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Roorkee assembly seat: क्या बीजेपी से यह सीट झटक पाएगी कांग्रेस

रुड़की विधानसभा (Roorkee assembly seat) में चार बार चुनाव हो चुके हैं. रुड़की क्षेत्र पहले उत्तर प्रदेश राज्य का ही एक भाग था लेकिन 2002 में परिसीमन के बाद रुड़की सहारनपुर उत्तर प्रदेश विधानसभा से हटाकर रुड़की विधानसभा कर दिया गया.

Roorkee assembly seat Roorkee assembly seat
स्टोरी हाइलाइट्स
  • रुड़की का नाम राजपूत मुखिया की पत्नी रूड़ी के नाम पर पड़ा
  • रुड़की को 7वें भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के रूप में मान्यता मिली
  • 2017 के चुनाव में कांग्रेस से बीजेपी में प्रदीप बत्रा को मिली जीत

आईआईटी कॉलेज के लिए मशहूर रुड़की उत्तराखंड के हरिद्वार जिले की विधानसभा सीट है. इस शहर की अपनी खासियत है. अबुल फजल की पुस्तक आइने-अकबरी के अनुसार रूरकी अथवा रूड़की सम्राट अकबर के परगना (महल) की राजधानी थी. 

रुड़की की प्राचीनता के अनुसार इसका नाम एक राजपूत मुखिया की पत्नी रूड़ी के नाम पर रखा गया. सहारनपुर गजट के सन 1887 के संस्करण में रूड़की को रुड़की के रूप में उच्चारित किया गया था. जबीता खान के शासन काल में इसके क्षेत्र को घटाकर एक नए क्षेत्र शकरौदा की स्थापना की गई जो राव कुतुब उददीन की जागीर थी.

18वीं सदी के मध्य में इसे गुर्जरों की रियासत लंढौरा में शामिल कर दिया था. यह राजा रामदयाल की मृत्यु (1813) तक गुर्जरों की रियासत में ही शामिल रहा. ब्रिटिश अधिग्रहण के दौरान यह केवल मिट्टी के घरों से बना हुआ एक साधारण सा गांव हुवा करता था. रुड़की के मौजूदा रूप का विकास सन 1840 में गंगनहर के निर्माण के साथ प्रारम्भ हुआ. फिर इंजीनियरिंग वर्कशाप, चर्च, स्कूल, इंजीनियरिंग कालेज और छावनी की स्थापना के बाद बहुत तेजी से इसका विकास होने लगा. सोलानी नदी के पानी को गंगनहर के दूसरी तरफ ले जाने के लिए सोलानी जलसेतु का निर्माण 150 वर्ष पहले किया था, जो कि इंजीनियरिंग का एक नायाब नमूना है.

रुड़की का राजनीतिक-प्रशासनिक इतिहास

रुड़की का सर्वप्रथम उल्लेख ब्रिटिश अभिलेखों में मिलता है. ब्रिटिश अभिलेखों के अनुसार 18वीं सदीं में रुड़की सोलानी नदी के पश्चिमी तट पर तालाब की मिट्टी से निर्मित कच्चे मकानों, भवनों का गांव हुआ करता था यहां कोई भी पक्का मकान या भवन नहीं था.

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उस समय यह गांव प्रशासनिक रूप से तात्कालिक सहारनपुर जिले के पंवार (परमार) गुर्जरों की लंढौरा रियासत जो पूर्व में झबरेड़ा रियासत हुआ करती थी उसका एक भाग था. सन 1813 में लंढौरा के गुर्जर राजा रामदयाल सिंह पंवार की मृत्यु के बाद उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाते हुए अंग्रेजों ने भू-अभिलेखों में रियासत का बहुत बड़ा हिस्सा खानाखाली दर्शाकर रुड़की सहित कई गांव और हिस्से रियासत से बाहर कर दिए और उन्हें ब्रिटिश शासन में मिला लिया, इस प्रकार 1813 में रुड़की पूरी तरह से ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया.

रुड़की तहसील की स्थापना

1826 के आसपास जनपद सहारनपुर की ज्वालापुर तहसील का मुख्यालय ज्वालापुर से रुड़की स्थानांतरित कर दिया गया और ज्वालापुर तहसील समाप्त कर रुड़की को परगना सहित तहसील बना दिया गया जिसका प्रभार एक ज्वाइंट मजिस्ट्रेट रैंक के अधिकारी को सौंपा गया साथ ही एक कोषागार अधिकारी व तहसीलदार को नियुक्त किया गया, इसके साथ ही रुड़की में एसडीएम आवास, कोषागार, तहसीलदार आवास का भी निर्माण किया गया. ज्वाइंट मजिस्ट्रेट का पद आज भी रुड़की में यथावत चला आ रहा है. रुड़की नगर में 1869 में ही नगर पालिका बोर्ड की स्थापना कर दी गई थी.

