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कर्नाटक: किंगमेकर बनने की चाहत थी, किंग बनते नजर आ रहे हैं कुमारस्वामी

कांग्रेस ने जेडीएस नेता कुमारस्वामी को सीएम बनने पर बाहर से समर्थन देने का ऐलान किया है. एग्‍ज‍िट पोल के बाद जेडीएस को किंगमेकर बताया जा रहा था, लेकिन अब कुमारस्वामी किंग बनते नजर आ रहे हैं.

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एचडी देवगौड़ा और एचडी कुमारस्वामी (फाइल फोटो, क्रेडिट- Getty)
एचडी देवगौड़ा और एचडी कुमारस्वामी (फाइल फोटो, क्रेडिट- Getty)

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों से अब तस्वीर साफ होती नजर आ रही है. बीजेपी बहुमत से कुछ सीट दूर रुकती नजर आ रही है. इस बीच, बीजेपी को रोकने के लिए कांग्रेस ने एक बड़ा दांव खेल दिया है. कांग्रेस ने जेडीएस नेता कुमारस्वामी को सीएम बनने पर समर्थन देने का ऐलान कर दिया है. कांग्रेस डिप्टी सीएम का पद ले सकती है. एग्‍ज‍िट पोल के बाद जेडीएस को किंगमेकर बताया जा रहा था, लेकिन अब कुमारस्वामी किंग बनते नजर आ रहे हैं.

224 सीटों वाली राज्य विधानसभा की 222 सीटों पर पड़े मतों की गिनती मंगलवार सुबह 8 बजे से शुरू हुई. शुरुआत में कांटे की टक्कर दिख रही थी बीजेपी ने 100 का आंकड़ा तो पार किया. लेकिन बहुमत से थोड़ी दूर ही रही. ऐसे वक्त में कांग्रेस ने जेडीएस को आगे कर सरकार बनाने और बीजेपी को रोकने का दांव खेल दिया.

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दो दिन पहले से ही मिलने लगे थे संकेत

कर्नाटक चुनाव के नतीजे आने से दो दिन पहले ही सियासी गोटियां फिट की जाने लगी थीं. बीजेपी-कांग्रेस दोनों जहां एक तरफ बहुमत का दावा करते रहे, वहीं जेडीएस का सहयोग लेकर सरकार बनाने के प्लान-बी पर भी काम शुरू हो गया. क्योंकि एग्जिट पोल त्रिशंकु विधानसभा का इशारा कर रहे थे और त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में जेडीएस की भूमिका काफी अहम हो जाती. ऐसे में जेडीएस के कुमारस्‍वामी किंगमेकर साबित होते.

रविवार को ही मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने दलित सीएम का कार्ड खेल दिया. सिद्धारमैया ने ऐलान कर दिया कि अगर पार्टी दलित सीएम बनाती है तो वह अपनी दावेदारी छोड़ सकते हैं. उधर, जेडीएस के प्रवक्ता ने भी इस प्रस्ताव पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी. कांग्रेस पार्टी के दो बड़े नेता गुलाम नबी आजाद और अशोक गहलोत संभावित गठबंधन पर बात के लिए सोमवार को ही बेंगलुरु पहुंच गए. जब स्थिति त्रिशंकु विधानसभा की बन रही थी तभी दिल्ली से सोनिया गांधी का फोन गुलाम नबी आजाद को गया. सोनिया ने देवगौड़ा से बात कर जेडीएस को बाहर से समर्थन का ऐलान करने को कहा. यहीं से कर्नाटक चुनाव की तस्वीर बदल गई.

कांग्रेस के करीब क्यों जेडीएस?

भले ही चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस और जेडीएस के बीच बयानों के तल्ख तीर चले, लेकिन दोनों दल स्वाभाविक सहयोगी नजर आते हैं. जेडीएस की स्थापना एचडी देवगौड़ा ने 1999 में जनता दल से अलग होकर की थी. जनता दल की जड़ें 1977 में कांग्रेस के खिलाफ बनी जनता पार्टी से शुरू होती है. इसी में से कई दल और नेताओं ने बाद में जनता दल बनाई. कर्नाटक में जनता दल की कमान देवगौड़ा के हाथों में थी. उन्हीं के नेतृत्व में जनता दल ने 1994 में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई और देवगौड़ा मुख्यमंत्री बने.

