पश्चिम बंगाल में चुनाव हमेशा से संवेदनशील माने जाते रहे हैं. लंबे समय तक यहां चुनावी हिंसा, बूथ कैप्चरिंग, राजनीतिक टकराव और मतदाताओं को डराने-धमकाने की घटनाएं सामने आती रही हैं. लेकिन इस बार का चुनाव कई मायनों में अलग रहा. हिंसा न्यूनतम रही, मतदान शांतिपूर्ण हुआ और मतदाताओं ने बिना भय के अपने मताधिकार का प्रयोग किया.
इसके पीछे सबसे बड़ी भूमिका सुरक्षा बलों की रणनीतिक तैनाती और निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार किए गए विस्तृत सुरक्षा ब्लूप्रिंट की रही है. आखिर कैसे इस ब्लूप्रिंट को तैयार किया गया, सुरक्षा बलों ने किस तरह काम किया और क्यों इस बार चुनाव को स्वतंत्र और निष्पक्ष रहा है. आइए पांच बिंदुओं में इन सवालों के जवाब जानते हैं.
1. बंगाल चुनाव: पहले की चुनौतियां, इस बार कुछ नया
पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान हिंसा कोई नई बात नहीं है. अतीत में कई बार बूथ कैप्चरिंग, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच झड़प, फर्जी मतदान, मतदाताओं को डराकर वोट डालने से रोकना, इन घटनाओं के कारण चुनाव आयोग पर लगातार दबाव रहता था कि वह अधिक सख्त और प्रभावी व्यवस्था लागू करे.
2016, 2021 और 2026 चुनावों से तुलना करें, तो इस बार चुनाव हिंसा न के बराबर हुई है. इसके पीछे इलेक्शन कमीशन और सुरक्षा बलों की खास रणनीति रही है. सुरक्षा बलों की तैनाती दो चरणों के चुनाव में की गई थी. करीब 2.5 लाख सुरक्षा बल चप्पे-चप्पे पर तैनात थे. इसकी वजह से चुनावी हिंसा जीरो रही.
इस बार निर्वाचन आयोग ने शुरुआत से ही स्पष्ट कर दिया था कि चुनाव किसी भी कीमत पर निष्पक्ष कराए जाएंगे. इसके लिए कई स्तरों पर तैयारी की गई. माइक्रो-लेवल प्लानिंग के तहत हर जिले, हर विधानसभा और हर बूथ के लिए अलग-अलग सुरक्षा योजना बनाई गई. संवेदनशील बूथों की पहचान की गई.

पिछले चुनावों के डेटा, हिंसा के इतिहास और स्थानीय इनपुट के आधार पर योजना बनाई गई. हॉटस्पॉट चिन्हित किए गए. सूत्रों ने आजतक को जानकारी दी है कि इन्हीं आधारों पर तय किया गया कि किन इलाकों में सबसे ज्यादा हिंसा होती रही है और उसी के अनुसार सुरक्षा बलों की तैनाती की गई.
पहली बार ऐसा देखा गया कि सुरक्षा बलों की बूथ स्तर पर तैनाती की गई. अर्धसैनिक बलों को बड़े स्तर पर लगाया गया. इसके साथ ही पहली बार मार्क्समैन बख्तरबंद गाड़ियां, जो बुलेट प्रूफ थीं, उन्हें जम्मू कश्मीर और दूसरे इलाकों से लाकर तैनात किया गया. इसका मकसद था कि मतदाता बेखौफ होकर मतदान करें.
2. सुरक्षा बलों की भूमिका: ग्राउंड पर असली गेम चेंजर
इस चुनाव में केंद्रीय सुरक्षा बलों ने सबसे अहम भूमिका निभाई. इनमें CRPF, BSF और CISF के जवान प्रमुख थे. दो-दो चरणों के चुनाव में करीब 2.5 लाख से ज्यादा सुरक्षा बलों की तैनाती की गई. इससे यह सुनिश्चित किया गया कि किसी भी तरीके से हिंसा न तो चुनाव से पहले और न ही बाद में हो सके.