आईआईटी रुड़की के अभिलेखागार व रुड़की रेलवे स्टेशन से मिले पुराने दस्तावेजों के आधार पर यह नवीन खोज हुई है कि रुड़की नहर की खुदाई के दौरान मिट्टी व माल ढुलाई में आ रही दिक्कतों व लगने वाले अधिक समय को कम करने के लिए सर्वप्रथम 22 दिसंबर 1851 ई० में भाप के इंजन से चलने वाली देश की पहली दो डिब्बों की रेलगाड़ी (मालगाड़ी) मिट्टी और माल ढुलाई हेतू रुड़की व पिरान कलियर के बीच पटरी ट्रैक बिछाकर चलाई गई थी.

बाद में इंजन के खराब हो जाने व नहर का निर्माण कार्य पूरा हो जाने की वजह से रेलवे ट्रैक की आवश्यकता महसूस नहीं की गई, अत: ट्रैक को नहर निर्माण के उपरांत उखाड़ लिया गया तथा इंजन वापस इंग्लैंड भेज दिया गया. बाद में भाप से चलने वाले देश के उस पहले रेल इंजन की एक प्रतिकृति इंग्लैंड से पुन: मंगाकर रुड़की रेलवे स्टेशन पर रखी गई, जिसे प्रत्येक शनिवार कोयले की भाप से चलाया जाता है.

भारत का प्रथम तकनीकी विश्वविद्यालय 'यूनिवर्सिटी ऑफ रुड़की' (रुड़की विश्वविद्यालय) 1949 में अस्तित्व में आया. 21 सितंबर वर्ष 2001 में संसद में कानून पारित कर रुड़की विश्वविद्यालय को "राष्ट्रीय महत्व का संस्थान" घोषित करते हुए भारत सरकार ने इसे देश के 7वें भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के रूप में मान्यता दी.

राजनीतिक पृष्ठभूमि

हरिद्वार जिले की स्थापना 28 दिसंबर 1988 को उत्तर प्रदेश राज्य के सहारनपुर मंडल के अंतर्गत सहारनपुर जिले की हरिद्वार और रुड़की तहसीलों, मुजफ्फरनगर जिले की सदर तहसील के 53 गांवों और बिजनौर जिले की नजीबाबाद तहसील के 25 गांवों को मिलाकर हुई थी. 9 नवंबर 2000 को हरिद्वार नवगठित उत्तराखंड राज्य का हिस्सा बन गया.

रुड़की विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र उत्तराखंड के 70 निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है. हरिद्वार जिले में स्थित यह निर्वाचन क्षेत्र अनारक्षित है. 2011 की जनगणना के आधार पर रुड़की शहर की कुल आबादी 1,18,200 थी जिसमें पुरुष 63,434 तथा महिला 54,766 थी. 2012 में क्षेत्र में कुल 96,339 मतदाता थे. राज्य के गठन के बाद 2002 के विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र परिसीमन आदेश से यह सीट अस्तित्व में आई 2017 में इस क्षेत्र में कुल 1,12,238 मतदाता थे. यहां के मौजूदा विधायक भाजपा से प्रदीप बत्रा है.

रुड़की विधानसभा में चार बार चुनाव हो चुके हैं. रुड़की क्षेत्र पहले उत्तर प्रदेश राज्य का ही एक भाग था लेकिन 2002 में परिसीमन के बाद रुड़की सहारनपुर उत्तर प्रदेश विधानसभा से हटाकर रुड़की विधानसभा कर दिया गया. पहली बार रुड़की विधानसभा के विधायक सुरेश चंद जैन चुने गए जो भाजपा से मैदान में उतरे थे. दूसरी बार 2007 में भी रुड़की विधानसभा चुनाव में लोगों ने विधायक के रुप में सुरेश चंद जैन को ही चुना.

2012 रुड़की विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का कब्जा रहा और प्रदीप बत्रा कांग्रेस से विधायक बने. 2017 में रुड़की विधानसभा सीट पर बीजेपी ने जीत का परचम लहराया लेकिन विधायक प्रदीप बत्रा ही रहे क्योंकि उन्होंने कांग्रेस का दामन छोड़कर बीजेपी में अपनी किस्मत आज़माई और 12542 वोटों से बढ़त लेते हुए जीत को अपने पाले में डाल दिया.

