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बिहार चुनाव: छपरा-सिवान में दो बाहुबलियों के सहारे लालू की पॉलिटिक्स, नीतीश से दोनों का हुआ था पंगा

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के लिए पश्चिम बिहार के दो जिलों सारण और सिवान में दो बाहुबलियों के सहारे सियासी मोहरे बिछाए जा रहे हैं. दोनों बाहुबली जेल में हैं लेकिन उनके परिवारों का दबदबा कायम है और आरजेडी के लिए इस इलाके में तुरुप का पत्ता साबित हो सकते हैं.

बिहार चुनाव के लिए बढ़ी सरगर्मी बिहार चुनाव के लिए बढ़ी सरगर्मी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बिहार चुनाव के लिए सियासी सरगर्मी बढ़ी
  • शहाबुद्दीन-प्रभुनाथ सिंह जेल में, लेकिन रुतबा कायम
  • सारण और सिवान की कई सीटों पर प्रभाव

बिहार फिर चुनाव के लिए तैयार है और हर इलाके के हिसाब से राजनीतिक दल अपनी रणनीति और सियासी मोहरों को सेट कर रहे हैं. यूपी से सटे पश्चिम बिहार के दो जिलों सारण और सिवान की सियासत में दो बाहुबलियों का प्रभाव काफी कुछ तय करता है. सिवान में लंबे समय से शहाबुद्दीन तो सारण-छपरा में प्रभुनाथ सिंह का दबदबा रहा है. दोनों लालू यादव के करीबी माने जाते हैं. दोनों की नीतीश कुमार के साथ अदावत खुली किताब की तरह है.

आज प्रभुनाथ सिंह और शहाबुद्दीन दोनों भले ही जेल में हों लेकिन सियासत में अपने-अपने परिवारों के जरिए इनकी पैठ बनी हुई है. यहां सीटों के बंटवारे में काफी हद तक इन दोनों नेताओं की चलती है. इतना ही नहीं विपक्षी दल भी अपनी रणनीति इन दोनों नेताओं को ध्यान में रखकर ही बनाते हैं.

18 सीटों के लिए है सियासी जंग
छपरा और सिवान जिले में विधानसभा की कुल 18 सीटे आती हैं. इन दो जिलों में लोकसभा की तीन सीटें आती हैं- सारण, महाराजगंज और सिवान. सारण में आने वाली विधानसभा सीटें हैं- 1. अमनौर, 2. बनियापुर, 3. छपरा, 4. एकमा, 5. गरखा, 6. मांझी, 7. मढ़ौरा, 8. परसा, 9. सोनपुर, 10. तरैया जबकि सिवान में- 1. बरहरिया, 2. दरौली, 3. दरौंधा, 4. गोरियाकोठी, 5. महाराजगंज, 6. रघुनाथपुर, 7. सिवान, 8. जीरादेई.

किसके पास अभी कितनी सीटें?
विधानसभा की 18 सीटों में से अभी आरजेडी के पास 8 सीट, जेडीयू के पास 5 सीट, बीजेपी के पास 3 सीट, कांग्रेस के पास 1 सीट और सीपीआईएमएल के पास 1 सीट है. हालांकि, 2015 से इस बार हालात काफी अलग हैं. इस बार आरजेडी-जेडीयू एक साथ नहीं बल्कि अलग-अलग उतरे हैं और जेडीयू बीजेपी के साथ हैं.

दो बाहुबलियों की कहानी, पहले दुश्मनी-फिर सियासी दोस्ती
एक समय मो. शहाबुद्दीन तथा प्रभुनाथ सिंह का अपने-अपने संसदीय क्षेत्र में वर्चस्व था. चूंकि, प्रभुनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र महाराजगंज के कई इलाके सिवान जिले में भी आते हैं इसलिए अपने प्रशासनिक और चुनावी कामकाज के लिए प्रभुनाथ सिंह सिवान आते-जाते रहते थे. इस दौरान उनके और शहाबुद्दीन के समर्थकों में कई बार झड़पें भी हो जाती थीं. लेकिन अब दोनों आरजेडी के सदस्‍य हैं इसलिए अब दोनों की दुश्‍मनी भी खत्‍म हो गई है.

अपराध जगत से राजनीति में ऐसे हुई शहाबुद्दीन की एंट्री
1980 के दशक में कई अपराधों में नाम आने के बाद शहाबुद्दीन ने 1990 में निर्दलीय विधायक के तौर पर राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी. जल्दी ही शहाबुद्दीन तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की नजरों में आ गया और 1995 का विधानसभा चुनाव सत्तारूढ़ पार्टी के टिकट पर लड़ा. 1996 से 2004 तक शहाबुद्दीन ने चार संसदीय चुनाव जीते और बाहुबल के दम पर सिवान का 'छोटे सरकार' कहा जाने लगा.

