कन क्षेत्र में था. जिसमें मैसेडोनिया, रोमानिया, सर्बिया, स्लोवेनिया, ग्रीस और तुर्की भी आते हैं. 'बाबा' को आम बोलचाल में इस्तेमाल करना इतना आसान था कि, अफ्रीकी कल्चर में भी यह शब्द इसी तरीके से इसी रूप में और इसी अर्थ में शामिल है.
भाषा के जानकार कहते हैं कि, 'बाबा' उन पहले शब्दों में से है, जिन्हें घुटवन चलने वाले बच्चे सबसे पहले बोलते हैं. आपने बच्चों को 'ब.. बा, बे, बू...' कहते सुना होगा. यानी वो मां या पापा से भी पहले बाबा बोलना सीख जाते हैं. यहीं से 'बाबा' शुरुआत का प्रतीक बन जाता है और ये मान्यता इतने ऊपर तक पहुंचती है कि बाबा शब्द ब्रह्म यानी परमात्मा के बराबर के अर्थ में बैठा मिलता है.
Anthropological Linguistics में पब्लिश हुई स्टडी ये बताती है कि 'बाबा' अलग-अलग कल्चर में बहुत आजाद तरीके से उभरा और समय के साथ फ़ारसी भाषा में सामाजिक सम्मान के साथ जुड़ गया. फारसी में 'बाबा' सिर्फ पिता के अर्थ में नहीं रहा, बल्कि 'बुज़ुर्ग, संरक्षक और ज्ञानी' भी होने लगा.
अध्यात्म के साथ कैसे जुड़ा 'बाबा'
ईसा की शुरुआती शताब्दियों में ‘बाबा’ शब्द अध्यात्म के साथ आया. आज को जो इजरायल यहूदियों के लिए जाना जाता है, वहां उनसे भी पहले 'सामरी' कल्चर के मानने वाले लोग थे, जो यहूदियो से भी पुराने थे. सामरी परंपरा के महान धार्मिक नेता का नाम ही 'बाबा रब्बा' था. उनका टाइम पीरियड तीसरी–चौथी शताब्दी ईस्वी का मिलता है. इतिहास लेखकों ने उन्हें 'The Great Father' कहा है. यानी ‘बाबा’ यहां एक पद भी था, सिर्फ नाम नहीं.
इस्लाम की बात होती है तो 'बाबा आदम' का नाम भी आता है, जहां इस्लाम ये कहता है कि दुनिया की शुरुआत ही आदम से हुई. इस लिहाज से इस्लाम अपने बुजुर्ग को बाबा ही कहता है. इस तरह फारसी का ये शब्द अरबी परंपरा में भी इस्तेमाल होता मिलता है. ईरान, अरब, तुर्क का लंबा सफर करते हुए बाबा शब्द की एंट्री 11वीं–12वीं शताब्दी में सूफ़ी संत परंपरा के साथ हिंदुस्तान की सीमा में हुई.
अमीर खुसरो की हिंदवी में 'बाबा'
13वीं-14वीं सदी में अमीर खुसरो जब फारसी-अरबी और ब्रजभाषा को मिलाकर 'हिंदवी' भाषा-शैली को रच रहे थे तब उन्होंने कई बाहरी शब्दों को आसानी से भारतीय भाषाओं में मिला दिया. इसकी बानगी उनकी एक कविता, 'साबन' में मिलती है. जहां एक लड़की अपनी मां को संदेश भेजती है और कहती है कि सावन आ गया है और 'बाबा' से कह दो कि मुझे लिवा जाएं.
'अम्मा मेरे बाबा को भेजो री - कि साबन आया
बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री - कि साबन आया
अम्मा मेरे भाई को भेजो री - कि साबन आया
बेटी तेरा भाई तो बाला री - कि साबन आया'
इतिहासकार रिचर्ड एम. ईटन अपनी बुक 'The Rise of Islam in South Asia' में लिखते हैं कि सूफी संतों की भाषा दरबारी नहीं, बल्कि आम लोगों की थी और 'बाबा' उसी बोली का हिस्सा था. 'बाबा फरीद जैसे सूफी संतों ने इस शब्द को लोगों तक पहुंचाया. इस तरह पंजाब और सिंध के इलाके में 'बाबा' धार्मिक शब्द होने के साथ-साथ संस्कृति का हिस्सा बन चुका था. इस तरह इस एरिया में 'बाबा और बेबे' संबोधन के प्रयोग की शुरुआत हुई.
