scorecardresearch
 

आजादी के बाद 'नील अक्षर नीचे' पर पहली बार बैन, तब से इन फिल्मों पर भी विरोध का साया

1959 में 'नील अक्षर नीचे' केंद्र सरकार के हाथों बैन होने वाली पहली देशी फिल्म बनी, तो 1963 में 'नाइन आवर्स टू राम' पहली विदेशी फिल्म. ब्रिटिश डाइरेक्टर मार्क रॉबसन की ये फिल्म एक साल पहले छपे इसी नाम के उपन्यास पर आधारित थी. जिसमें महात्मा गांधी की हत्या के ठीक पहले नाथूराम गोडसे की तैयारियों की कहानी दिखाई गई थी.

Advertisement
X
नील अक्षर नीचे फिल्म की तस्वीर
नील अक्षर नीचे फिल्म की तस्वीर

आजादी की जिस आधी रात हिंदुस्तान को ये कहते हुए नेहरू ने जगाया था- उस देश का सिनेमा कभी उस सपने से पीछे नहीं हटा. आजाद आबो-हवा में जमीनी हकीकत की अंगड़ाईयां सिनेमा के कल्पना लोक में जैसे गोते लगाने लगी. 'नील अक्षर नीचे' उस दौर के वर्तमान से लेकर इतिहास से उठे किरदार हिंदी सिनेमा के परदे को जगमगाने लगे.

असहमतियों के सुर तब भी उठा करते थे, ऐसा मुगल-ए-आजम के साथ भी हुआ करते थे. मगर विरोध हिंसक तब भी नहीं हुआ, जब जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने 'नील अक्षर नीचे' जैसी फिल्म पर बैन करने का पहला फरमान सुनाया.

1959 में आई उस फिल्म का केन्द्रीय किरदार एक चाइनीज मूल का था, जिसे बसंती नाम की एक लड़की से प्यार होता है, इस कहानी में तब राजनीतिक टीका टिप्पणी कुछ ऐसी हुई कि सरकार ने उसे 2 साल तक रिलीज नहीं होने दिया.

Advertisement

'नाइन आवर्स टू राम'

1959 में 'नील अक्षर नीचे' केंद्र सरकार के हाथों बैन होने वाली पहली देशी फिल्म बनी, तो 1963 में 'नाइन आवर्स टू राम' पहली विदेशी फिल्म. ब्रिटिश डाइरेक्टर मार्क रॉबसन की ये फिल्म एक साल पहले छपे इसी नाम के उपन्यास पर आधारित थी. जिसमें महात्मा गांधी की हत्या के ठीक पहले नाथूराम गोडसे की तैयारियों की कहानी दिखाई गई थी.

कहानी पूरी तरह पुलिस जांच और दूसरे तथ्यों पर आधारित थी लेकिन सरकार को आपत्ति थी गोडसे के किरदार को लेकर. सरकार ने इसे भारत में रिलीज करना सदभाव के माहौल के लिए उचित नहीं माना. सदभाव बिगड़ने की ऐसी ही कसौटी पर गरम हवा भी कसी गई. जिसमें बंटवारे की पृष्ठभूमि में एक मुस्लिम परिवार की दशा दिखाई गई.

'किस्सा कुर्सी का'

1970 के दशक में सबसे चर्चित विरोध 'किस्सा कुर्सी का' जैसी फिल्म को बैन करने को लेकर हुआ. ये आपातकाल का दौर था और फिल्म में इसी दौर की सरकारी तानाशाही को निशाना बनाया गया था. ये फिल्म 1977 में बनी नई जनता पार्टी सरकार ने इसे रिलीज कराया.

राम तेरी गंगा मैली... भी टलती रही

सियासी संवेदनाओं की वजह से गुलजार की फिल्म 'आंधी' को भी सरकार और सेंसर बोर्ड के रुख का सामना करना पड़ा. इस फिल्म की रिलीज भी 1975 में महीनों तक टलती रही. इसके बाद के दौर में 'सत्यम शिवम सुंदरम' और 'राम तेरी गंगा मैली' जैसी फिल्में मार्मिक होते हुए भी अपने कुछ बोल्ड सीन्स की वजह से विवादों में आई लेकिन ऐसा कोहराम नहीं मचा, जैसा आज मच रहा है.

Advertisement

'फना' और 'माय नेम इज खान'

आमिर खान की 'फना' और 'माय नेम इज खान' के खिलाफ हल्ला बोल इनके सितारों के निजी बयानों को लेकर बोला गया. 2006 में आमिर खान ने नर्मदा बचाओ आंदोलन की पैरोकारी की थी, इसके बदले फिल्म और आमिर के खिलाफ मुहिम छेड़ दी गई.

इसी तरह साल 2010 में माई नेम इज खान का विरोध इसलिए हुआ क्योंकि उस साल के आईपीएम में शाहरुख खान ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों के खेलने की वकालत कर डाली. बस क्या था, शाहरुख की फिल्म के साथ उन्हें पाकिस्तान भेजने के नारे लगने लगे.

'आरक्षण' पर भी विवाद

इसी तरह 2011 में आई प्रकाश झा की 'आरक्षण' को कई राज्यों में बैन कर दिया गया. फिल्म अपनी तरह से वोट वैंक की राजनीति को निशाना बनाती है, लेकिन विरोध की आंच उठी जातिगत आधार पर टीका टिप्पणियों को लेकर.

'ओ माई गॉड' और 'पीके' का भी विरोध

विरोध की आग में धर्म की ज्वाला इन दो फिल्मों के साथ धधकी. प्रियदर्शन की 'ओ माई गॉड' और राजकुमार हिरानी की 'पीके'. ये दोनों ही फिल्म ईश्वर-अल्ला-भगवान के ठेकेदारों के नकाब उतारती है. लेकिन विरोध करने वालों के सुर देखिए, इसमें उन्हें अपने अपने ईश्वर के वजूद पर सवाल उठता दिखा. हिरानी की फिल्म 'पीके' की पटकथा को ऑस्कर कमेटी ने भी सराहा. आडंबरों पर चोट करने के लिए जिस तरह की कथभूमि तैयार की गई, वो वाकई काबिल-ए-तारीफ थी. अगर इस तरह का अंध विरोध काबू न किया जाए तो ये हर किस्म की कलाकारी का गला घोंटने वाली बात होगी.

Advertisement
Advertisement