SIR से नाम हटाने के मामले को लेकर ममता यदि कोर्ट का रुख करती हैं, तो क्या इससे उनके इस्तीफे में देरी हो सकती है? इस सवाल पर संवैधानिक मामलों के जानकारों का जवाब नहीं है. उनका कहना है कि इस तरह की कानूनी प्रक्रिया का मुख्यमंत्री के इस्तीफे से कोई सीधा संबंध नहीं होता.
संवैधानिक मामलों के जानकार PDT आचार्य के मुताबिक, SIR से नाम हटाने और चुनाव की निष्पक्षता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे केस का भी कोई असर नहीं पड़ेगा. उन्होंने कहा, "यदि बड़े पैमाने पर चुनाव में धांधली के आरोप लगते हैं, तो 'रिट पिटीशन' के जरिए चुनौती दी जा सकती है.''
उन्होंने आगे बताया कि यह एक अलग कानूनी प्रक्रिया है. इसका मुख्यमंत्री के इस्तीफे से कोई लेना-देना नहीं है. उनको संविधान के हिसाब से ही पद छोड़ना होगा. दरअसल, 13 अप्रैल को CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की सुप्रीम कोर्ट बेंच के सामने एक याचिका में दलील दी गई थी.
उसमें कहा गया था कि बड़ी संख्या में वोटरों के नाम हटाए जाने से चुनाव नतीजों पर असर पड़ सकता है. इस दलील ने चुनाव की निष्पक्षता को लेकर नई बहस छेड़ दी. इस पर सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा की थी कि ऐसी स्थिति में विचार किया जा सकता है कि क्या किया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, "जब तक बड़ी संख्या में वोटरों को बाहर नहीं किया जाता या चुनाव पर काफी असर नहीं पड़ता... तब तक चुनाव रद्द नहीं किया जा सकता. यदि 10 फीसदी लोग वोट नहीं डालते हैं और जीत का अंतर उससे ज्यादा है, तो ठीक है, लेकिन 5 फीसदी से कम है, तो गंभीरता से विचार करना होगा."
हालांकि, CJI सूर्यकांत ने इस दलील को महज एक किताबी बहस (Academic Exercise) करार देते हुए खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि यह मुद्दा अभी समय से पहले उठाया गया है, क्योंकि चुनाव के नतीजे अभी आए ही नहीं हैं. इंडिया टुडे से बातचीत में TMC राज्यसभा सांसद मेनका गुरुस्वामी ने अपनी राय रखी.
वरिष्ठ वकील गुरुस्वामी ने कहा कि TMC सभी कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है. हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अभी तक इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है. कुल मिलाकर, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्यमंत्री का इस्तीफा पूरी तरह संवैधानिक प्रक्रिया के तहत तय होगा.
SIR विवाद और उससे जुड़ी अदालती प्रक्रिया अपनी जगह है. दोनों मामलों को आपस में जोड़कर देखना सही नहीं है.