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फिल्म रिव्यू: ऑनर किलिंग पर तमाचा है NH10

साल 2007 में एक थ्रिलर फिल्म आई थी 'मनोरमा सिक्स फीट अंडर'. इसे बनाया था टेक्सास से फिल्म मेकिंग का कोर्स करके आए नवदीप सिंह ने. फिल्म ने कुछ खास करामात तो नहीं दिखाई थी, लेकिन डायरेक्टर के कहानी कहने के ढंग को तवज्जो दी गई. नवदीप ने 8 साल बाद फिर से क्राइम और मिस्ट्री पर आधारित फिल्म बनाई है NH10.

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फिल्म NH10 का पोस्टर
फिल्म NH10 का पोस्टर

फिल्म का नाम: NH10
डायरेक्टर: नवदीप सिंह
स्टार कास्ट: , नील भूपलम, दर्शन कुमार
अवधि: 115.09 मिनट
सर्टिफिकेट: A
रेटिंग: 3 स्टार

साल 2007 में एक थ्रिलर फिल्म आई थी 'मनोरमा सिक्स फीट अंडर'. इसे बनाया था टेक्सास से फिल्म मेकिंग का कोर्स करके आए नवदीप सिंह ने. फिल्म ने कुछ खास करामात तो नहीं दिखाई थी, लेकिन डायरेक्टर के कहानी कहने के ढंग को तवज्जो दी गई. नवदीप ने 8 साल बाद फिर से क्राइम और मिस्ट्री पर आधारित .

कहानी:
यह कहानी है नेशनल हाईवे नंबर-10 की. मीरा (अनुष्का शर्मा) और उसका पति अर्जुन (नील भूपलम) दिल्ली के रहने वाले कामशुदा दंपति हैं. एक दिन मीरा के ऊपर कुछ लोगों का एक गिरोह हमला करने की कोशिश करता है. इस घटना के बाद से वह परेशान रहने लगती है और उसकी ये हालत देख कर अर्जुन उसे बाहर ले जाने का प्लान बनाता है. मीरा के जन्मदिन पर वह उसे शहर से बाहर ले जाता है और यहीं से शुरू हो जाती है कहानी नेशनल हाईवे नंबर-10 यानी NH10 की. फिल्म में आगे कुछ ऐसी घटनाएं घटती हैं, जिसकी वजह से हर पल मीरा और अर्जुन को अपनी जान बचाने के लिए मुश्कि‍लों का सामना करना पड़ता है. खास तौर पर जब सतबीर (दर्शन कुमार) और उसकी गैंग के लोग इस दंपति के पीछे पड़ जाते हैं. फिल्म के आखरि में मीरा एक जांबाज महिला की परिभाषा को परिपूर्ण करती है.

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क्यों देखें:
सबसे पहले डायरेक्टर नवदीप सिंह इस मायने में धन्यवाद के पात्र हैं कि उन्होंने 8 साल बाद वापसी के लिए ऑनर किलिंग संवेदनशील मुद्दे को चुना है. 'मैरी कॉम' में पतिदेव की भूमिका निभा चुके दर्शन कुमार निगेटिव किरदार के हर फ्रेम में बेहतरीन लगे हैं. नील भूपलम में कभी रणदीप हुडा तो कभी राजकुमार राव का अक्स नजर आता है. हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि वह पति की भूमिका में एक अच्छे सह-कलाकार साबित हुए हैं. लेकिन सबसे अधि‍क तारीफ के काबिल हैं. फिल्म उनके कंधों पर टिकी है और वह यह बात बखूबी जानती हैं. सही मायने में वह इस फिल्म में हीरो बनकर उभरी हैं.

अनुष्का ने अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलर फिल्म को स्वीकारा और मीरा के किरदार को जीवंत किया है. फिर चाहे वह पत्नी के रूप हो या फिर एक सरवाइवर के रूप में. खास तौर पर फिल्म के आखि‍री सीन में जब एक महिला सब कुछ सहकर बिना थके और रुके हाथ में सिगरेट जलाकर अपने इंतकाम को अंजाम देती है. फिल्म के जरिए जात-पात, ऑनर किलिंग और रूढ़िवादिता पर कड़ा प्रहार भी किया गया है.

फिल्म में एक गीत है 'आखिरी मंजिल सभी की, माटी का पलंग'. यह फिल्म की खूबसूरती को और भी खास बना देता है. कई डायलॉग भी जबरदस्त असर छोड़ते हैं. जैसे- 'गुड़गांव के मॉल खत्म होते ही सारे नियम कानून भी खत्म हो जाते हैं.'

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क्यों ना देखें:
अगर आपको मारपीट, गाली गलौच और हिंसा से परहेज है. या आप 18+ की श्रेणी में नहीं आते हैं. तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है.

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