पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान से ठीक पहले कोलकाता के 'साइंस सिटी' में एक ऐतिहासिक सैन्य जमावड़ा देखने को मिला. पिछले हफ्ते यहां केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की सभी इकाइयों की एक बड़ी बैठक हुई. इसे लेकर टीएमसी ने केंद्र सरकार को निशाने पर ले लिया है.
इस बैठक में CRPF, BSF, CISF, ITBP और SSB के प्रमुख एक साथ मौजूद थे. भारत के चुनावी इतिहास में यह पहली बार है जब किसी राज्य के चुनाव के दौरान सभी अर्धसैनिक बलों के प्रमुखों ने एक साझा बैठक की हो.
इस बार बंगाल चुनाव में सुरक्षा बलों की तैनाती ने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. राज्य में 2,400 कंपनियां यानी करीब 2.4 लाख केंद्रीय जवान तैनात किए गए हैं. ये किसी भी राज्य के चुनाव में अब तक की सबसे बड़ी तैनाती है.
महुआ मोइत्रा ने साधा निशाना
इसे लेकर TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि गृह मंत्रालय कश्मीर और मणिपुर जैसे संवेदनशील इलाकों से सेना हटाकर बंगाल में तैनात कर रहा है. मोइत्रा ने लिखा, 'प्लीज राष्ट्रीय सुरक्षा का मजाक न बनाएं. बीजेपी और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बंगाल पर मिलिट्री स्टाइल में कब्जा करने का प्लान बनाने के लिए सेना के शीर्ष अधिकारियों को यहां बुलाया है.'
पहले चरण के 3.4 करोड़ मतदाताओं के हिसाब से हर 140 मतदाताओं पर एक केंद्रीय जवान तैनात है. जम्मू-कश्मीर से विशेष बुलेटप्रूफ 'दंगा-रोधी वाहन' भी मंगाए गए हैं. ये तैनाती 2021 के विधानसभा चुनाव (845 कंपनियां) के मुकाबले लगभग तीन गुना ज्यादा है.
साकेत गोखले ने भी लगाया आरोप
टीएमसी नेता साकेत गोखले ने इसे मतदाताओं को डराने की कोशिश बताया है. उन्होंने कहा कि सड़कों पर बख्तरबंद गाड़ियां उतारकर दिल्ली से बंगाल को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है. राजनीतिक विश्लेषक चंद्र कुमार बोस ने भी सवाल उठाया कि क्या राज्य में किसी बड़े टकराव की तैयारी चल रही है?
दूसरी ओर, चुनाव आयोग और CISF का कहना है कि ये बैठक एक 'मजबूत और तकनीक-आधारित' सुरक्षा ग्रिड बनाने के लिए थी. केंद्र सरकार का तर्क है कि बंगाल में चुनावी हिंसा का पुराना इतिहास रहा है, इसलिए इतनी भारी तैनाती जरूरी है.
बंगाल में पहले चरण का मतदान गुरुवार, 23 अप्रैल को होगा, जबकि दूसरा चरण 29 अप्रैल को होने है. वहीं, 4 मई को नतीजे घोषित किए जाएंगे.