कानपुर कैंटोनमेंट, जिसे आम तौर पर कानपुर कैंट के नाम से जाना जाता है, उत्तर प्रदेश के कानपुर में गंगा के दाहिने किनारे स्थित एक ऐतिहासिक सैन्य स्टेशन है. यह एक बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है और तीन तरफ से शहर से घिरा है. यह कानपुर का एक अलग हिस्सा बना हुआ है. इसकी चौड़ी सड़कें, बड़े खुले क्षेत्र, पार्क, बैरक, अधिकारियों के आवास और संस्थागत इमारतें इसे आसपास के घने नागरिक इलाकों से अलग पहचान देती हैं.
कानपुर कैंटोनमेंट के नाम पर विधानसभा क्षेत्र का नाम रखा गया है, जिसे 1967 के चुनावों से पहले स्थापित किया गया था. यह कानपुर लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा खंडों में से एक है. 2008 के परिसीमन के बाद इसमें पूरा कानपुर कैंटोनमेंट बोर्ड, नॉर्दर्न रेलवे कॉलोनी और कानपुर नगर निगम के 12 वार्ड शामिल हैं. इस वजह से इसका स्वरूप पूरी तरह शहरी है.
कानपुर कैंटोनमेंट में स्थापना के बाद से 15 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. बीजेपी ने यह सीट छह बार जीती है और उसकी सभी जीत 1991 से 2012 के बीच लगातार हुईं. कांग्रेस ने यह सीट पांच बार जीती है, जबकि भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी, जनता दल और समाजवादी पार्टी ने एक-एक बार यह सीट जीती है.
हाल के वर्षों में इस विधानसभा क्षेत्र में काफी राजनीतिक बदलाव देखने को मिला है और पिछले तीन विधानसभा चुनावों में तीन अलग-अलग दलों ने जीत दर्ज की है. 2012 में बीजेपी ने रघुनंदन सिंह भदौरिया को नया उम्मीदवार बनाकर लगातार छठी बार यह सीट बरकरार रखी. सतिश महाना, जो लगातार पांच बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके थे, 2012 में नवगठित महाराजपुर विधानसभा क्षेत्र में चले गए. भदौरिया ने समाजवादी पार्टी के मोहम्मद हसन रूमी को 9,308 वोटों से हराया. यह 2007 में बीजेपी की 26,536 वोटों की जीत के अंतर की तुलना में काफी कम था. हालांकि यह संकेत बीजेपी को 2017 में भदौरिया को फिर से मैदान में उतारने से नहीं रोक सका. उन्हें कांग्रेस के प्रतिद्वंद्वी सोहिल अख्तर अंसारी ने 9,364 वोटों से हरा दिया. समाजवादी पार्टी, जो उस चुनाव में काफी पीछे रहकर चौथे स्थान पर रही थी, 2022 में अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकल गई. उसके उम्मीदवार मोहम्मद हसन रूमी को 94,729 वोट मिले, जबकि भदौरिया को 74,742 वोट मिले. इससे समाजवादी पार्टी ने इस विधानसभा क्षेत्र में पहली बार 19,987 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की. मौजूदा कांग्रेस विधायक सोहिल अख्तर अंसारी काफी पीछे रहकर तीसरे स्थान पर रहे.
विधानसभा चुनावों में अपने उतार-चढ़ाव भरे प्रदर्शन और लंबे समय तक सीट बरकरार रखने में असमर्थता के विपरीत, कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों में कानपुर कैंट विधानसभा खंड में अपेक्षाकृत मजबूत प्रदर्शन किया है. 2009 के बाद हुए चारों लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने बीजेपी पर बढ़त बनाई है. 2009 में कांग्रेस ने बीजेपी पर 13,825 वोटों की बढ़त बनाई थी, जो 2014 में घटकर 3,062 वोट रह गई. 2019 में कांग्रेस ने वापसी करते हुए 15,695 वोटों की बढ़त बनाई. 2024 में यह बढ़त काफी बढ़ गई, जब कानपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार आलोक मिश्रा को कानपुर कैंट विधानसभा खंड में 115,028 वोट मिले, जबकि बीजेपी के रमेश अवस्थी को 71,520 वोट मिले. इस तरह कांग्रेस ने कानपुर कैंट विधानसभा खंड में 43,508 वोटों की बढ़त हासिल की. 2024 में कांग्रेस के वोटों में यह उछाल समाजवादी पार्टी के साथ उसके गठबंधन के संदर्भ में आया, जो इससे पहले दोनों दलों के साझा मुस्लिम वोट आधार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रही थी.