सामाजिक तानाबाना
रुड़की विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में स्थित है. 2012 में क्षेत्र में कुल 96,339 मतदाता थे जबकि 2017 में 1,12,238 मतदाता रहे. 2013 में रुड़की शहर का आबादी क्षेत्र बढ़ने के कारण उत्तराखंड सरकार के द्वारा नगर पालिका रुड़की को नगर निगम बना दिया गया. नगर निगम का पहला मेयर यशपाल राणा निर्दलीय उम्मीदवार थे. यशपाल राणा ने कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशियों को हराकर जीत हासिल की थी.

रुड़की में जातीय समीकरण को देखा जाए तो 2011के आंकड़ों के आधार पर 72.72% हिन्दू, 23.62% मुस्लिम, 0.94% ईसाई, 1.54% सिख, बौद्ध, 0.06% और 1.02% जैन तथा अन्य 0.10% है. शहर की औसत साक्षरता दर 89.48% है जिसमें पुरुष साक्षरता दर 93.16% तथा महिला साक्षरता दर 85.23% है. अगर लिंग अनुपात की बात की जाये तो 863 तथा शिशु लिंग अनुपात 820 है.

2017 का जनादेश
2017 के विधानसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच रहा बीजेपी के प्रदीप बत्रा को 40,000 वोट मिले जबकि कांग्रेस प्रत्याशी सुरेश चंद जैन को 27,458 वोट मिले. दिलचस्प बात ये रही कि दोनों ही प्रत्याशियों ने एक-दूसरे की विरोधी पार्टियों का हाथ थामा था लेकिन प्रदीप बत्रा बीजेपी में जाने के बावजूद मुस्लिम वोटों को खींचने में कामयाब रहे.

सुरेश चंद जैन पहले से ही 2 बार विधानसभा चुनाव जीत चुके थे लेकिन जनता ने प्रदीप बत्रा को जनप्रतिनिधि के रूप में चुना और जीत का सेहरा उनके सिर पर सजा दिया. दोनों प्रत्याशियों की हार और जीत के बीच 12542 वोटों का अंतर रहा. इस चुनाव के दौरान कुल 62.75 फ़ीसदी वोटिंग हुई थी !

रिपोर्ट कार्ड
विधायक प्रदीप बत्रा का जन्म 12 सितंबर 1963 में रुड़की के एक व्यापारी परिवार में हुआ था. प्रदीप बत्रा ने पोस्ट ग्रेजुएशन तक पढ़ाई की है उन्होंने एमए की डिग्री बीएसएम कॉलेज रुड़की से ली है. विधायक प्रदीप बत्रा एक सफल बिजनेसमैन होने के साथ-साथ बहुत व्यवहारिक भी हैं.

स्कूल की पढ़ाई के साथ साथ वह हमेशा अपने पिताजी के काम में हाथ बटाया करते थे. कॉलेज तक आते-आते उन्होंने अपने पिताजी की चाय समोसा की दुकान को एक बड़े मिष्ठान भंडार में तब्दील कर दिया था जो आज प्रकाश स्वीट्स के नाम से जाना जाता है, प्रकाश स्वीट्स के अलावा प्रकाश होटल और प्रकाश रेस्टोरेंट भी विधायक प्रदीप बत्रा की मेहनत का एक बेहतरीन नमूना है.

बिजनेस सेटअप करने के बाद विधायक प्रदीप बत्रा 2008 में नगर पालिका के अध्यक्ष पद का टिकट भाजपा से मांग रहे थे लेकिन भाजपा ने यह टिकट उन्हें नहीं दिया जिससे नाराज होकर प्रदीप ने चुनाव निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीता. प्रदीप बत्रा का बैकग्राउंड मजबूत और एक सफल बिजनेसमैन होने के कारण 2012 में प्रदीप बत्रा ने कांग्रेस से रुड़की विधानसभा का चुनाव जीता जिसमें बीजेपी प्रत्याशी सुरेश चंद जैन 800 वोटों से हार गए थे.

2013-2014 में विधायक प्रदीप बत्रा को मुख्यमंत्री के पर्यटन सलाहकार के रूप में कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला. 2017 में मोदी लहर व एक जाना माना चेहरा होने के कारण विधायक प्रदीप बत्रा ने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया था. प्रदीप बत्रा कांग्रेस के उन बागी विधायको में शामिल थे जिन्होंने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामा था.

नगर पालिका अध्यक्ष रहते हुए प्रदीप बत्रा ने 'क्लीन सिटी ग्रीन सिटी' का नारा दिया और उस पर काम शुरू किया. विधायक पद पर रहते हुए प्रदीप बत्रा ने रुड़की में सीवरेज, पेयजल की सुविधा हेतु एडीबी का प्रोजेक्ट स्वीकार कराया. रुड़की में पंडित दीनदयाल ब्रिज का निर्माण भी विधायक प्रदीप बत्रा ने कराया.


 

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