होली आते ही होली गीतों की तलाश शुरू हो जाती है, जो अक्सर बॉलीवुड फिल्मों के होली वाले गानों पर जाकर रुकती है. वैसे तो होली पर बहुत सारे पारंपरिक लोकगीत भी बहुत पॉपुलर हैं. लेकिन फिल्मों के होली गीत अब लगभग लोकगीतों की तरह अपनी जगह बना चुके हैं. जैसे- 'रंग बरसे', 'अंग से अंग लगाना' और 'होली खेले रघुबीरा' जैसे गानों को ही ले लीजिए.
लेकिन होली और फिल्मों से ऑब्सेस्ड कल्चर में एक हैरानी और विडंबना की बात है कि हम अपने सबसे शुरुआती फिल्मी होली गीत खो चुके हैं. हाल ये है कि इंटरनेट पर 'सबसे पहला फिल्मी होली गीत' की जानकारी भी गलत मिलने लगी है और अधिकतर लोगों तक यही पहुंच रही है.
हिंदी फिल्मों का पहला होली गीत
हर साल होली पर ये जिक्र निकल आता है कि हिंदी फिल्मों का पहला होली गीत फिल्म 'औरत' (1940) में मिलता है. ये डायरेक्टर महबूब खान की वही फिल्म है, जिसका रीमेक करके उन्होंने 1957 में आइकॉनिक फिल्म 'मदर इंडिया' बनाई थी. 'मदर इंडिया' का गाना 'होली आई रे कन्हाई' आज भी होली पर खूब बजाया जाता है.
'मदर इंडिया' की तरह ही ऑरिजिनल फिल्म 'औरत' में भी स्क्रीन पर होली सेलिब्रेट की गई थी. म्यूजिक कंपोजर अनिल बिस्वास ने इस फिल्म के लिए दो होली गीत तैयार किए थे- 'जमुना तट श्याम खेलें होली' और 'आज होली खेलेंगे साजन के संग'. लेकिन पहले फिल्मी होली गीत पर 'औरत' का दावा सही नहीं है.
'औरत' 1940 की मई में रिलीज हुई थी. लेकिन उसी साल मार्च में एक फिल्म आई थी, जिसका टाइटल ही 'होली' था. कंपोजर खेमचंद प्रकाश ने इसमें होली का एक गाना 'फागुन की रुत आई रे' दिया था. सितारा देवी और अमृतलाल की आवाज में ये गाना आज भी उपलब्ध है. लेकिन 'पहले फिल्मी होली गीत' का दावा इससे पहले भी मौजूद है.
हिंदी फिल्मों की पहली महिला म्यूजिक कंपोजर्स में से एक सरस्वती देवी ने 1937 में आई फिल्म 'जीवन प्रभात' में एक होली गीत दिया था. होली के उत्साह को बेहतरीन अंदाज में कैप्चर करने वाले गाने 'होली आई रे कन्हाई ब्रिज के बसिया' में उन्होंने आवाज भी दी थी. ये गाना अभी भी यूट्यूब पर खोजने से मिल जाता है. लेकिन होली के जो गीत फिल्मों में सबसे पहले आए, वो अब मिलते भी नहीं.
आवाज मिलते ही होली गीत गाने लगीं फिल्में
1913 में 'राजा हरिश्चंद्र' के साथ स्क्रीन पर उतरे इंडियन सिनेमा को 1930s में आकर आवाज मिली. 1931 में 'आलम आरा' के साथ फिल्मों ने बोलना शुरू किया. आवाज आई तो गाने भी आए और फिल्मों के 'म्यूजिक एल्बम' में अलग-अलग स्वाद के गाने फिट करने का खेल शुरू हो गया. होली का त्योहार फिल्मों और गानों में उल्लास और सेलिब्रेशन दिखाने के लिए एक परफेक्ट मौका देता है. शायद इसीलिए फिल्मों में आवाज आने के साथ ही होली के गाने भी आने शुरू हो गए.
1931 में ही तीन हिंदी फिल्मों में होली के गाने आ गए थे. इनमें से सबसे पहले कौन सी रिलीज हुई थी ये पक्के तौर पर कह पाना मुश्किल है क्योंकि तीनों की सटीक रिलीज डेट्स नहीं मिलतीं. 'दौलत का नशा' में फिल्म में होली सेलिब्रेट करता हुआ गाना था 'काहे मारे पिचकारी लाला हो'. इसी साल 'पाक दामन' फिल्म का गाना 'ना मारो भर पिचकारी जाऊं तोपे वारी' भी होली सेलिब्रेशन लेकर आया. 1931 में 'घर की लक्ष्मी' भी एक फिल्म आई थी, जिसमें होली का गीत 'मोपे डार गयो सारी रंग की गागर' था.
अगले ही साल 1932 में 'गुलरू जरीना' फिल्म में भी होली का एक गीत 'होरी मुझे खेल को टेसू मंगा दे' सुनाई दिया. लेकिन ये सारे गाने आज की तारीख में खोजने पर नहीं मिलते. ग्रामोफोन की भारत में एंट्री पहले ही हो चुकी थी, मगर फिल्मी गानों की ग्रामोफोन पर रिकॉर्डिंग 1934 में शुरू हुई. शायद ये भी एक वजह है कि शुरुआती फिल्मी गानों और फिल्मों के शुरुआती होली गीतों की रिकॉर्डिंग्स आसानी से नहीं मिलतीं.
माय स्वर (myswar.co) जैसी कुछ वेबसाइट्स ने कम से कम एक गाइड के तौर पर हिंदी के फिल्मी गानों का इतिहास सहेजने की कोशिश की है. वरना आने वाले सालों में इन गानों का नामोनिशान पूरी तरह मिट जाएगा. इसलिए एक फिल्म लवर के तौर पर हमारा सबसे छोटा कंट्रीब्यूशन शायद यही हो सकता है कि कम से कम अपने तीज-त्योहार पहली बार बड़े पर्दे पर उतारने वाली फिल्मों को याद करते रहें.