कानपुर कैंटोनमेंट में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 297,863 से बढ़कर 2017 में 335,587 और 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान 348,343 हो गई. 2022 में यह संख्या 362,382 और 2024 में 374,262 थी. 10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 276,704 मतदाता दर्ज थे. यह 2024 के 374,262 मतदाताओं की तुलना में 97,558 की कमी है, यानी 26.59 प्रतिशत की गिरावट.
मतदान प्रतिशत आम तौर पर मध्यम रहा है, हालांकि चुनावों के बीच इसमें उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. 2012 में मतदान प्रतिशत 48.46 रहा था और 2017 में बढ़कर 52.58 प्रतिशत हो गया. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में यह 49.14 प्रतिशत रहा. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान बढ़कर 52.40 प्रतिशत हो गया, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 50.84 प्रतिशत रह गया.
कानपुर कैंटोनमेंट हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जिसमें मुस्लिम आबादी भी काफी बड़ी है. अनुमान के अनुसार इसकी आबादी में मुस्लिम करीब 45.20 प्रतिशत हैं, जबकि अनुसूचित जाति की आबादी करीब 9.05 प्रतिशत है. अन्य महत्वपूर्ण समुदायों में ब्राह्मण, वैश्य और अन्य सवर्ण हिंदू समूहों के साथ-साथ ओबीसी समुदाय भी शामिल हैं. विधानसभा क्षेत्र में सिख, जैन और ईसाई समुदायों की भी लंबे समय से मौजूदगी है. इसके अलावा पंजाबी और सिंधी परिवार भी कई पीढ़ियों से कानपुर में बसे हुए हैं. मुस्लिम आबादी कैंटोनमेंट और उससे जुड़े नागरिक इलाकों के कई हिस्सों में केंद्रित है. वहीं सैन्य और रेलवे प्रतिष्ठानों की मौजूदगी इसे कानपुर के कई अन्य हिस्सों से अलग सामाजिक संरचना देती है.
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1811 में कानपुर कैंटोनमेंट को औपचारिक रूप से एक प्रमुख सैन्य छावनी के रूप में स्थापित किया था. गंगा के किनारे इसकी स्थिति ने दोआब क्षेत्र में परिवहन और रक्षा के लिहाज से इसे रणनीतिक लाभ दिया. 19वीं सदी की शुरुआत में यह सैन्य स्टेशन तेजी से विकसित हुआ और उत्तरी भारत की महत्वपूर्ण ब्रिटिश छावनियों में शामिल हो गया. 1857 के विद्रोह के दौरान यह क्षेत्र सीज ऑफ कानपुर का स्थल बना, जिसमें ब्रिटिश सेना और नागरिकों को घेर लिया गया था. आत्मसमर्पण के बाद बड़ी संख्या में ब्रिटिश महिलाओं और बच्चों की हत्या बीबिघर हत्याकांड में हुई. इन घटनाओं ने कैंटोनमेंट के इतिहास पर गहरी छाप छोड़ी. आजादी के बाद भी यह रक्षा प्रतिष्ठान के रूप में महत्वपूर्ण बना रहा और कैंटोनमेंट बोर्ड के तहत काम करता रहा. इसने अपनी विशिष्ट संरचना, हरित क्षेत्रों और सैन्य एवं नागरिक क्षेत्रों के मिश्रण को बनाए रखा और साथ ही कानपुर का अभिन्न हिस्सा बना रहा.
कानपुर कैंटोनमेंट का स्वरूप कानपुर शहर के अंदरूनी हिस्सों के भीड़भाड़ वाले वाणिज्यिक और आवासीय इलाकों से काफी अलग है. कैंटोनमेंट में पारंपरिक रूप से चौड़ी सड़कें, अधिक खुले क्षेत्र और कम घनत्व वाला निर्मित वातावरण रहा है. हालांकि इसे शहर के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाली सड़कों पर यातायात भारी हो सकता है. मॉल रोड कैंटोनमेंट को सिविल लाइंस और शहर के केंद्रीय कारोबारी इलाकों से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क है. कैंटोनमेंट में फेथफुलगंज और कंट्री कार्ट पराओ जैसे स्थानीय बाजार भी हैं. इस क्षेत्र में कई पार्क, चर्च, कब्रिस्तान और ऐतिहासिक इमारतें भी हैं, जो इसकी सैन्य पृष्ठभूमि को दर्शाती हैं. कानपुर मेमोरियल चर्च, कॉनपुर क्लब, गोल्फ कोर्स और कई पुराने सैन्य प्रतिष्ठान इसकी अलग पहचान में योगदान देते हैं. गंगा के किनारे स्थित होने के कारण इसका भौगोलिक स्वरूप भी घनी आबादी वाले शहर के अंदरूनी विधानसभा क्षेत्रों से अलग है.
