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दुष्यंत चौटाला के बाद 3 निर्दलीयों ने भी छोड़ा BJP का साथ, फिर भी क्यों कॉन्फिडेंट है हरियाणा की सैनी सरकार?

हरियाणा की बीजेपी सरकार फिर संकट में फंसती नजर आ रही है. मार्च में दुष्यंत चौटाला की जेजेपी से गठबंधन टूटने के बाद निर्दलीयों का समर्थन लेकर चला रही बीजेपी सरकार से अब तीन निर्दलीय विधायकों ने समर्थन वापस ले लिया है. हालांकि, इसके बावजूद मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और पूर्व सीएम मनोहर लाल खट्टर को बीजेपी सरकार न गिरने का पूरा भरोसा है.

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हरियाणा के सीएम नायब सिंह सैनी. (फाइल फोटो)
हरियाणा के सीएम नायब सिंह सैनी. (फाइल फोटो)

हरियाणा में नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बने अभी दो महीने भी नहीं हुए कि उनकी सरकार पर संकट खड़ा हो गया है. ये संकट तब खड़ा हुआ, जब मंगलवार को अचानक तीन निर्दलीय विधायकों ने सैनी सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान कर दिया. इतना ही नहीं, इन विधायकों ने कांग्रेस को समर्थन देने की बात कही है.

जिन विधायकों ने सरकार से समर्थन वापसी का ऐलान किया है, उनमें दादरी से विधायक सोमवीर सांगवान, पुंडरी से विधायक रणधीर सिंह गोलेन और नीलोखेड़ी से विधायक धरमपाल गोंदेर हैं.

तीन विधायकों के पाला बदलने के बाद विपक्ष भी अब एक्शन मोड में आ गया है. बुधवार को ही कभी बीजेपी के साथ सरकार में शामिल रही जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) ने राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय को चिट्ठी लिखकर फ्लोर टेस्ट कराने की मांग की है. इसके साथ ही जेजेपी ने ये भी लिखा है कि वो सरकार बनाने वाली किसी भी राजनीतिक पार्टी का समर्थन करने के लिए तैयार है. 

इससे पहले जेजेपी नेता और पूर्व डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने कहा था कि वो बीजेपी सरकार गिराने के लिए कांग्रेस का साथ देने के लिए तैयार हैं. चौटाला ये भी कह चुके हैं कि जेजेपी अब बीजेपी के साथ नहीं जाएगी.

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वहीं, हरियाणा विधानसभा में विपक्ष के नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा ने भी राज्यपाल को चिट्ठी लिखकर मिलने का समय मांगा है. उन्होंने दावा किया कि बीजेपी सरकार अल्पमत में आ गई है और नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री को इस्तीफा दे देना चाहिए.

इतना सबकुछ होने के बावजूद मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी 'कॉन्फिडेंट' हैं. उनका दावा है कि उनकी सरकार पर कोई खतरा नहीं है. पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने तो कुछ विधायकों के साथ संपर्क में होने का दावा भी किया. उन्होंने ये भी कहा कि चिंता करने की कोई बात नहीं है.

पर ऐसा क्यों?

हरियाणा विधानसभा में 90 सीटें हैं. मौजूदा समय में 88 विधायक हैं. मनोहर लाल खट्टर और रंजीत सिंह के इस्तीफे के बाद दो सीटें खाली हैं. दोनों ही लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं.

हरियाणा में अभी बीजेपी के 40, कांग्रेस के 30, जेजेपी के 10, हरियाणा लोकहित पार्टी (एचएलपी) और इंडियन नेशनल लोक दल (इनेलो) का 1-1 और 6 निर्दलीय विधायक हैं. बहुमत के लिए 45 विधायकों के समर्थन की जरूरत है. 

बीजेपी का दावा है कि उसके पास 47 विधायकों का समर्थन है. इनमें 40 विधायक तो बीजेपी के ही हैं. दो निर्दलीय, हरियाणा लोकहित पार्टी के गोपाल कांडा और जेजेपी के चार विधायकों के समर्थन का दावा है.

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न्यूज एजेंसी के मुताबिक, जेजेपी विधायक जोगी राम सिहाग और राम निवास सुरजाखेड़ा ने लोकसभा चुनाव में बीजेपी को समर्थन देने का ऐलान किया है. इन दोनों के अलावा जेजेपी के दो और विधायक देवेंदर बबली और राम करण काला भी बगावती तेवर दिखा रहे हैं. आगे की रणनीति तय करने के लिए देवेंदर बबली ने तो 11 मई को अपने समर्थकों की बैठक भी बुलाई है.

अगर यही गणित देखें तो विपक्ष के पास 41 विधायक होते हैं. कांग्रेस के 30, जेजेपी के 6, इनेलो का 1 और 4 निर्दलीय. 

निर्दलीय हैं किंगमेकर?

हरियाणा विधानसभा में छह निर्दलीय विधायक हैं. इनमें से तीन- सोमवीर सांगवान, रणधीर सिंह गोलेन और धरमपाल गोंदेर खुलकर कांग्रेस के साथ आ गए हैं. 