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दो साल के बाद 1996 में जनता दल के नेता के रूप में कांग्रेस के समर्थन से एचडी देवगौड़ा 10 महीने तक देश के प्रधानमंत्री रहे. इससे पहले अगर जाकर देखें तो 1953 में देवगौड़ा ने अपनी सियासत की शुरुआत भी कांग्रेस नेता के रूप में ही की थी, लेकिन पहली बार वो निर्दलीय के तौर पर विधायक बने थे. फिर इमरजेंसी के दौरान जेपी मूवमेंट से जुड़े और जनता दल में आ गए.

पिछले चुनावों में क्या रही थी जेडीएस की स्थिति

कर्नाटक में जेडीएस अलग अस्तित्व में है तो केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट का हिस्सा. जेडीएस, कांग्रेस और बीजेपी दोनों के साथ मिलकर सरकार बना चुकी है. 1999 के विधानसभा चुनाव में जेडीएस को 10 सीटें, जबकि 10.42 फीसदी वोट हासिल हुए थे. 2004 में 59 सीट और 20.77 फीसदी वोट. 2008 में 28 सीट और 18.96 फीसदी वोट. 2013 में 40 सीट और 20.09 फीसदी वोट हासिल हुए थे.

बीजेपी के साथ भी कर्नाटक में बनाई थी सरकार

देवगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी राज्य में बीजेपी के समर्थन से भी सरकार चला चुके हैं. 2004 के चुनाव के बाद कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर सरकार बनाई थी और कांग्रेस के धरम सिंह सीएम बने. लेकिन 2006 में जेडीएस गठबंधन सरकार से अलग हो गई. फिर बीजेपी के साथ बारी-बारी से सत्ता संभालने के समझौते के तहत कुमारस्वामी जनवरी 2006 में सीएम बने.

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लेकिन अगले साल सत्ता बीजेपी को सौंपने की जगह कुमारस्वामी ने अक्टूबर 2007 में राज्यपाल को इस्तीफा भेज दिया, जिसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा. हालांकि, बाद में जेडीएस ने बीजेपी को समर्थन का ऐलान किया. इस समझौते के तहत 12 नवंबर 2007 को बी. एस. येदियुरप्पा 7 दिन के लिए सीएम बने थे. यानी बीजेपी के साथ जेडीएस का गठजोड़ कभी मजबूत नहीं हो पाया.

बीजेपी से अलग क्यों हुए रास्ते

2008 के चुनाव में जेडीएस-बीजेपी अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे और बीजेपी ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. 2013 में कांग्रेस जीती और सिद्धारमैया सीएम बने. 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के बनने के बाद सेकुलर पॉलिटिक्स की चर्चा चली तो जेडीएस ने अपनी सियासत में फिर बदलाव किया.

14 अप्रैल 2015 को जेडीएस और 5 अन्य दलों जेडीयू-आरजेडी-सपा-इनेलो और सजपा ने बीजेपी विरोधी न्यू जनता पार्टी परिवार गठबंधन का ऐलान किया. लेकिन बाद में बिहार में आरजेडी-जेडीयू अलग हो गए और जनता परिवार के इस गठबंधन को लेकर भी कोई ठोस पहल सामने नहीं आई.

बसपा, लेफ्ट फ्रंट और ओवैसी की पार्टी जिसके साथ अभी जेडीएस चल रही है वे बीजेपी के धुर विरोधी माने जाते हैं. ऐसे में बीजेपी के साथ जाना जेडीएस का एकदम सियासी यू-टर्न माना जाएगा. 2019 का आम चुनाव इतना करीब है और शायद ही जेडीएस अपनी रणनीति में इतना बड़ा बदलाव करे.

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दलित-मुस्लिम वोटों का समीकरण

कर्नाटक में दलित समुदाय का 19 फीसदी वोट भी काफी मायने रखता है. दलित मतदाता सबसे ज्यादा है. हालांकि, इसमें काफी फूट है, लेकिन बसपा के साथ गठबंधन कर जेडीएस इस वोट बैंक पर नजर गड़ाए हुए थी. चुनाव में दलित वोट लेकर अभी जेडीएस बीजेपी से दूरी बनाए रखना चाहेगी क्योंकि फिलहाल दलित समुदाय में एससी/एसटी एक्ट में बदलावों को लेकर बीजेपी के प्रति गुस्सा है और जेडीएस बीएसपी के साथ मिलकर चुनाव भी लड़ी थी. इसके अलावा कांग्रेस के साथ-साथ जेडीएस की भी पकड़ मुस्लिम वोट बैंक पर है. चुनाव बाद बीजेपी के साथ अगर जेडीएस गई तो 2019 के लिए उसकी राह फिर मुश्किल हो जाएगी. इसलिए भी कांग्रेस और जेडीएस का साथ आना स्वाभाविक था.

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