पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की नज़र है. देश के सबसे ताकतवर मुख्यमंत्रियों में से एक ममता बनर्जी लंबे वक्त से यहां सत्ता में हैं, वो पार्टी की प्रमुख भी हैं और सरकार की भी. लेकिन इसके बावजूद एक सवाल जो बार-बार उठता है वो ये कि क्या उनकी पार्टी में महिलाओं को बढ़-चढ़कर प्रतिनिधित्व दिया जाता है या नहीं. पश्चिम बंगाल में अगर राजनीतिक दलों के रिकॉर्ड को देखेंगे तो ऐसा लगता है कि महिलाओं को टिकट देने में पार्टियां काफी पीछे रह जाती हैं.
‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’, जो महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान करता है, आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में लागू नहीं होगा. क्यूंकि यह बिल जनगणना 2027 के बाद लागू किया जाएगा, लेकिन इसके पारित होने से महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर नई उम्मीदें जगी हैं. राज्य की मुख्यमंत्री एक महिला होने के कारण यह सवाल और अहम हो जाता है कि क्या राजनीतिक दल टिकट वितरण में जेंडर बैलेंस की दिशा में ठोस बदलाव करेंगे.
क्या कहता है बंगाल का रिकॉर्ड?
पिछले विधानसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं को टिकट देने के मामले में सभी मुख्य पार्टियां एक-तिहाई से भी काफी पीछे रही हैं. 2011 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 14.2 प्रतिशत टिकट महिलाओं को दिए. भाजपा ने केवल 8 प्रतिशत महिला उम्मीदवार उतारीं. कांग्रेस ने 10.6 प्रतिशत और माकपा (CPI-M) ने 23.8 प्रतिशत टिकट महिलाओं को दिए. CPIM का आंकड़ा सबसे अधिक था, लेकिन वे भी 33 प्रतिशत से काफी कम रहा. साफ है कि कोई भी दल एक-तिहाई प्रतिनिधित्व के करीब नहीं पहुंच सका.
2016 के विधानसभा चुनाव में भी तस्वीर में खास बदलाव नहीं आया. तृणमूल कांग्रेस ने 15.4 प्रतिशत, भाजपा ने 11 प्रतिशत, कांग्रेस ने 9.8 प्रतिशत और माकपा ने 12.8 प्रतिशत टिकट महिलाओं को दिए. चारों दल 33 प्रतिशत के लक्ष्य से दूर रहे और कोई भी पार्टी 20 प्रतिशत तक नहीं पहुंची.
2021 के विधानसभा चुनाव में कुछ दलों ने मामूली बढ़ोतरी की, लेकिन स्थिति अब भी सीमित रही. तृणमूल कांग्रेस ने 16.6 प्रतिशत टिकट महिलाओं को दिए. भाजपा ने 13 प्रतिशत, माकपा ने 15.1 प्रतिशत और कांग्रेस ने केवल 7.6 प्रतिशत टिकट महिलाओं को दिए. एक महिला मुख्यमंत्री के नेतृत्व और महिला सशक्तिकरण के दावों के बावजूद कोई भी दल 25 प्रतिशत का आंकड़ा पार नहीं कर सका.
2011, 2016 और 2021- तीनों विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल की किसी भी प्रमुख पार्टी ने महिलाओं को 33 प्रतिशत टिकट नहीं दिए. 25 प्रतिशत तक पहुंचना भी दुर्लभ रहा है. अब 2026 का चुनाव यह परखेगा कि क्या राजनीतिक दल महिलाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में वास्तविक बदलाव करते हैं या टिकट वितरण का पुराना ढर्रा ही जारी रखते हैं.