चुनाव से पहले ही सुरक्षा बलों ने फ्लैग मार्च और एरिया डॉमिनेशन शुरू कर दिया. इसका असर यह हुआ कि स्थानीय स्तर पर भय का माहौल खत्म हुआ. संवेदनशील बूथों पर केंद्रीय बलों को सीधे तैनात किया गया, जिससे स्थानीय प्रभाव कम हुआ. लगातार पेट्रोलिंग और रूट मार्च से संदेश गया कि कोई गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं होगी.
3. डीजी स्तर की निगरानी: पहली बार हाई-लेवल कंट्रोल
इस चुनाव में एक बड़ा बदलाव यह रहा कि केंद्रीय बलों के शीर्ष अधिकारियों ने खुद मैदान में उतरकर स्थिति का जायजा लिया. CRPF के डीजी जीपी सिंह जैसे वरिष्ठ अधिकारी लगातार पश्चिम बंगाल के दौरे पर रहे. चुनाव प्रक्रिया और नतीजों के दौरान भी वे कैंप करते रहे. इसका असर यह हुआ कि किसी भी स्तर पर कोई बड़ी घटना नहीं हुई.
चुनाव के हर चरण से पहले समीक्षा बैठकें हुईं. जवानों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई जाए. इससे फोर्स का मनोबल बढ़ा और जवाबदेही तय हुई. सिर्फ बल की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं था. इस बार तकनीक का भी व्यापक उपयोग किया गया. लाइव वेबकास्टिंग, CCTV, GPS ट्रैकिंग और ड्रोन सर्विलांस ने चुनाव को पारदर्शी बनाया.

4. सेक्टर और जोन आधारित सिक्योरिटी मॉडल
पहली बार इलेक्शन कमीशन ने इतने बड़े स्तर पर सुरक्षा की तैयारी की थी. पुराने रिकॉर्ड और इतिहास को ध्यान में रखते हुए पूरे राज्य को छोटे-छोटे सेक्टर और जोन में बांट दिया गया. हर स्तर पर एक जिम्मेदार अधिकारी नियुक्त किया गया. इसमें सेक्टर ऑफिसर, जोनल मजिस्ट्रेट और क्विक रिस्पॉन्स टीम शामिल थे.
इस व्यवस्था से किसी भी घटना पर तुरंत प्रतिक्रिया संभव हुई. यदि कहीं भी गड़बड़ी की सूचना मिलती थी, तो QRT तुरंत सक्रिय हो जाती थी. 5–10 मिनट में मौके पर पहुंचना, भीड़ को नियंत्रित करना और मतदान प्रक्रिया को फिर से शुरू कराना, इन सबने सुनिश्चित किया कि चुनाव कहीं भी बाधित न हो.
5. पोस्ट-पोल हिंसा रोकने की खास रणनीति
अक्सर बंगाल में मतदान के बाद हिंसा बढ़ जाती है. इस बार इसे ध्यान में रखते हुए विशेष योजना बनाई गई. 750 से ज्यादा कंपनियों की तैनाती जारी रखी गई. संवेदनशील इलाकों में लगातार पेट्रोलिंग की गई और राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों पर विशेष निगरानी रखी गई. चुनाव सीधे तौर पर सुरक्षा बलों द्वारा संचालित होता है.
लेकिन खुफिया और जांच एजेंसियों का योगदान भी अहम रहा. NIA को अलर्ट पर रखा गया. संभावित साजिशों और संगठित हिंसा पर नजर रखी गई. इनपुट के आधार पर पहले ही कार्रवाई की गई. इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा असर मतदाताओं पर पड़ा. लोगों ने बिना डर के वोट डाला. महिला मतदाताओं की भागीदारी बढ़ी.
ग्रामीण इलाकों में भी शांतिपूर्ण मतदान हुआ. पश्चिम बंगाल के इस चुनाव ने यह साबित कर दिया कि यदि सही योजना, मजबूत इरादा और प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था हो, तो सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी निष्पक्ष चुनाव कराए जा सकते हैं. निर्वाचन आयोग के नेतृत्व में तैयार किया गया सुरक्षा ब्लूप्रिंट और केंद्रीय बलों की सक्रिय भूमिका ने इतिहास रच दिया.