यह विधानसभा क्षेत्र कानपुर की प्रमुख परिवहन सुविधाओं के करीब होने का लाभ उठाता है. कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन लगभग 5-7 किलोमीटर दूर है और यह सबसे नजदीकी प्रमुख रेलवे स्टेशन है. कानपुर अनवरगंज और गोविंदपुरी स्टेशन अतिरिक्त रेल विकल्प उपलब्ध कराते हैं. कानपुर एयरपोर्ट चकेरी में है और सड़क मार्ग से लगभग 12-15 किलोमीटर दूर है. यह विधानसभा क्षेत्र मॉल रोड, कैंट और जाजमऊ तथा चकेरी की ओर जाने वाली सड़कों के माध्यम से शहर के सड़क और सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क से भी जुड़ा है. कानपुर कैंटोनमेंट से उन्नाव की अनुमानित सड़क दूरी 20-25 किलोमीटर, लखनऊ की करीब 80-90 किलोमीटर, अयोध्या की करीब 205-215 किलोमीटर, प्रयागराज की करीब 190-200 किलोमीटर और वाराणसी की करीब 300 किलोमीटर है. आगरा की दूरी लगभग 330-350 किलोमीटर है.
बीजेपी को अतीत में मुस्लिम वोटों के बंटवारे से फायदा मिला है. खास तौर पर हाल के विधानसभा चुनावों में यह एकमात्र प्रमुख दल रहा है जिसने हिंदू उम्मीदवार को मैदान में उतारा, जबकि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दलों ने आम तौर पर मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा. 2017 और 2022 के नतीजे बताते हैं कि इस वोट के बंटवारे ने चुनावी मुकाबले को किस तरह प्रभावित किया है. बीजेपी को उम्मीद होगी कि यह पैटर्न आगे भी जारी रहेगा, हालांकि एसआईआर के कारण मतदाता संख्या में आई कमी ने विधानसभा क्षेत्र में एक नया बदलाव जोड़ा है. अंतिम मतदाता सूची में 2024 के मतदाताओं की तुलना में एक चौथाई से अधिक की कमी हुई है, लेकिन अभी विधानसभा क्षेत्र स्तर पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह तय किया जा सके कि इस हटाए गए मतदाता समूह में किसी खास सामाजिक वर्ग या राजनीतिक दल के समर्थक सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं.
मतदाता आधार में कमी 2027 में मतदान के पैटर्न को भी बदल सकती है, हालांकि यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि इससे मतदान प्रतिशत अपने आप बढ़ जाएगा. बीजेपी के लिए इससे भी बड़ी चिंता यह होगी कि क्या 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की भारी बढ़त विधानसभा चुनाव में भी दोहराई जाती है. इस विधानसभा क्षेत्र का हालिया इतिहास बताता है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदान का रुझान हमेशा एक जैसा नहीं रहा है. कांग्रेस के मजबूत संसदीय प्रदर्शन को 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की जीत और इस सीट पर बीजेपी के लंबे रिकॉर्ड के संदर्भ में देखा जाना होगा.
2027 में कानपुर कैंटोनमेंट का मुकाबला हाल के विधानसभा इतिहास से अधिक अनिश्चित नजर आ रहा है. बीजेपी का इस क्षेत्र में मजबूत संगठनात्मक आधार और लंबा राजनीतिक रिकॉर्ड है. वहीं समाजवादी पार्टी 2027 के चुनाव में मौजूदा विजेता के रूप में उतरेगी और कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में मजबूत संसदीय प्रदर्शन किया है. मुस्लिम वोटों का बंटवारा, संशोधित मतदाता सूची का प्रभाव और 2024 के कांग्रेस वोटों का विधानसभा चुनाव में कितना हिस्सा स्थानांतरित होता है, ये सभी महत्वपूर्ण कारक होंगे. कानपुर कैंटोनमेंट में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अनिश्चितता और कड़े मुकाबले की उम्मीद बनी हुई है.
