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महाराष्ट्र बंद से बॉलीवुड में गुस्सा, इन सेलेब्स ने जताई नाराजगी

बुधवार को हुए महाराष्ट्र बंद की कई बॉलीवुड सेलेब्स ने निंदा की है. इसमें राहुल ढोलकिया, अनुभव सिन्हा, पुलकित सम्राट और विशाल ददलानी समेत कई सेलेब्स शामिल हैं.

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महाराष्ट्र में प्रदर्शन की तस्वीर
महाराष्ट्र में प्रदर्शन की तस्वीर

पुणे में भीमा-कोरेगांव लड़ाई की 200वीं सालगिरह पर भड़की हिंसा के बाद दलित पार्टियों ने बुधवार को महाराष्ट्र बंद का आह्वान किया. गुस्साए दलितों ने प्रदर्शन किए, पत्थरबाजी की, रेल और सड़क यातायात रोका. जिसकी वजह से मायानगरी मुंबई में फिल्म और टीवी जगत की हस्तियों को मुश्किल का सामना करना पड़ा. कई बॉलीवुड सेलेब्स ने इस बंद की आलोचना की है.

राहुल ढोलकिया, अनुभव सिन्हा, पुलकित सम्राट और विशाल ददलानी समेत कई सेलेब्स ने ट्विटर पर निंदा की है. बता दें, महाराष्ट्र बंद की वजह से फिल्म सोनू के टीटू की स्वीटी और संजय सूरी की फिल्म के ट्रेलर लॉन्च का प्रोग्राम कैंसल हुआ.

अशोक पंडित ने ट्वीट किया, हिंसा के डर की वजह से लोग अपने काम पर नहीं गए. जिसके कारण फिल्म सिटी और दूसरी जगहों पर फिल्म और टीवी की शूटिंग रुक गई. यह दुखद है.

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अनुभव सिन्हा ने घटना की निंदा करते हुए कहा, मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं छोटे बच्चों को कैसे समझाऊं कि आज महाराष्ट्र में क्या हुआ. उन्हें समझाने के लिए मुझे क्या कहना चाहिए. वो जानना चाहते हैं.

एक्टर पुलकित सम्राट ने ट्विटर पर लिखा, एक ही विश्वास को मानने वाले इंसानों ने जाति की लड़ाई शुरू कर दी है. हमेशा हम कारण ढूंढ लेते हैं.

म्यूजिक कंपोजर विशाल ददलानी ने लिखा, जाति-धर्म लोगों के बीच सबसे निंदनीय, सबसे राष्ट्र-विरोधी बंटवारा है. जो लोग इन बेवकूफियों और पुरानी लाइनों के साथ मानवता को बांटने की कोशिश करते हैं. ऐसे लोग जीवन में कई दुखों का सामना करते हैं.

आखिर क्या है भीमा कोरेगांव की लड़ाई

बता दें कि भीमा कोरेगांव की लड़ाई 1 जनवरी 1818 को पुणे स्थित कोरेगांव में भीमा नदी के पास उत्तर-पू्र्व में हुई थी. यह लड़ाई महार और पेशवा सैनिकों के बीच लड़ी गई थी. अंग्रेजों की तरफ 500 लड़ाके, जिनमें 450 महार सैनिक थे और पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28,000 पेशवा सैनिक थे, मात्र 500 सैनिकों ने पेशवा की शक्तिशाली 28 हजार मराठा फौज को हरा दिया था.

हर साल नए साल के मौके पर महाराष्ट्र और अन्य जगहों से हजारों की संख्या में पुणे के परने गांव में दलित पहुंचते हैं, यहीं वो जयस्तंभ स्थित है जिसे अंग्रेजों ने उन सैनिकों की याद में बनवाया था, जिन्होंने इस लड़ाई में अपनी जान गंवाई थी. कहा जाता है कि साल 1927 में डॉ. भीमराव अंबेडकर इस मेमोरियल पर पहुंचे थे, जिसके बाद से अंबेडकर में विश्वास रखने वाले इसे प्रेरणा स्त्रोत के तौर पर देखते हैं.

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