साल 2001 में आई सुपर डुपर हिट फिल्म गदर एक प्रेम कथा में पाकिस्तानी दरोगा सुलेमान का किरदार निभाने वाले अभिनेता विश्वजीत प्रधान ने आजतक से बातचीत में बताई गदर कैसे बनी ऑल टाइम फेवरेट.
फिल्म गदर का हिस्सा होना मेरे लिए गर्व की बात
भले ही मैं ज्यादातर फिल्मों में निगेटिव किरदार निभाया करता आ रहा हूं और फिल्म गदर में भी मैंने एक पाकिस्तानी दरोगा सुलेमान का किरदार निभाया है, लेकिन जब ये फिल्म मैने खुद थिएटर मेंं जाकर देखी तो देख भक्ति का जोश और पार्टिशन का दर्द भी महसूस किया. फिल्म के डायरेक्टर अनिल शर्मा मेरे मित्र हैं और बहुत बेहतरीन फिल्म मेकर भी. उन्होंने मुझे ये फिल्म ऑफर की जिसके लिए में उनका आभारी हूं और दर्शकों को मेरा काम पसंद आया और फिल्म भी इतनी बड़ी हिट साबित हुई सारे दर्शकों का उसके लिए शुक्रिया सिर्फ 20 साल ही नहीं 100 साल बाद भी ऐसी फिल्में याद की जाएंगी.
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पहले मेरी और सनी देओल की कुश्ती होनी थी लेकिन बाद में चली तलवार
फिल्म गदर से जुड़ा एक वाक्य आजतक के साथ साझा करते हुए अभिनेता विश्वजीत कहते है की पहले डायरेक्टर अनिल शर्मा ने मेरा यानी दरोगा सुलेमान और तारा सिंह यानी सनी देओल के बीच एक कुश्ती का सीन फिल्माए जाने का सोचा गया था. कई बार उसके लिए हमने वो सीन शूट करने की कोशिश भी की कभी टाइम की कमी तो कभी लोकेशन पसंद न आना और सबसे बड़ी बात की टाइम भी बचाना था. फिल्म जल्दी पूरी करने के लिए इसलिए हम वो कुश्ती वाला सीन नहीं फिल्म पाए."
उन्होंने आगे कहा, "जिसमें मेरे और तारा सिंह के बीच एक दंगल होता और गुस्से आकर तारा सिंह दरोगा सुलेमान को जमीन में सर के बाल गाड़ देता और इस तरह मेरे कैरेक्टर का अंत होता, लेकिन बाद में फिल्म के अंदर तारा सिंह की तलवार से मेरी गर्दन को काट कर मुझे मरते हुए दिखाया गया वो भी लोगों को बहुत पसंद आया, लेकिन मुझे लगता है की अगर हमारी कुश्ती वाला सीन फिल्म में शामिल होता तो इस सीन पर भी खूब तालियां बजती."
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सिनेमाघरों के हाउसफुल होने पर गदर के मॉर्निंग शो चलाने पड़े थे
अभिनेता विश्वजीत बताते है की फिल्म गदर की बात ही कुछ और थी. फिल्म जब 2001 में रिलीज हुई तो बॉक्स ऑफिस पर गदर मच गई. सारे सिनेमाघरों में जहां-जहां पर फिल्म गदर को दिखाया जा रहा था. हाउसफुल के चलते वहा एक्स्ट्रा मॉर्निंग शो दिखाना शुरू किया गया था. पंजाब में तो ये आलम था की लोग सुबह-सुबह सिनेमाघरों की टिकट विंडो के सामने आकर लाइन लगा लेते थे. ये फिल्म इस लिए भी खास थी क्योंकि वो लोग जिन्होंने भारत पाकिस्तान के बंटवारे की आग में अपनों को जलता देखा है जिन लोगों ने अपना घर दुकान जमीन जायदाद सब खो दिया, वो सब लोग इस कहानी से अपने आप को कनेक्ट कर पाए. उन्हें लगा की ये उनमें से ही किसी एक की कहानी है. फिल्म में भी उस दौर के कपड़े, वैसा ही माहौल, वैसी ही बोली, भाषा और रियलिटी को देख दर्शक फिल्म से जुड़े बिना नहीं रह पाए. मुझे याद है की फिल्म गदर देखने सारा परिवार एक साथ जाया करता था."