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बंगाल: सही साबित हुई पीके की बात, बीजेपी को भारी पड़ा उल्टा ध्रुवीकरण

बीजेपी ममता सरकार पर 'मुस्लिम तुष्टीकरण' का आरोप लगाकर घेर रही थी. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से लेकर स्थानीय नेता तक सार्वजनिक मंचों से कह रहे थे कि ममता को सिर्फ मुसलमानों की परवाह है, वो उन्हीं के लिए ही काम करती हैं, क्योंकि वही उनके वोटर हैं. ममता को मुस्लिम परस्त साबित कर हिंदू वोटों को अपने पक्ष में करने का दांव बंगाल में बीजेपी के लिए उल्टा पड़ गया है और यह टीएमसी के लिए फायदा का सौदा साबित हुआ. 

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प्रशांत किशार
प्रशांत किशार
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बंगाल में 30 फीसदी 125 सीटों पर मुस्लिम वोटों का प्रभाव
  • बीजेपी की ध्रुवीकरण की रणनीति नहीं आई काम
  • टीएमसी के पक्ष में मुस्लिम मतदाता एकजुट दिखे

ममता बनर्जी बंगाल के सियासी रण में बीजेपी पर 'बाहरी' पार्टी होने के साथ-साथ धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण करने का आरोप लगाती रहीं. वहीं, बीजेपी ममता सरकार पर 'मुस्लिम तुष्टीकरण' का आरोप लगाकर घेर रही थी. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से लेकर स्थानीय नेता तक सार्वजनिक मंचों से कह रहे थे कि ममता को सिर्फ मुसलमानों की परवाह है, वो उन्हीं के लिए ही काम करती हैं, क्योंकि वही उनके वोटर हैं. ममता को मुस्लिम परस्त साबित कर हिंदू वोटों को अपने पक्ष में करने का दांव बंगाल में बीजेपी के लिए उल्टा पड़ गया है और यह टीएमसी के लिए फायदा का सौदा साबित हुआ. 

वहीं, ममता बनर्जी के लिए बंगाल में चुनावी प्रबंधन देख रहे प्रशांत किशोर (पीके) पहले ही कह चुके थे कि बीजेपी को बंगाल में जितना ध्रुवीकरण का दांव चलेगी, उसका सिर्फ बीजेपी को ही नहीं बल्कि उनसे ज्यादा टीएमसी को फायदा मिलेगा. अगर बीजेपी की तरफ ध्रुवीकरण हो रहा है तो टीएमसी की तरफ भी हो रहा है. यह खेल एकतरफा नहीं है. अब चुनावी नतीजों से भी साफ जाहिर होता है कि मुस्लिम समुदाय ने कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन के बजाय ममता की टीएमसी को वोट देना बेहतर समझा. इसकी का नतीजा है कि मुस्लिम बहुल सीटों में टीएमसी एकतरफा जीत दर्ज करती दिख रही है.

हालांकि, ममता बनर्जी पर तुष्टीकरण के आरोप उस समय से ही लग रहे हैं जब साल 2011 में वो सत्ता में आईं और साल भर बाद ही उन्होंने इमामों के लिए ढाई हज़ार रुपये भत्ते का ऐलान कर दिया था. बयानों से इतर ममता बनर्जी मुसलमानों के लिए जो घोषणाएं की हैं, उन्हें आधारों पर बीजेपी उन पर तुष्टीकरण के आरोप लगाती रही हैं. इसके बावजूद मुस्लिम वोटर ममता के पक्ष में एकतरफा वोट नहीं करता रहा है, लेकिन इस बार मुस्लिम ममता के साथ खड़े नजर आ रहे हैं. 

वरिष्ठ पत्रकार जयंतो घोषाल कहते हैं कि बंगाल में बीजेपी के ध्रुवीकरण का दांव कामयाब नहीं हो सका है. बंगाल का हिंदू देश के दूसरे राज्यों से अलग है. यहां हिंदू ऐसा है जो मुस्लिमों की दुकान में जाकर बिरयानी खाता है. इससे समझ सकते हैं कि यहां का सोशल फैब्रिक कैसा है. ममता बनर्जी सिर्फ मुस्लिमों के वोट पर सत्ता में नहीं आ रही है बल्कि हिंदू समुदाय के भी बड़े हिस्से ने टीएमसी को वोट किया है. बीजेपी की तमाम कोशिशों के बावजूद यहां हिंदू वोट उसके पक्ष में नहीं गए हैं जबकि मुस्लिम वोटर टीएमसी के साथ पिछली बार से ज्यादा मजबूती से खड़ा दिखाई दिया है.

