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वह चुनाव जब जीते थे सबसे ज्यादा निर्दलीय... जानिए क्यों होती रही है निर्दलीयों के चुनाव लड़ने पर रोक की बात

लोकसभा चुनाव में बागी उम्मीदवार कई सीटों पर राजनीतिक दलों के लिए सिरदर्द बन गए हैं. बात निर्दलीयों पर आई तो चुनावी अतीत के पन्ने भी खंगाले जा रहे हैं. आजादी के बाद शुरुआती दो चुनावों में निर्दलीय सांसदों की तादाद अधिक रही तो वहीं इसके बाद निर्दलीय सांसदों की संख्या कभी कम कभी अधिक होती रही. लेकिन समय-समय पर निर्दलीयों के चुनाव लड़ने पर रोक की मांग को लेकर भी स्वर उभरे.

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संसद भवन (फाइल फोटो)
संसद भवन (फाइल फोटो)

लोकसभा चुनाव में उत्तर से दक्षिण तक बागियों ने सियासी दलों की टेंशन बढ़ा दी है. बिहार में पूर्णिया सीट इंडिया ब्लॉक में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के खाते में क्या गई, कांग्रेस के पप्पू यादव निर्दलीय ही चुनाव मैदान में उतर आए. राजस्थान की बाड़मेर सीट पर रवींद्र सिंह भाटी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की टेंशन बढ़ा रहे हैं. कर्नाटक में बीजेपी से बगावत कर केएस ईश्वरप्पा ने भी शिमोगा सीट से ताल ठोक दी है. बागी निर्दलीय ही चुनाव मैदान में उतर सियासी दलों का सिरदर्द बढ़ा रहे हैं.

चुनाव मैदान में ताल ठोक रहे निर्दलीय उम्मीदवारों को कोई वोटकटवा बता रहा है तो कोई डमी कैंडिडेट. हर कोई अपने-अपने हिसाब से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे नेताओं की कैटेगरी का निर्धारण कर रहा है. वोटकटवा और डमी कैंडिडेट की बहस के बीच अतीत के पन्ने भी पलटे जा रहे हैं. आजादी के बाद आम चुनाव के इतिहास में निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रदर्शन कब-कैसा रहा? आइए, नजर डालते हैं.

कब जीते थे सबसे ज्यादा निर्दलीय

निर्दलीय उम्मीदवार पहले चुनाव से ही चुनाव मैदान में उतरते आए हैं. 1951-52 के आम चुनाव में 37 निर्दलीय सांसद निर्वाचित हुए थे. दूसरे चुनाव में भी यह संख्या बढ़ी लेकिन तीसरे चुनाव में कुछ कमी आई. कभी कम तो कभी अधिक, हर चुनाव में निर्दलीय संसद पहुंचते रहे हैं. 1957 के चुनाव में 42 निर्दलीय संसद पहुंचे थे. दूसरी लोकसभा में निर्दलीय जीत का यह आंकड़ा अब तक सबसे अधिक रहा है.

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कब जीते कितने निर्दलीय

साल 1962 के तीसरे लोकसभा चुनाव में 20, 1967 में 35, 1971 में 14 निर्दलीय संसद पहुंचे थे. इमरजेंसी के बाद हुए 1977 और 1980 के चुनाव में नौ-नौ, 1984 में 13, 1989 में 12 निर्दलीय उम्मीदवार जीते थे. 1991 में केवल एक निर्दलीय जीत सका था जो किसी लोकसभा में निर्दलीयों का अब तक का सबसे कम प्रतिनिधित्व भी है. साल 1996 के चुनाव में नौ, 1998 और 1999 में छह-छह, 2004 में पांच, 2009 में नौ निर्दलीय चुनाव जीते थे.

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2014 से कैसा है रिकॉर्ड

साल 2014 और 2019 के चुनाव में निर्दलीय सांसदों की संख्या कम रही. 1991 को छोड़ दें तो इन दोनों चुनाव में निर्दलीय सांसदों की संख्या सबसे कम थी. 2014 में तीन निर्दलीय चुनाव जीतकर संसद पहुंचे तो वहीं 2019 में चार निर्दलीयों को जीत मिली थी. 2019 में महाराष्ट्र के अमरावती से नवनीत राणा, असम के कोकराझार से नबा कुमार सरानिया, दादरा और नगर हवेली से मोहनभाई सांजीभाई और कर्नाटक के मांड्या से सुमलता अंबरीश बतौर निर्दलीय जीतकर संसद पहुंचे थे.

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क्यों होती रही निर्दलीयों के लड़ने पर रोक की बात?

निर्दलीय उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर रोक की मांग को लेकर भी स्वर उठते रहे हैं. विधि आयोग ने भी 2015 में सरकार से जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा चार और पांच में संशोधन की सिफारिश करते हुए यह कहा था कि सिर्फ पंजीकृत राजनीतिक दल के उम्मीदवारों को ही लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने की इजाजत दी जाए. विधि आयोग का कहना था कि ज्यादातर निर्दलीय या तो डमी कैंडिडेट होते हैं या फिर गंभीरता से चुनाव नहीं लड़ते.

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