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बिहार ने ही दिया था देश को पहला दलित मुख्यमंत्री, आज कैसी है दलित राजनीति

1968 में बिहार की सत्ता की कमान संभालने वाले भोला पासवान देश में पहले दलित मुख्यमंत्री थे. उन्होंने एक बार नहीं बल्कि तीन बार मुख्यमंत्री के तौर पर सत्ता की बागडोर संभाली थी. कांशीराम की सियासत तब शुरू भी नहीं हुई थी. इसके बाद भी बिहार में दलित राजनीति उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की तरह अपनी जड़ें नहीं जमा सकी.

बिहार के पहले दलित सीएम भोला पासवान शास्त्री बिहार के पहले दलित सीएम भोला पासवान शास्त्री
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बिहार में करीब 16 फीसदी मतदाता दलित समुदाय के
  • 1968 में बिहार में दलित भोला पासवान बने थे CM
  • बिहार में दूसरे दलित CM राम सुंदर दास बने थे

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने अस्सी के दशक में देश की सियासत में दलित राजनीति की व्यूह रचना शुरू की थी, लेकिन उनकी इस कवायद से काफी पहले ही बिहार में दलित मुख्यमंत्री के तौर पर भोला पासवान की ताजपोशी हो चुकी थी. 1968 में बिहार की सत्ता की कमान संभालने वाले भोला पासवान देश में पहले दलित मुख्यमंत्री थे. उन्होंने एक बार नहीं बल्कि तीन बार मुख्यमंत्री के तौर पर सत्ता की बागडोर संभाली थी. इसके बाद भी सूबे में दलित राजनीति उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की तरह अपनी जड़ें नहीं जमा सकी.

बता दें कि बिहार की राजधानी पटना से करीब सवा चार सौ किलोमीटर दूर पूर्णिया जिले में एक गांव है बैरगाछी, जहां बिहार के तीन बार के मुख्यमंत्री रहे भोला पासवान शास्त्री का जन्म हुआ था. वही भोला पासवान शास्त्री जो बिहार के पहले दलित मुख्यमंत्री थे. भोला पासवान शास्त्री जो राज्यसभा सांसद, इंदिरा गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री और देश में जब पहली पहली बार अनुसूचित और अनुसूचित जनजाति आयोग बना तो उसके पहले चेयरमैन भी बने थे. 

भोला पासवान 1968 में बने थे मुख्यमंत्री

साल 1967 में भोला पासवान पहली बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने. ये वो दौर था जब पार्टियों की आपसी टूट-फूट और कलह के चलते बिहार में तीन गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री अपनी कुर्सी गंवा चुके थे. कांग्रेस ने दलित नेता के तौर पर पासवान को आगे किया और 22 मार्च 1968 को वो मुख्यमंत्री बने, लेकिन गठबंधन की ये सरकार ज्यादा दिन तक नहीं चली और तीन महीने बाद ही भोला पासवान शास्त्री की भी कुर्सी चली गई थी, लेकिन बिहार की राजनीति में वो अपनी जगह बना चुके थे. 

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हालांकि इसके बाद भोला पासवान दो बार और सीएम बने. दूसरी बार 13 दिन के सीएम और तीसरी बार में उन्होंने 222 दिन के मुख्यमंत्री के तौर पर लंबी पारी खेली. इतना ही नहीं, वो चार बार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे. राज्यसभा सांसद चुने जाने के बाद भोला पासवान शास्त्री 1973 इंदिरा गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री बने और कुछ समय बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया था. 9 सितंबर 1984 को बिहार के इस दिग्गज नेता का निधन हो गया. भोला पासवान शास्त्री आपनी सादगी भरे जीवन के लिए जाने जाते थे.

भोला पासवान के बाद बिहार को जनता दल के शासन के दौर में राम सुंदर दास के तौर पर दलित मुख्यमंत्री मिले. रामसुंदर दास ने 1979 से 1980 तक एक साल सत्ता की कमान संभाली, लेकिन फिर उनके बाद कोई दलित मुख्यमंत्री बिहार को नहीं मिल सका. सामाजिक न्याय के नाम पर ओबीसी नेताओं के हाथ में ही सत्ता रही है. कभी लालू यादव ने राज किया तो मौजूदा समय में नीतीश कुमार सत्ता पर काबिज हैं. बिहार में आगामी चुनाव को देखते हुए इस समय आरजेडी और जेडीयू दलित मतों को साधने में जुटे हैं.