बंगाल का मुस्लिम समीकरण

साल 2016 के विधानसभा चुनाव पर नजर डालेंगे, तो पाएंगे कि मुस्लिमों ने ममता बनर्जी की पार्टी के पक्ष में वोट किया था. लेकिन, मुस्लिम बहुल मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तरी दिनाजपुर और दक्षिण दिनाजपुर जिले का वोटर कांग्रेस-लेफ्ट के साथ खड़ा रहा था. 2016 के चुनावों में टीएमसी ने भले ही बंगाल की 294 सीटों में से 211 सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन इन चारों जिलों में उसका प्रदर्शन काफी खराब था जबकि कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन ने यहां क्लीन स्वीप किया था. 

टीएमसी ने 125 मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों में से 80 पर जीत दर्ज की थी, लेकिन मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तरी दिनाजपुर और दक्षिण दिनाजपुर की  49 सीटों में 36 सीटें कांग्रेस-लेफ्ट को मिली थीं. हालांकि, इस बार बीजेपी के सियासी उभार के चलते मुस्लिम मतदाता उसे सत्ता में आने से रोकने के लिए ममता के पक्ष में एकजुट नजर आए. आजतक के एग्जिट पोल में भी यह बात बतायी गई थी कि 75 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं ने टीएमसी के पक्ष में वोट किया था. मुस्लिम वोटर बंगाल में कांग्रेस-लेफ्ट, पीरजादा अब्बास सिद्दीकी और असदुद्दीन ओवैसी के पक्ष में नहीं आ सके. 

30 फीसदी मुस्लिम वोटर

बंगाल में करीब 30 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं और वो इस बार भी निर्णायक साबित हुए हैं. मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, बीरभूम, दक्षिण 24 परगना और कूचबिहार ऐसे जिले हैं, जहां मुस्लिमों की बड़ी आबादी है. साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, मुर्शिदाबाद में तो 66.2 फीसदी आबादी मुसलमानों की है, जबकि मालदा में यह 51.3 फीसदी है. उत्तर दिनाजपुर में भी 50 फीसदी मुस्लिम आबादी है. बीरभूम में 37 फीसदी, दक्षिण 24 परगना में 35.6 फीसदी और कूचबिहार में 25.54 फीसदी आबादी मुस्लिमों की है.

बंगाल की करीब 125 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका निभाते रहते हैं. राजनीतिक रणनीतिकारों का कहना था कि जिस दल की तरफ मुस्लिम वोटरों का रुझान होता है, बंगाल में सरकार उसी पार्टी की बनती है. अब तक का रिकॉर्ड ऐसे रहा है कि मुस्लिमों ने किसी एक पार्टी के पक्ष में ही मतदान नहीं किया है, लेकिन पहली बार वह टीएमसी के पक्ष में मजबूती से खड़ा रहा. इससे पहले तक मुस्लिम वोटर टीएमसी के साथ-साथ कांग्रेस और लेफ्ट के बीच बंटते रहे हैं.

मुस्लिम वोटर ममता के साथ 

ममता बनर्जी को इस बात का एहसास था कि अगर मुस्लिम वोट बंट गया, तो उनकी परेशानी चुनाव के बाद बढ़ जाएगी. यही वजह है कि वह अपनी हर जनसभा में यह अपील करती थीं कि अपना वोट बंटने मत देना. इसके लिए उन्होंने मुसलमानों को एनआरसी और सीएए का डर भी दिखाया. कहा कि अगर भाजपा की सरकार बंगाल में बन गयी, तो आप लोगों को ही सबसे ज्यादा परेशानी होगी.

ममता बनर्जी ने कहा था, 'मैं आपसे एकजुट होने का आग्रह करती हूं... इस बार अपने वोट को विभाजित न होने दें. अगर हमें इन दोनों जिलों (मालदा, मुर्शिदाबाद) और कुछ अन्य (जैसे दिनाजपुर) में अच्छी संख्या में सीटें मिलेंगी, तो हम सरकार बना पाएंगे. आपको यह समझना चाहिए कि मैं आपसे एक कारण के लिए अपील कर रही हूं... क्या आप चाहते हैं कि हमारे राज्य में बीजेपी आ जाए और एक और गुजरात बने? ममता की इस बार जीत में मुस्लिम वोटर अहम साबित हुए हैं. 

 

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