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बिहार में दलित राजनीति: पासवान से लेकर मांझी तक आखिर क्यों हैं बेचैन

एलजेपी प्रमुख चिराग पासवान और HAM सुप्रीमो जीतन राम मांझी बेचैन नजर आ रहे हैं और उन्हें अपने-अपने गठबंधनों में तवज्जों नहीं मिल रही है. ऐसे में चिराग पासवान जेडीयू से तो मांझी आरजेडी से खफा नजर आ रहे हैं. बिहार की सियासत में दलित राजनीति की जड़ें आखिर क्यों इतनी कमजोर हैं.

जीतन राम मांझी और रामविलास पासवान जीतन राम मांझी और रामविलास पासवान

  • बिहार में कुल 16 फीसदी दलित मतदाता हैं
  • यूपी से कितनी अलग है बिहार की राजनीति

बिहार देश का ऐसा राज्य है, जहां से पहला दलित उप प्रधानमंत्री और पहला मुख्यमंत्री मिला. इसके बाद भी दलित राजनीति बिहार में यूपी और महाराष्ट्र की तरह अपनी जड़े नहीं जमा सकी है. इसी का नतीजा है कि आज एलजेपी प्रमुख चिराग पासवान और HAM सुप्रीमो जीतनराम मांझी बेचैन नजर आ रहे हैं और उन्हें अपने-अपने गठबंधनों में तवज्जो नहीं मिल रही है. ऐसे में चिराग पासवान जेडीयू से तो मांझी आरजेडी से खफा नजर आ रहे हैं.

चिराग पासवान ने पिछले सात-आठ महीने से लगातार बिहार के मुखिया नीतीश कुमार और उनके काम-काज के तरीके पर सवाल उठाया है. पहले 'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट' यात्रा के दौरान जेडीयू को असहज करने वाला बयान दिया. अब बाढ़ और कोरोना के मुद्दे पर चिराग के निशाने पर नीतीश कुमार आ गए हैं तो जेडीयू सांसद ललन सिंह ने चिराग पासवान को कालिदास बता दिया है. दूसरी तरफ मांझी भी आरजेडी के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं, लेकिन तेजस्वी यादव उन्हें तवज्जो नहीं दे रहे हैं. ऐसे में मांझी की घर वापसी को लेकर जेडीयू की तरफ से पिछले कई महीनों से अभियान चलाया जा रहा है.

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बिहार देश का पहला राज्य बना, जिसने जमींदारी उन्मूलन कानून पारित किया था. इसके बाद उम्मीद जगी थी कि बिहार में समाज के दबे-कुचले तबके की सामाजिक और आर्थिक तरक्की का रास्ता खुलेगा, लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं. हालांकि, 60 के दशक के आखिर में भोला पासवान शास्त्री बिहार के मुख्यमंत्री बन गए थे, जो देश में पहले दलित मुख्यमंत्री थे. 1977 में बिहार के बाबू जगजीवन राम देश के उप-प्रधानमंत्री बन गए थे. फिर भी बिहार की अनुसूचित जाति के सामाजिक और आर्थिक हालात में न तो कोई सुधार आया है और न ही वे अपनी कोई सियासी पहचान बना सके.

बिहार में दलित वैचारिक राजनीति नहीं रही

दलित चिंतक सुनील कुमार सुमन कहते हैं कि बिहार में दलित राजनीति की अपनी कोई वैचारिक पृष्ठभूमि नहीं है. रामविलास पासवान हों या फिर जीतन राम मांझी, न तो दलित आंदोलन से निकले हैं और न ही दलित विचारधारा से आए हैं. इसीलिए बिहार में दलित राजनीति कभी स्थापित नहीं हो सकी है. बिहार में जो भी दलित नेता हैं वो अपनी-अपनी जातियों के नेता भले ही बन गए हों, लेकिन पूरे दलित समुदाय के नेता के तौर पर स्थापित नहीं हो सके हैं. इसीलिए आज उन्हें कोई खास तवज्जो नहीं मिल रही है.

दरअसल बिहार में अनुसूचित जाति (जिसे आम बोलचाल की भाषा में दलित वर्ग कहा जाता है) की जनसंख्या राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 16 प्रतिशत है. अनुसूचित जाति को नीतीश कुमार ने पहले सुविधानुसार दलित और महादलित की श्रेणी में रखा तो दो साल पहले कभी सबको महादलित बनाकर एक ही श्रेणी में शामिल कर दिया है. हालांकि, सारे दलित वोट को मिला दें तो कमोबेश यादव वोट बैंक से कम ताकत नहीं रखता है. दलित कोटे के वोट का 70 फीसदी हिस्सा रविदास, मुसहर और पासवान जाति का है. ऐसे में सूबे में दलित वोट बैंक सत्ता की दिशा और दशा दोनों तय करने की ताकत रखता है.

बिहार में दलित राजनीति आंदोलन नहीं हुए

जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अरविंद कुमार कहते हैं कि यूपी में कांशीराम ने जिस तरह से दलित समुदाय में राजनीतिक चेतना के लिए संघर्ष किया है वैसा कोई आंदोलन बिहार में नहीं हुआ है. बिहार में सामाजिक न्याय के लिए जरूर आंदोलन हुए हैं, जिनमें ओबीसी के साथ-साथ दलितों की हक की लड़ाई जरूर हुई है, लेकिन राजनीतिक तौर पर उन्हें वो मुकाम नहीं मिला, जिस प्रकार यूपी और महाराष्ट्र की राजनीति में दलित समुदाय को मिला है. बिहार में दलित समुदाय बिखरा हुआ है, उसका अपने कोई एक नेता नहीं है और न ही कोई एक बेल्ट है.

