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प्रोपेगेंडा या स्पाई नहीं, जसकीरत के दर्द की कहानी है 'धुरंधर'

धुरंधर: द रिवेंज सिर्फ एक स्पाई थ्रिलर नहीं, बल्कि जसकीरत से हमजा बनने की दर्दनाक कहानी है. कैसे हंसता खेलता परिवार तबाह हो जाता है, और इस बदले हालात एक इंसान की पहचान छीन लेते हैं और उसे अपनों से दूर कर देते हैं. उसे उसके अपनों से दूर होने पर मजबूर कर देते हैं.

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स्पाई नहीं परिवार के बदले की कहानी है धुरंधर (Photo: Screengrab)
स्पाई नहीं परिवार के बदले की कहानी है धुरंधर (Photo: Screengrab)

कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिन्हें आप 'स्पाई थ्रिलर' या 'एक्शन ड्रामा' जैसे किसी एक खांचे में नहीं रख सकते. धुरंधर: द रिवेंज भी उन्हीं में से एक है. ऊपर-ऊपर से ये फिल्म आपको पाकिस्तान में हुई गहन जासूसी, साजिश और सिस्टम की कहानी लग सकती है, लेकिन जैसे-जैसे आप इसके भीतर उतरते हैं, एहसास होता है कि ये दरअसल एक इंसान के धीरे-धीरे टूटने और फिर खुद को एक खतरनाक शक्ल में जोड़ लेने की कहानी भी है.

ये कहानी है- जसकीरत सिंह रांगी से हमजा बनने की. और उससे भी ज्यादा, ये कहानी है- 'मेरी बहन कित्थे है' से 'मेरी बहन ने देखा तक नहीं' तक के सफर की.

जसकीरत से हमजा: एक नाम नहीं, एक मौत

फिल्म की शुरुआत में जसकीरत एक सीधा-सादा, अपने सिद्धांतों पर अडिग इंसान है. वो अपने पिता की तरह आर्मी ऑफिसर बनना चाहता है. उसकी दुनिया बहुत छोटी है उसका परिवार, उसकी मिट्टी, उसकी पहचान.

एक मामूली जमीनी विवाद में गांव का 'प्रतिष्ठित' नेता उसके हंसते खेलते परिवार को तबाह कर देता है. रिटार्यड फौजी पिता का कत्ल कर डालता है, तो वहीं एक बहन का रेप कर उसकी जिंदगी उसी के खेत में खत्म कर देता है. इतने पर भी उसकी क्रूरता खत्म नहीं होती तो एक और बहन को उठाकर अपने साथ ले जाता है. जहां परिवार के सभी मर्द उसके साथ गलत काम करते हैं.  

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फौजी बनने की ट्रेनिंग ले रहे जसकीरत को जब ये पता चलता है तो उसपर बदला लेने का खून सवार हो जाता है. उसे सिर्फ उसकी बहन चाहिए. वो दोस्त की मदद से हथियार जुटाता है और 'मेरी बहन कित्थे है' पूछते हुए... नेता के पूरे परिवार को खत्म कर डालता है. 

लेकिन फिर धुरंधर की दुनिया उसे ऐसी जगह लाकर खड़ा करती है जहां सही और जरूरी के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है. सिस्टम उसे नकार देता है, तो वो खुद को मिटा देता है. हमजा बनना उसका फैसला नहीं, उसकी मजबूरी बन जाती है. ये सिर्फ नाम बदलना नहीं, बल्कि खुद से खुद का किया अंतिम संस्कार है. जो एक चीज नहीं बदलती वह है- उसकी देशभक्ति. जो देशभक्ति पहले वो खुलेआम दिखा सकता था, अब वह अपने साए के जरिए भी जता नहीं सकता, वरना पकड़ा जाएगा.

कड़ी ट्रेनिंग लेकर वो जसकीरत सिंह रांगी से हमजा अली मजारी बन जाता है. इसके पीछे भी उसका मकसद सिर्फ देशभक्ति नहीं बल्कि एवज में परिवार को सरकार से मिलने वाला वो 30 हजार का गुजाराभत्ता है जो उसकी मां और बहन को मिलेगा.
 