बाकी बचे तीन में से एक नयन पाल रावत ने कहा कि 2019 में उन्होंने बीजेपी को बिना शर्त समर्थन दिया था और वो अब भी पार्टी के साथ हैं. बादशाहपुर से विधायक राकेश दौलताबाद भी बीजेपी के साथ हैं. 

वहीं, मेहम से निर्दलीय विधायक बलराज कुंडू ने अभी तक अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है. कांग्रेस ने स्थिति साफ करने और गवर्नर को समर्थन का पत्र लिखने की बात की है.

अब बन रही है दो स्थितिः-

- पहली स्थितिः अगर जेजेपी के 4 विधायक बागी हों

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सरकार के पासः बीजेपी के 40 विधायक + निर्दलीय 2 विधायक + एचएलपी 1 विधायक + जेजेपी के 4 बागी विधायक = 47 विधायक

विपक्ष के पासः कांग्रेस के 30 विधायक + जेजेपी के 6 विधायक + निर्दलीय 4 विधायक + इनेलो 1 विधायक = 41 विधायक

- दूसरी स्थितिः अगर जेजेपी के सारे विधायक एकजुट हों

सरकार के पासः बीजेपी के 40 विधायक + निर्दलीय 2 विधायक + एचएलपी 1 विधायक = 43 विधायक

विपक्ष के पासः कांग्रेस के 30 विधायक + जेजेपी के 10 विधायक + निर्दलीय 4 विधायक + इनेलो 1 विधायक = 45 विधायक

फिर भी खतरे में क्यों नहीं सैनी सरकार?

उसकी वजह है अविश्वास प्रस्ताव. सैनी सरकार ने दो महीने पहले ही विश्वास मत हासिल किया था. नियम कहता है कि अगर सदन में सरकार विश्वास या अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर चुकी है तो फिर अगला विश्वास या अविश्वास प्रस्ताव 6 महीने बाद ही लाया जा सकता है.

हरियाणा की सैनी सरकार ने 13 मार्च को विधानसभा में विश्वास मत पास किया था. हालांकि, सैनी सरकार ने ये विश्वास मत ध्वनि मत से हासिल किया था. यानी, कोई वोटिंग नहीं हुई थी.

हरियाणा विधानसभा के स्पीकर ज्ञान चंद गुप्ता ने कहा कि सैनी सरकार ने 13 मार्च को ही विश्वास मत हासिल किया था, तो कैसे कह सकते हैं कि सरकार अल्पमत में है? उन्होंने बताया कि आमतौर पर अविश्वास प्रस्ताव जब लाया जाता है तो उसके छह महीने बाद ही दूसरा अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है. 

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इस मामले में अगला अविश्वास प्रस्ताव अगस्त में ही लाया जा सकता है. वो इसलिए क्योंकि फरवरी में ही कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव लेकर आई थी. तब मनोहर लाल खट्टर सीएम थे और सरकार में जेजेपी भी शामिल थी. ये अविश्वास प्रस्ताव गिर गया था. 

खट्टर सरकार के खिलाफ ये अविश्वास प्रस्ताव 23 फरवरी को लाया गया था, इसलिए अब अगला अविश्वास प्रस्ताव 23 अगस्त के बाद ही लाया जा सकता है.

मौजूदा सियासी संकट पर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का कहना है कि उनकी सरकार ने मार्च में विश्वास मत जीता था और अगर दोबारा इसे हासिल करने की बात आती है तो समय आने पर इसे फिर हासिल किया जाएगा.

अब सारी गेंद राज्यपाल के पाले में

हरियाणा के पूरे सियासी संकट का हल अब राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय के पास है. जेजेपी ने राज्यपाल से तत्काल फ्लोर टेस्ट कराने की मांग की है. कांग्रेस विधायक और पूर्व सीएम भूपिंदर सिंह हुड्डा ने बताया कि सैनी सरकार अल्पमत में है और नैतिक आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए. कांग्रेस ने भी गवर्नर से मिलने का समय मांगा है.

ऐसे में अब सब कुछ राज्यपाल पर निर्भर है. अगर राज्यपाल चाहें तो बिना अविश्वास प्रस्ताव के ही सैनी सरकार को सदन में बहुमत साबित करने को कह सकते हैं. 

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जेजेपी ने राज्यपाल को लिखे पत्र में एसआर बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला भी दिया है. जेजेपी का कहना है कि बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया था कि राज्यपाल अपने विवेक के आधार पर सरकार को फ्लोर टेस्ट साबित करने को कह सकते हैं. 

जेजेपी ने अपनी चिट्ठी में अनुच्छेद 174 का हवाला भी दिया है. अनुच्छेद 174 राज्यपाल को विधानसभा सत्र बुलाने, स्थगित करने और विधानसभा भंग करने का अधिकार देता है.

हालांकि, इस पूरे सियासी संकट में विपक्ष एकजुट नहीं दिख रहा है. भूपिंदर हुड्डा का कहना है कि कांग्रेस के 30 विधायक तो साथ हैं, लेकिन जेजेपी के कुछ विधायक किसी और का समर्थन कर रहे हैं. हुड्डा का कहना है कि जेजेपी को अपने सभी दसों विधायकों को राज्यपाल के पास ले जाना चाहिए.

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