अभिनेत्री की फिल्म NH10 रिलीज हो गई है. फिल्म और खुद के बारे में उन्होंने एक्सक्लूसिव बातें की, पेश है उसी इंटरव्यू के कुछ अंश आपके लिए...
ये 'NH10 ' कहां से कहां तक है?
आपने तो सामान्य ज्ञान का सवाल पूछ लिया (हंसते हुए), वैसे NH10 (नेशनल हाईवे नंबर 10 ) गुड़गांव से शुरू होकर हरियाणा और राजस्थान से होते हुए आखिरकार पाकिस्तान में खत्म होता है.
ऐसा क्या था इस फिल्म में जिसकी वजह से आपने एक्टिंग के साथ साथ प्रोड्यूस करने की भी सोची?
देखिए ये जो हाईवे की घटना है ये किसी के साथ भी हो सकती है, चाहे वो लड़का हो या लड़की, क्योंकि बुरे लोग किसी के ऊपर भी हमला कर देते हैं. और यही बात मुझे अच्छी लगी और मैंने एक्टिंग के साथ साथ प्रोड्यूस करने की भी सोची.
मीरा के किरदार के लिए कुछ खास तैयारियां की आपने?
नहीं (हंसते हुए), अरे मैं मजाक कर रही हूं, स्क्रिप्ट के हिसाब से मुझे खुद को बहुत तैयार करना था, मुझे पता था कि 12 -12 घंटे तक दौड़ना होगा, तो उस हिसाब से मैं पूरी तैयारी कर रही थी. हमने वर्कशॉप भी की, क्योंकि 15वे मिनट में ही फिल्म स्टार्ट हो जाती है.
अपनी ऊर्जा को कायम रखने के लिए आप क्या कर रही थीं?
मैंने इंटरवल ट्रेनिंग की, जिसमें बहुत तेज भागना होता है फिर झटके से रुक जाते हैं, और यही प्रक्रिया बार बार दोहरानी होती है, तो मुंबई में मैंने अपने ट्रेड मिल पर और शूटिंग के दौरान ऑन लोकेशन वर्कआउट किया.
एक्टर या प्रोड्यूसर, किस काम में आप ज्यादा उत्साहित थीं?
एक्टिंग मेरे लिये नेचुरल है और ऑन सेट एक प्रोड्यूसर के रूप में भी कई चीजों का ध्यान रखना पड़ता है, तो दोनों ही रोल निभाने में मुझे काफी मजा आया.
ऑनर किलिंग पर आधारित आपकी फिल्म क्या सच्ची घटनाओं से प्रेरित है?
हां, फिल्म में कई ऐसी घटनाएं हैं जो सच्ची कहानियों से प्रेरित हैं, अखबार में छपी घटनाओं को डायरेक्टर नवदीप और लेखक सुदीप लेकर आया करते थे और हमारी फिल्म की स्टोरी में उसे प्रयोग में लाते थे.
'A' सर्टिफिकेट मिलने से आपको फिल्म प्रभावित होने का डर नहीं लगा?
फिल्म बनाते वक्त ही हमें लग गया था की A सर्टिफिकेट मिल सकता है, और कहानी की सच्चाई को बरकरार रखते हुए हमने कोई भी कोताही नहीं बरती, और वैसे भी हरेक फिल्म सबके लिये नहीं होती.
आपका ये सबसे अलग किरदार है, अपने कम्फर्ट जोन से हटकर ऐसा किरदार करना, रिस्क लेने जैसा नहीं लगता?
एक एक्टर के रूप में मैंने हमेशा अलग-अलग तरीके के किरदारों को किया है और यही कारण है कि मैं बहुत काम फिल्में करती हूं, इस फिल्म की कहानी ने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया और दर्शकों के लिये अलग किस्म की एक्टिंग करने का मौका भी मिला. मैंने एक ही तरह की फिल्मों का हिस्सा नहीं बनना चाहती.
क्या फिल्में आपके निजी ज़िंदगी को भी प्रभावित करती हैं ?
जी हां, मेरी 90 % ज़िंदगी फिल्में ही हैं, लोगों से मिलना, बातें करना, अलग अलग किरदार करना, यही जज्बा होता है एक एक्टर का. मैं सौभाग्यशाली हूं कि मैंने पीके और बॉम्बे वेलवेट जैसी फिल्में की है.
इस फिल्म के दौरान क्या आपको चोट भी लगी ?
हां, इतनी भाग दौड़ के बीच जब भी मैं सुबह उठती थी, तो अलग ही चोट महसूस होती थी, मुझे पता भी नहीं चलता था कि ये चोट कब लगी. वैसे एक फिजियोथेरेपिस्ट जोधपुर से आए हुए थे, तो वो पूरे टाइम हम सबका ख्याल रखते थे.
आप ही फिल्म की हीरो और हीरोइन दोनों हैं, आपको नहीं लगता कि सबसे ज्यादा भार आपके कंधों पर है?
देखिए लोग मेरी वजह से थिएटर तक तो आ जाएंगे लेकिन स्क्रिप्ट अगर गड़बड़ हुई तो कोई भी नहीं रुकता, तो कहानी का अहम योगदान होता है. सिर्फ एक एक्टर की वजह से फिल्म नहीं बनती.
आप किसी की बायोग्राफी का हिस्सा बनना चाहेंगी?
हां, मैं बायोग्राफी करना चाहूंगी. क्योंकि किसी इंसान के बारे में आपको बहुत कुछ जानने का मौका मिलता है, तो मैं जरूर बायोग्राफी करुंगी लेकिन किसकी, ये अभी नहीं बता सकती.
क्या आपको अली अब्बास ज़फर की फिल्म के लिये बुलाया गया है?
नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है.