कई बार दलीलें सुनकर यकीन नहीं होता- क्या हम उसी समाज का हिस्सा है, जिसमें रूढ़ियों को तोड़ने का सिलसिला सदियों पुराना है. जिस समाज में दकियानूसी परंपराओं को तोड़कर आजाद आबो-हवा तैयार करने वाले महानायक हुए, उसमें कला और अभिव्यक्ति को लेकर ऐसी तंग सोच. इतिहास गवाह है, जिस समाज में कलाओं पर पहरा बिठाने की कोशिश हुई, वो पूरी सभ्यता के विनाश का कारण बना. वो चाहे राजे रजवाड़ों का दौर हो या फिर आज के लोकतांत्रिक समाज का.
...तो 700 साल पुरानी रानी का लिबास कैसा हो, ये उस दौर के लोग तय करना चाहते हैं, जिसमें अपने सलीके के कपड़े पहनने की आजादी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है. विरोध हो रहा है परंपरा, विरासत और रानी होने की मर्यादा को लेकर. लेकिन जो किरदार सदियों से लोक कथा और कल्पना का हिस्सा हो, उसकी सूरत कैसे तय किया जाए? सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक अगर ऐसे किरदार का निर्वाह तो कलकार की चेतना पर छोड़ देना चाहिए. यहां तो पब्लिक प्रोटेस्ट के साथ सरकारों को भी ऐसी चेतना की परवाह नहीं दिखती. अगर ऐसा होता, न्यूड और एस दुर्गा जैसी फिल्म गोवा के 48वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह से बाहर नहीं होती.
फिल्म पद्मावती के चौतरफा विरोध के बीच ये खबर तो बहुत लोगों को मालूम ही नहीं हुई कि मराठी फिल्म 'न्यूड' और मलयालम फिल्म 'एस दुर्गा' को भारत के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह से बाहर क्यों कर दिया गया. ये फैसला केन्द्र सरकार का था, जिसका विरोध करते हुए समारोह के जूरी अध्यक्ष सुजॉय घोष ने इस्तीफा दे दिया.
न्यूड नाम की जिस फिल्म को गोवा समारोह में सरकार ने प्रदर्शन से रोका उसमें उन महिलाओं की कहानी है जो मुंबई जैस शहर में जिंदा रहने न्यूड मॉडल्स का काम करती हैं. इसमें ऐसी औरतों की मजबूरी और उनके संघर्ष को कहानी का आधार बनाया गया है.
दूसरी मलयालम फिल्म 'एस दुर्गा' है. जिसमें एक उत्तर भारतीय लड़की दुर्गा की कहानी है, जो अपने दोस्त के साथ सुनसान सड़क पर लिफ्ट लेने के चक्कर में ऐसी फंसती है कि उसके आगे तमाम कहानियां खुलती जाती हैं. रात के अंधेरे में जब सारे शरीफ सो जाते हैं, तो क्या-क्या होता है. लेकिन सरकार को लगता है ये फिल्म कई वर्जनाओं को तोड़ती है.
वर्जनाओं के नाम पर 'फायर' और 'वाटर' नाम की फिल्म के साथ क्या हुआ था इसका दंश आज भी सिनेमा की विरासत में जिंदा है. दीपा मेहता की फिल्म 'फायर' शहरी गृहस्थ के जिंदगी की तमाम विडंबनाओं और हर कमी के लिए औरत को जिम्मेदार ठहराने की मानसिकता पर चोट है, लेकिन विरोध का झंडा बुलंद करने वालों को दिखा सिर्फ देवरानी-जेठानी के बीच समलैंगिक संबंध.
वो विरोध शांत हुआ तो दीपा मेहता बनारस के विधवा आश्रम को लेकर फिल्म बनाने चली. तब उसकी शूटिंग तक नहीं होने दी गई. 'वाटर' नाम की वो फिल्म उस कुप्रथा को अमानवीय बताती है जिसमें 20 साल की नौजवान लड़की जब विधवा होती है तो भी उसे नई जिंदगी शुरू करने का मौका क्यों नहीं दिया जाता. क्यों उसे पूरी उम्र अपने अरमानों को कुचलने के लिए विधवा आश्रम भेज दिया जाता है. विरोध की वजह से फिल्म की शूटिंग श्रीलंका में बनारस घाट का सेट लगाकर पूरी की गई.
विरोध की ये सियासत उस दौर में और भी चरम पर पहुंची, जब हमारा समाज आधुनिकता और उदारवाद की नई रौशनी में आंखे खोल रहा था. शेखर गुप्ता की फिल्म 'बैंडिट क्वीन' इसकी बड़ी मिसाल है. फिल्म की कहानी एक ऐसे समाज को आईना दिखाती है, जिसकी सामंतशाही में एक दलित लड़की अपनी मान मर्यादा और इज्जत आबरू के साथ कुचली जाती है. वो मरती नहीं, जिंदा रहती है और खुद को अपने ऊपर हुए अत्याचार से भी बर्बर बदला लेने के लिए तैयार करती है. फिल्मकार ने वो हकीकत परदे पर जस की तस रख दी तो हाय तौबा मच गई. रेप सीन को लेकर न्यूडिटी से लेकर एक डकैत के महिमामंडन का हवाला देते हुए फिल्म को बैन करने की कोशिश की गई.