पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कई मुद्दे हैं. चुनाव में लोकल से लेकर नेशनल यहां तक की पाकिस्तान-बांग्लादेश से जुड़े मुद्दे भी हैं. यहां तक की SIR को लेकर चर्चा तो बहुत ही बड़ी है लेकिन इस सब के बीच एक शब्द पर खूब राजनीति हो रही है, वो है- 'घुसपैठिया'.
'घुसपैठिया' शब्द हर राजनीतिक चर्चा में है, हर राजनेता के बयानों में है, हर अड्डेबाजी और चुनावी डिबेट में है. 2021 के मुकाबले इस बार नैरेटिव का अहम शब्द 'घुसपैठिया' बन गया है.
2021 और 2026 के विधानसभा चुनावों के बीच 2024 में लोकसभा का चुनाव हुआ. 2021 में बीजेपी बहुत जोर-शोर से प्रचार कर रही थी. कई विशेषज्ञों को लग गया था कि बीजेपी बंगाल पर कब्जा जमा लेगी पर परिणाम एकदम अलग आया. उस वक्त विधानसभा चुनाव में टीएमसी या यूं कहें कि ममता बनर्जी की ओर से बोहिरागत यानी बाहरी का नैरेटिव दिया गया था.
शब्द 'घुसपैठिया' ने आठ चरणों में हुए मतदान के दौरान 2021 में काफी असर दिखाया था. इसी शब्द से बाहरी बनाम बंगाली का नैरेटिव तेज हुआ और बीजेपी को झटका लगा. बंगाली अस्मिता को केंद्र में थी और ममता ये साबित करने में सफल हुई थीं कि बीजेपी बंगाल से बाहर की पार्टी है.
इस बार यानी 2026 में 'घुसपैठिया' शब्द मजबूती से अपनी जगह बना रहा है. डिजिटल न्यूज की भाषा में इसे पॉपुलर कीवर्ड कहा जा रहा है. कई शब्द उर्दू-फारसी से आकर हिंदी-बांग्ला में घुल-मिल गए- वैसे ही राजनीति भी शब्दों के जरिए अपना असर बना रही है. पक्ष हो या विपक्ष सभी इस बार 'घुसपैठिया' पर चर्चा कर रहे हैं.
बंगाल के चुनाव में कैसे हुई 'घुसपैठिया' की एंट्री
2026 के चुनाव के शुरू होने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी ने एक नया शब्द आगे किया, जो था- 'घुसपैठिया'. इसे बांग्ला में 'अनुप्रवेशकारी' कहा जाता है. पर इस बार इस्तेमाल हो रहा है 'घुसपैठिया' शब्द का. ये शब्द सुरक्षा, सीमा और नागरिकता के मुद्दों को मजबूत तेजी से हवा दे रहा है. इसके बहाने बीजेपी एक झटके में बांग्लादेश से गैरकानूनी तरीके से आए घुसपैठियों को प्वाइंट आउट कर रही है.
'घुसपैठिया' शब्द को लेकर रबींद्र भारती विश्वविद्यालय के शिक्षाविद पवित्र सरकार कहते हैं, 'हिंदी और ऊर्दू में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है, दोनों भाषाओं में फारसी शब्द हैं. घुस का मतलब है अंदर जाना और पेठिया का मतलब है जाकर बैठ जाना.' यानी 'घुसपैठिया' का अर्थ हुआ- अंदर घुसकर बैठ जाना.'
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2014 के लोकसभा चुनाव के समय से ही बीजेपी के नेता नेता असम और पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठियों के लिए इस शब्द का इस्तेमाल करते आ रहे हैं. बीजेपी का आरोप है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को बंगाल में अवैध रूप से बसाकर टीएमसी ने मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत किया है.
हालांकि, ममता कई बार कह चुकी हैं कि सीमा की सुरक्षा बीएसएफ के जिम्मे है, अगर अवैध घुसपैठ हो रही है, तो BSF क्या कर रही है? और BSF तो गृह मंत्रालय के अधीन है.
'घुसपैठिया' बनाम 'बाहरी'
दोनों शब्दों में फर्क जरूर है, लेकिन राजनीतिक रणनीति एक जैसी है. बाहरी को आप क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक से अलग कर सकते हैं. जबकि घुसपैठिया सीधे तौर पर नागरिकता का मुद्दा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे शब्द मतदाताओं की सोच को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल होते हैं. हम बनाम वे जितना मजबूत होगा, ध्रुवीकरण उतना बढ़ेगा.
2026 का चुनाव सिर्फ सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि नैरेटिव की लड़ाई भी है. 'बाहरी’' बनाम 'घुसपैठिया'- यही शब्दों की जंग तय करेगी कि बंगाल में किसका संदेश जनता तक ज्यादा गहराई से पहुंच रहा है.
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