आरजेडी में शहाबुद्दीन का सियासी रुतबा कायम
दो बार का विधायक और 4 बार का सांसद रहे शहाबुद्दीन के खिलाफ कई आपराधिक केस हैं और आज तेजाब कांड में उम्रकैद की सजा काट रहा है. चुनाव आयोग ने 2009 में शहाबुद्दीन के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दिया था. इसके बाद उसने अपनी पत्नी हीना शहाब को उतारा लेकिन पहले ओमप्रकाश यादव और 2019 में एक और बाहुबली की पत्नी कविता सिंह के हाथों शिकस्त मिली. शहाबुद्दीन का बेटा ओसामा शहाब भी छात्र राजनीति में सक्रिय है तो पत्नी हिना शराब को इसी साल के शुरुआत में आरजेडी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल किया.

नीतीश से पंगे ने फिर पहुंचा दिया था जेल
2016 में बिहार में आरजेडी और जेडीयू की सरकार थी और इसी बीच शहाबुद्दीन को बेल मिलने पर बवाल मच गया. जेल से बाहर आते ही शहाबुद्दीन के बयान ने विवाद में आग में घी का काम किया. लालू के करीबी शहाबुद्दीन ने जेल से बाहर आते ही कहा कि 'नीतीश परिस्थितिवश मुख्यमंत्री हैं'. इस बयान ने जेडीयू को भड़का दिया. लालू की चुप्पी के बीच नीतीश सरकार बेल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई और शहाबुद्दीन फिर जेल पहुंच गए.

प्रभुनाथ सिंह फैमिली का सारण की कई सीटों पर दबदबा
सिवान में शहाबुद्दीन का दबदबा कायम है तो सारण के छपरा और महाराजगंज के इलाके में प्रभुनाथ सिंह का रुतबा भी कम नहीं है. राजपूत जाति से आने वाले प्रभुनाथ सिंह ने पहली बार मशरख विधानसभा सीट से 1985 में चुनाव जीता था. 1990 में वे दोबारा विधायक चुने गए लेकिन 1995 में अशोक सिंह के हाथों शिकस्त मिली.

राजपूत वोटों की सियासत से प्रभुनाथ सिंह ने बनाई सियासी जमीन
इसके बाद प्रभुनाथ सिंह ने राजपूत वोटों का गढ़ कहे जाने वाले महाराजगंज लोकसभा सीट से अपनी संसदीय पारी शुरू की और 2004 में जदयू के टिकट पर जीत हासिल की. 2012 में प्रभुनाथ सिंह जेडीयू से अलग होकर आरजेडी में शामिल हो गए. इसके बाद नीतीश कुमार पर जमकर आरोप लगाए. 2013 में महाराजगंज लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में आरजेडी के टिकट पर प्रभुनाथ सिंह जीत गए. लेकिन 2014 के चुनाव में प्रभुनाथ सिंह को शिकस्त मिली.

विधायक मर्डर केस में जेल
2017 में हजारीबाग की अदालत ने मशरख से विधायक अशोक सिंह की 1995 में हत्या के मामले में प्रभुनाथ सिंह और उनके दो भाईयों को उम्रकैद की सजा सुनाई. तब से प्रभुनाथ सिंह हजारीबाग की जेल में बंद हैं.

प्रभुनाथ सिंह की फैमिली का दबदबा अब भी कायम
सारण जिले की मशरख विधानसभा सीट प्रभुनाथ सिंह की परंपरागत सीट मानी जाती है. इस सीट पर 1985 और 1990 में दो बार प्रभुनाथ सिंह जीतकर विधायक बने. अक्टूबर 2005 के विधानसभा चुनाव में प्रभुनाथ सिंह के भाई केदारनाथ सिंह यहां से चुनाव जीते. केदार सिंह सारण की बनियापुर सीट से भी विधायक रह चुके हैं. प्रभुनाथ सिंह के बेटे रणधीर सिंह सारण की छपरा विधानसभा सीट से विधायक रह चुके हैं. उनके जीजा गौतम सिंह मांझी सीट से तो समधी विनय सिंह सारण की सोनपुर सीट से विधायक रह चुके हैं. इस बार भी बेटे रणधीर सिंह, भतीजे सुधीर सिंह समेत परिवार से जुड़े कई लोग सारण जिलों की अलग-अलग सीटों से टिकट की दावेदारी में हैं.

दो बाहुबली, दोनों जेल में लेकिन लालू की पार्टी आरजेडी के लिए इनकी फैमिली का प्रभाव भी आने वाले चुनाव में काफी काम का है. सारण और सिवान जिलों की कई सीटों पर इन दोनों परिवारों का दबदबा आरजेडी के काम आ सकता है और इसी कारण दोनों परिवारों का सियासी रसूख भी बना हुआ है.

 

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