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Gullak Season 5 Review: बदल गया मिश्रा परिवार के घर का माहौल, उठे कई सवाल, कैसी है 'गुल्लक 5'?

जिसका सभी को इंतजार था, वो दिन आ ही गया यानी 'गुल्लक' सीजन 5. जिसे श्रेयंश पांडे और अभय राउत ने डायरेक्ट किया है. गुल्लक सीजन 5 अब SonyLIV पर स्ट्रीम हो रहा है.

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गुल्लक 5 का रिव्यू (Photo: Instagram/sonylivindia)
गुल्लक 5 का रिव्यू (Photo: Instagram/sonylivindia)
फिल्म:गुल्लक 5
3.5/5
  • कलाकार : जमील खान, गीतांजलि कुलकर्णी, हर्ष मायर, सुनीता राजवार, हेली शाह और अनंत जोशी
  • निर्देशक :श्रेयांश पांडे और अभय राऊत

जब साल 2019 में 'गुल्लक' की खनक पहली बार सुनाई दी थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि संतोष मिश्रा के घर का एक-एक कोना दर्शकों का अपना घर बन जाएगा. पिछले चार सीजन में हमने अन्नू को बेरोजगार से जिम्मेदार बनते देखा और अमन को हाफ पैंट से कॉलेज में आते देखा. अब टीवीएफ (TVF) लेकर आया है 'गुल्लक सीजन 5'.

मिश्रा जी के आंगन में अब नई तरह की चुनौतियां खड़ी हैं. क्या पांचवीं बार भी यह सीरीज पुराना जादू चला पाई है? क्या 7 एपिसोड की यह सीरीज इस वीकेंड आपके समय के काबिल है? चलिए खंगालते हैं इस बार की गुल्लक को और जानते हैं कि संतोष बाबू का परिवार इस बार हमारे दिलों को कितना छू पाया?

पहले जानिए गुल्लक 5 की कहानी
सीजन 5 की शुरुआत संतोष (जमील खान) के घर की पुताई करवाने से होती है- लेकिन वह घर का रंग नहीं बदलवाता. हालांकि परिवार को एक बड़ा 'लाइफ अपडेट' भी मिल रहा है. घर में नया वाई-फाई कनेक्शन आ चुका है और पूरा परिवार धीरे-धीरे ही सही, लेकिन बदलते वक्त की रफ्तार से कदम मिलाने की कोशिश कर रहा है. आनंद (अनंत जोशी) डॉक्टर प्रीति का दिल जीतने की कोशिश करने के साथ ही नौकरी में तरक्की की जद्दोजहद में जुटा है. वहीं अमन (हर्ष मयार) का काम आप सीरीज में देखिए तो शायद ज्यादा मजा आएगा. 

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इसी बीच, शांति (गीतांजलि कुलकर्णी),  'बिट्टू की मम्मी' (सुनीता राजवार) के नए जुनून-'सखी शालिनी महिला ग्रुप' से काफी परेशान है. वहीं संतोष का सपना है कि वह सरकारी कोटे से एक नया घर खरीदे. प्रीति (हेली शाह) अपनी खुद की पहचान बनाने पर ध्यान दे रही है, और आनंद हर कदम पर उसका साथ दे रहा है. अब सवाल उठता है कि क्या प्रीति, आनंद के प्यार को पहचान पाएगी? क्या संतोष नया घर खरीद पाएगा? और क्या शांति आखिरकार 'नहीं' कहना सीख पाएगी? 

महिलाओं के मुद्दों को छूकर निकली सीरीज
यह सीजन सिर्फ हंसाता नहीं है, बल्कि 'सखी शालिनी महिला मंडल' वाले ट्रैक के जरिए महिलाओं की स्थिति पर कुछ बहुत जरूरी और संजीदा सवाल भी उठाता है. सीरीज बहुत ही सलीके से सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हमारे समाज में महिलाओं को उनके खुद के नाम से क्यों नहीं पुकारा जाता? वो हमेशा किसी की मम्मी या किसी की पत्नी बनकर क्यों रह जाती हैं? घर के थका देने वाले काम, पति-बच्चों की सेवा और नारीवाद (Feminism) पर इस सीजन में कुछ ऐसी बातें कही गई हैं, जो सीधे दिल पर चोट करती हैं और दर्शक को सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं. ये चैप्टर आज के समाज पर एक हल्का सा कटाक्ष भी करता है.

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एक्टिंग में सभी ने किया कमाल
अनंत जोशी ने आनंद (यह किरदार पहले वैभव राज गुप्ता ने निभाया था) का किरदार बहुत आसानी से निभा दिया. वैसे किसी जाने-पहचाने चेहरे की जगह लेना कभी आसान नहीं होता, लेकिन अनंत, वैभव राज गुप्ता की कमी बिल्कुल महसूस नहीं होने देते. गीतांजलि कुलकर्णी इस सीजन की सबसे बड़ी हाईलाइट बनकर उभरी हैं. जिसे देख आप कहेंगे कि उनकी जगह कोई ले ही नहीं सकता. वहीं सुनीता राजवार क्रांतिकारी अंदाज में एक बार फिर आपके सब्र का इम्तिहान लेती हैं लेकिन सोचने पर मजबूर करती हैं. जमील खान, एक उसूलों वाले लेकिन दबाव में घिरे संतोष के तौर पर अपनी जगह बनाए रखते हैं. अपनी सिग्नेचर स्माइल के साथ वो सभी मुसीबतों को निपटा देते हैं. गोपाल दत्त का कैमियो भी जमा है. वहीं हेली शाह की एंट्री कहानी में एक फ्रेशनेस लेकर आती हैं. अनंत के साथ उनकी ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री काफी नेचुरल और देखने लायक है.

इस सीजन में कुल 7 एपिसोड हैं. पहले तीन एपिसोड काफी मजेदार और हल्के-फुल्के हैं. इसके बाद असली खेला शुरू होता है. मिश्रा परिवार के नए घर के सपने के इर्द-गिर्द. एक नया घर खरीदने के लिए बैंक से लोन लेने की जद्दोजहद, नौकरी का तीखा संघर्ष और इन सबके बीच मां-बाप का बच्चों पर अटूट विश्वास- यह सब कुछ इन 7 एपिसोड्स में बहुत ही संवेदनशीलता के साथ पिरोया गया है. 

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कहां नजर आई कमी?
मैं पहले ही इस बात का जिक्र कर दूं कि तकनीकी तौर पर गुल्लक 5 को बहुत की खूबसूरती के साथ शूट किया गया है. सीरीज के कुछ डायलॉग बहुत असरदार है. जैसे, 'जिस वाद के आगे नारी हो वो साहूवाइन या मिश्राइन को नीचा नहीं दिखता.' इसके लिए श्रेयंश पांडे और अभय राउत तारीफ के हकदार हैं. लेकिन आज भारत के घर-घर में जिस होम लोन का बोलबाला है, वो विचार बिना किसी गहरी चर्चा के ही निपटा दिया. नारीवाद के मुद्दे ने थोड़ा बहुत सोचने पर जरूर मजबूर किया लेकिन नाम और काम तक ही सीमित रह गया.  

तो कुल मिलाकर तमाम नए बदलावों, अपग्रेड्स और पारिवारिक उथल-पुथल के बीच 'गुल्लक' इस बार भी अपनी मूल भावना से भटकी नहीं है. इसे देखना बिल्कुल भी मिस नहीं करना चाहिए.

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