दलितों में जातीय चेतना

बिहार में दलित राजनीति के विकास में बाधक बनने वाला तीसरा और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 90 के दशक और उसके बाद अगड़े और पिछड़े वर्ग की देखा-देखी बिहार के दलितों में भी जातीय चेतना हावी हो गई. इससे एक बड़े दलित आंदोलन का अवसर दलितों के हाथ से निकल गया. अगड़े वर्गों में जातीय चेतना का विकास तब हुआ, जब वे समाज के बाकी समुदायों से आगे निकल गए. पिछड़े वर्गों की कुछ जातियों में जातीय चेतना तब विकसित हुई, जब इनमें से कुछ जातियों ने सत्ता का स्वाद चख लिया. लेकिन दलितों के बीच अपनी सामाजिक स्थिति को सुधारे बिना ही जातीय भावनाओं ने अपना बसेरा कायम कर लिया. 


पासवान समुदाय लोक जनशक्ति पार्टी के साथ, मुसहर समुदाय जीतनराम मांझी की पार्टी- हम के साथ, जबकि रविदास समाज ने बहुजन समाज पार्टी के साथ अपनी राजनीतिक पहचान को जोड़ लिया है. कुछ राजनीतिक विश्लेषक ये मानते हैं कि ये सभी पार्टियां अपने लिए, अपने परिवार के लिए और अपनी पार्टी की राजनीतिक सौदेबाजी के लिए जाति को वोटबैंक के तौर पर इस्तेमाल करती रही हैं.

बिहार में दलित सियासत

दरअसल बिहार में अनुसूचित जाति (जिसे आम बोलचाल की भाषा में दलित वर्ग कहा जाता है) की जनसंख्या राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 16 प्रतिशत है. बिहार के दलित समुदाय में 22 जातियां आती हैं. नीतीश कुमार ने पहले इन जातियों को सुविधानुसार दलित और महादलित की श्रेणी में रखा तो दो साल पहले सबको महादलित बनाकर एक ही श्रेणी में शामिल कर दिया है.  2005 में नीतीश कुमार सत्ता में आए तो उन्होंने दलित समुदाय को साधने के लिए दलित कैटेगरी की 22 जातियों में से 21 को महादलित घोषित कर अपनी तरफ से कोशिशें शुरू कीं, जिसमें वो कामयाब भी रहे. हालांकि, 2018 में उन्होंने पासवान जाति को भी शामिल कर सभी को महादलित मान दिया. 

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आधिकारिक तौर पर बिहार में अब कोई दलित समुदाय नहीं रह गया है. सब महादलित के रूप में दर्ज हो चुके हैं. हालांकि, सारे दलित वोट को मिला दें तो कमोबेश यह समुदाय यादव वोट बैंक से कम ताकत नहीं रखता है. दलित कोटे के वोट का 70 फीसदी हिस्सा रविदास, मुसहर और पासवान जाति का है. ऐसे में सूबे में दलित वोट बैंक सत्ता की दिशा और दशा दोनों तय करने की ताकत रखता है.

बिहार में दलित सीटों पर राजनीतिक समीकरण

बिहार विधानसभा में कुल 38 आरक्षित सीटें हैं. 2015 में आरजेडी ने सबसे ज्यादा 14 दलित सीटों पर जीत दर्ज की थी. जबकि, जेडीयू को 10, कांग्रेस को 5, बीजेपी को 5 और बाकी चार सीटें अन्य दलों को मिली थीं. इसमें 13 सीटें रविदास समुदाय के नेता जीते थे जबकि 11 पर पासवान समुदाय से आने वाले नेताओं ने कब्जा जमाया था. 2005 में JDU को 15 सीटें मिली थीं और 2010 में 19 सीटें जीती थीं. बीजेपी के खाते में 2005 में 12 सीटें आई थीं और 2010 में उसने 18 सीटें जीती थीं. आरजेडी को 2005 में 6 सीटें मिली थीं जो 2010 में घटकर एक रह गई थी. 2005 में 2 सीट जीतने वाली एलजेपी ने तो 2010 में इन सीटों पर खाता तक नहीं खोला और कांग्रेस का भी यही हाल था.

 

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