बूढ़ी उम्र का मोहताज नहीं है 'बाबा'
15वीं शताब्दी में सिख परंपरा ने 'बाबा' शब्द को और गहरी पहचान दी. पहले सिख गुरु, 'गुरु नानक देव' बाबा ही कहलाए. इस तरह 'बाबा' उम्र का मोहताज नहीं रहा, बल्कि अनुभव और लीडरशिप का दूसरा नाम बन गया. यहां 'बाबा' न तो जाति देखता है, न पद, बल्कि ज्ञान से जुड़ जाता है. इसी दौर में भक्ति आंदोलन का ऐसा असर हुआ कि हिंदू संन्यासी परंपराओं में भी 'बाबा' शब्द बहुत आसानी से स्वीकार कर लिया गया.

कबीर के दोहों में 'बाबा'
नागा साधु, वैरागी और तपस्वियों के लिए 'बाबा' ऐसा शब्द बन गया जो सीधे भारत की पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा से जा मिला और इसने बड़ी आसानी से बहुत बड़े जन समुदाय को भी साथ में जोड़ लिया. फिर आते हैं कबीर. लोग उन्हें बाबा कबीर ही कहते हैं. उन्होंने बाहर से आए 'बाबा' शब्द को अपनी साखियों इतने तरीके से गढ़ा कि 'बाबा' का अर्थ ज्ञानी भी हुआ, अनुभवी भी, बूढ़ा भी और ताकतवर भी. एक जगह तो वह बाबा को निर्गुण ब्रह्नम के बराबर बिठा देते हैं और यहीं से बाबा लोक परंपरा का ऐसा मान्य शब्द बन जाता है, जो बड़ी आसानी से ईश्वर के लिए प्रयोग होने लगता है. वो कहते हैं कि...
'बाबा अगम अगोचर कैसा, ताते कहें समझाओं ऐसा'
संस्कृत और लोक परंपराओं के तुलनात्मक अध्ययन में मोनियर-विलियम्स शब्दकोश यह संकेत देता है कि भारतीय समाज में सम्मानसूचक संबोधन पहले से मौजूद थे, इसलिए ‘बाबा’ को अपनाने में कोई सांस्कृतिक टकराव नहीं हुआ. फिर भक्ति आंदोलन के समय के संत कवि अपनी कविताओं-रचनाओं में उन शब्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे थे, जिनका प्रयोग जनता अपनी बातचीत तक में कर रही थी. यही वजह है कि रामचरित मानस के विशुद्ध हिंदू पौराणिक कहानी होते हुए भी उसमें कई जगहों पर उर्दू-अरबी-फारसी शब्द मिल जाते हैं. जैसे वह गरीब नवाज, मनसबदार जैसे शब्दों का इस्तेमाल बड़ी आसानी से करते हैं.
मणि-माणिक महंगे किए, सहजे तृण, जल, नाज। तुलसी सोइ जानिए, राम गरीब नवाज
तो इस तरह बाबा देवालयों से घरों तक पहुंचता है और पिता, दादा या परिवार के बुज़ुर्ग के साथ-साथ इसका अर्थ भगवान भी हो जाता है. इसे कभी किसी ने किसी पर थोपा नहीं, बल्कि इसके सरल अंदाज ने इसे इतना स्वीकार्य बनाया. जहां तक 'बाबा' शब्द के संस्कृत से निकले होने और हिंदुओं का इस पर एकाधिकार होने की बात है तो उन्हें इतिहास पर नजर डालनी चाहिए, जो कुछ और ही कहता है.
हां अगर हिंदू 'बाबा' के अर्थ में किसी शब्द पर क्लेम चाहते हैं तो इसके लिए 'पितामह' है जो संस्कृत से निकला है और भारतीय संस्कृति में संबोधन के लिए इस्तेमाल भी होता रहा है.