(अजय झा)
Raghunandan Singh Bhadauriya
BJP
Sohil Akhtar Ansari
INC
Mohammad Shafi
BSP
Moinuddin
AIMIM
Nota
NOTA
Rashid Jamal
AAAP
Devi Prasad
IND
Ashish Shukla
BTSTP
Ramesh
ABHSLP
Mukesh Pal
RSPS
Mohd Meraj
RUC
Jamsed
JNABHNP
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य की कानून व्यवस्था और सुरक्षा को लेकर पिछली सरकारों पर निशाना साधा है. सीएम योगी ने कहा कि 2017 से पहले प्रदेश में आम जनता की आवाज नहीं सुनी जाती थी और अपराधियों को संरक्षण मिलता था. उन्होंने कहा कि आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है. अब अगर कोई अपराध करता है तो उस पर तुरंत कठोर कार्रवाई की जाती है. आज प्रदेश में कोई भी गुंडा टैक्स वसूलने की हिम्मत नहीं कर सकता.
पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने मिर्जापुर के चुनार में घोषणा की कि उनकी नई पार्टी जननीति भारत आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में भाग लेगी. उन्होंने कहा कि पार्टी मजबूत उम्मीदवार मिलने पर सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ी के सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग ने सख्त रुख अपनाया है. जांच के दौरान यह बात उजागर हुई कि बिना किसी फॉर्म 8 के आवेदन के ही 10,000 से अधिक मतदाताओं के नाम और उनके पिता के नाम में बदलाव कर दिए गए. चुनाव आयोग ने इस मामले को केवल एक लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर अपराध माना है. इसके बाद संबंधित अधिकारियों और कंप्यूटर ऑपरेटरों के खिलाफ मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की गई है.
उत्तर प्रदेश में शनिवार को मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है. इस अभियान के तहत प्रदेश के सभी जिलों में सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक विशेष कैंप लगाए गए हैं.
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि प्रदेश में शिक्षक और स्नातक मतदाता सरकार से बुरी तरह नाराज हैं. उन्होंने दावा किया कि जनता ने बड़े पैमाने पर बीजेपी के खिलाफ मतदान करना शुरू कर दिया है. अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि अपनी हार सामने देखकर बीजेपी ने आगरा, फतेहपुर, इटावा, औरैया, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद और नोएडा जैसे कई जिलों में चुनावी धांधली करने की कोशिश की. प्रशासन और अधिकारियों के जरिए वोट डालने से रोकने का प्रयास किया गया, लेकिन जनता सब समझ चुकी है और बीजेपी की हार तय है.
बिजनौर की सियासत में गन्ने की मिठास के साथ जातीय समीकरणों का भी अपना गणित है. आठ विधानसभा सीटों वाले इस जिले में BJP-सपा की लड़ाई, दलित-मुस्लिम वोट और 2024 लोकसभा चुनाव में नगीना सीट पर चंद्रशेखर आजाद की जीत ने सियासी तस्वीर को खास बना दिया. आइए जानते हैं इस जिले की और क्या खासियत है.
बदायूं की पूर्व सांसद संघमित्रा मौर्य को 2024 में BJP ने टिकट नहीं दिया था. इसके बाद उनकी नाराजगी और राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं होती रहीं. पिता स्वामी प्रसाद मौर्य के कांग्रेस के साथ आने के बाद बिल्सी से चुनाव लड़ने की अटकलें तेज हुईं. अब संघमित्रा ने आज तक से बातचीत में BJP छोड़ने की चर्चा खारिज की है.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के साथ सीट बंटवारे को लेकर अखिलेश यादव ने अपना रुख साफ किया है. इटावा के सैफई में मतदान के बाद उन्होंने कहा कि सपा और कांग्रेस दोनों को पता है कि कितनी सीटों पर बंटवारा होना है. उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए दोनों दलों को रास्ता निकालना होगा. हालांकि, अखिलेश ने सीटों की संख्या का खुलासा नहीं किया.
पीलीभीत में वोटर लिस्ट की जांच के दौरान 10 हजार से ज्यादा ऐसी एंट्री मिलीं, जो जरूरी आवेदन के बिना की गई थीं. अब पूरे उत्तर प्रदेश में इसी तरह की गड़बड़ियों की जांच के आदेश दिए गए हैं.
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव रामपुर पहुंचे और जेल में बंद पार्टी नेता आजम खान से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं. रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के छात्रों और एल्युमनी ने इस पूरे घटनाक्रम और असदुद्दीन ओवैसी के हालिया बयानों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है.