बिहार में दलित सीटों का समीकरण

बिहार विधानसभा में कुल आरक्षित सीटें 38 हैं. 2015 में आरजेडी ने सबसे ज्यादा 14 दलित सीटों पर जीत दर्ज की थी. जबकि, जेडीयू को 10, कांग्रेस को 5, बीजेपी को 5 और बाकी चार सीटें अन्य को मिली थी. इसमें 13 सीटें रविदास समुदाय के नेता जीते थे जबकि 11 पर पासवान समुदाय से आने वाले नेताओं ने कब्जा जमाया था. 2005 में JDU को 15 सीटें मिली थीं और 2010 में 19 सीटें जीती थी. बीजेपी के खाते में 2005 में 12 सीटें आईं थीं और 2010 में 18 सीटें जीती थी. आरजेडी को 2005 में 6 सीटें मिली थीं जो 2010 में घटकर एक रह गई थी. 2005 में 2 सीट जीतने वाली एलजेपी ने तो 2010 में इन सीटों पर खाता तक नहीं खोला और कांग्रेस का भी यही हाल था.

बिहार में दलित समुदाय तलाशता रहा अपना मसीहा

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन कहते हैं कि बिहार में दलित राजनीतिक दूसरे राज्यों से अलग है. बिहार में दलित समुदाय हर चुनाव में अपना मसीहा तलाशता है. पहले कांग्रेस पर भरोसा किया और फिर लालू यादव की आरजेडी के साथ लंबे समय तक रहा. इसके बाद नीतीश कुमार की जेडीयू का रुख किया, लेकिन दलित समुदाय को सभी ने ठगा है. उनके हक के लिए किसी ने भी कोई ठोस काम नहीं किया. इसीलिए हर चुनाव में दलित समुदाय की वोटिंग पैटर्न बदलता रहा है.

अरविंद मोहन कहते हैं कि पासवान जाति की बात करें तो बिहार में तकरीबन पांच फीसदी के करीब वोट बैंक वाली इस जाति के सर्वमान्य नेता रामविलास पासवान रहे हैं. यूपी से लगे हुए इलाके में बसपा का अपना जनाधार है, लेकिन पूरे बिहार में वो न तो पार्टी खड़ी कर सकी है और न ही कोई सक्रिय भूमिक में कभी दिखी है. ऐसे ही बाकी दलित नेताओं की भी दायरा सीमित रहा है. यही वजह है कि बिहार में दलित समुदाय को कोई राजनीतिक पहचान यूपी और दूसरे राज्य की तरह स्थापित नही हो सकी है.

बिहार में दलित नहीं बल्कि महादलित हैं

बता दें कि बिहार की दलित समुदाय में 22 जातियां आती हैं. 2005 में नीतीश कुमार सत्ता में आए तो उन्होंने दलित समुदाय को साधने के लिए दलित कैटेगरी की 22 जातियों में से 21 को महादलित घोषित कर अपनी तरफ से कोशिशें शुरू, जिसमें वो कामयाब भी रहे. हालांकि, 2018 में पासवान जातीय को भी शामिल कर सभी को महादलित बना दिया. इस तरह से बिहार में अब कोई दलित समुदाय नहीं रह गया है.

जीतनराम मांझी ने 8 महीने सीएम पद पर रहते हुए अपना सारा फोकस कमोबेश इस बात पर रखा कि वह कैसे महादलित का चेहरा बन सके. पासवान समुदाय पर आज भी एलजेपी की पकड़ मानी जाती है. इसके अलावा दलितों के अन्य नेता मसलन दलितों में सबसे पिछड़ी जाति मुसहरों के सर्वमान्य नेता जीतन राम मांझी, रजकों के बड़े चेहरे श्याम रजक, रविदास के रमई राम, पासियों के उदय नारायण चौधरी सरीखे नेताओं के अपने-अपने राजनीतिक असर हैं. हालांकि, श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी ने नीतीश कुमार से राजनीतिक नाता तोड़कर अलग हो चुके हैं.

बिहार में दलित एजेंडा सेट करने का सही वक्त है

दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और दलित चिंतक रतन लाल कहते हैं कि बिहार में दलित राजनीतिक की अपनी कोई पहचान तब तक स्थापित नहीं हो सकती है जब तक कि दलित समुदाय अपना सामाजिक एजेंडा तय नहीं करते हैं. जीतन राम मांझी और रामविलास पासवान कभी भी सामाजिक आंदोलन का हिस्सा नहीं रहे हैं. श्याम रजक अगर जेडीयू से अलग हुए हैं तो उन्हें चुनावी राजनीति से पहले सामाजिक तौर पर आंदोलन खड़ा करना चाहिए, क्योंकि वो छात्र राजनीति से आए हैं. ऐसे में वो अगर एजेंडा सेट करने के लिए सामाजिक न्याय के लिए आंदोलन खड़ा करते हैं तो निश्चित तौर पर दलित ही नहीं बल्कि पिछड़ों को कोई राजनीतिक दशा और दिशा मिल सकेगी.

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