हालांकि इसमें भी एक खास बात है, वो ये कि हमजा बनने के बाद भी जसकीरत मरता नहीं है. वो उसकी आंखों में, उसकी खामोशी में, हर फैसले के बाद झलकता है. तभी तो भारत वापस आने के बाद जब हाई अथॉरिटी उसे अगले दिन सुबह 8 बजे आने को कहती है, तो वो सब कुछ भूलकर वहां से भाग जाता है और सीधा अपने गांव पहुंचता है.

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बहन ने किया अनदेखा...

यहां गाने भी कमाल करते हैं. धुरंधर का सबसे बड़ा जादू इसके गानों में छिपा है. यहां म्यूजिक सिर्फ बैकग्राउंड नहीं, बल्कि कहानी को जोड़ने वाला सीमेंट है. क्लाइमैक्स में जब जसकीरत अपने घर लौटता है… सामने मां और बहन होती हैं… लेकिन वो उसे देखती तक नहीं.

बैकग्राउंड में जैस्मीन सैंडलस की बुलंद आवाज में गूंजता है- 'पट्टलां चों डिग्दे हंजू, अख मेरी फिर वी रोई ना… पूरा शहर बेगाना, इथे मेरा कोई ना.'

वो रोता है. एक आखिरी उम्मीद के साथ...फिर पीछे देखता है. फिर घर की ओर...मां की ओर देखता है. लेकिन दरवाजा बंद हो जाता है. और जसकीरत वहीं खड़ा रह जाता है. उसके रोम...रोम... सिर्फ रो रहा है. अपने दर्द की कहानी बयां कर रहा है.

और इसी के साथ साढ़े तीन घंटे की हिंसा देख रही ऑडियंस अचानक खामोश हो जाती है. क्योंकि अब वो हमजा नहीं, जसकीरत को महसूस कर रही होती है. और बैकग्राउंड में फिर गाना आता है- 'सानू सारियां विसर गइयां राहवां वे, केहरे पासे जाईए सज्जना… पट्टलां चों… सानू सारियां विसर गइयां राहवां वे, केढे पासे जाईए सज्जना…'

यहीं फिल्म एक लाइन में अपना पूरा मैसेज दे देती है. उसका घर अब उसका नहीं रहा. अब उसका वजूद मिट चुका है. जिस बहन को बचाने के लिए उसने उस एमएलए के घर के सभी मर्दों को मौत के घाट उतार दिया था. जिस परिवार के दर्द का बदला लेने के लिए उसने अपने फौजी बनने के सपने को सूली पर चढ़ा दिया था. वो परिवार भी अब उसका नहीं रहा. 

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फिल्म का सबसे बड़ा ट्रांसफॉर्मेशन एक्शन में नहीं, इमोशन में है. एक वक्त था जब जसकीरत अपने परिवार को ढूंढ रहा था- मेरी बहन कित्थे है? और एक वक्त आता है जब वही बहन सामने खड़ी होती है- लेकिन उसे पहचानती तक नहीं. 

यहीं पर धुरंधर स्पाई फिल्म से आगे निकल जाती है. ये किसी मिशन की नहीं, एक खोई हुई पहचान की कहानी बन जाती है.

प्रोपेगेंडा नहीं, एक इंसान की ट्रैजेडी

बहुत लोग इस फिल्म को प्रोपेगेंडा या सिर्फ स्पाई थ्रिलर के नजरिए से देख सकते हैं. लेकिन असल में ये उससे कहीं ज्यादा गहरी है. ये फिल्म सवाल पूछती है- क्या कोई इंसान जन्म से क्रिमिनल होता है? या हालात उसे ‘हमजा’ बनने पर मजबूर कर देते हैं?

धुरंधर: द रिवेंज को अगर आप सिर्फ एक्शन या देशभक्ति के चश्मे से देखेंगे, तो शायद इसका असली दर्द मिस कर देंगे. क्योंकि ये फिल्म गोलियों, मिशन और साजिशों के बीच छिपी उस खामोशी की कहानी है- जहां एक बेटा अपने घर के बाहर खड़ा होता है. पर वो अंदर नहीं जा सकता. क्योंकि वो मर चुका है उन लोगों के लिए जिनके लिए उसने अपनी पूरी जिंदगी कुर्बान कर दी. उस देश के लिए जिसके लिए वो एक दूसरे मुल्क में मारकाट करके आया है.
 
ये कहानी है- एक ऐसे इंसान की, जिसने सब कुछ किया लेकिन सबसे जरूरी चीज- अपना घर खो दिया.

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