देश के राजनीतिक लिहाज से साल 2026 काफी अहम है. महाराष्ट्री में बीएमसी सहित 29 महानगर पालिका में चुनाव हो रहे हैं तो अगले कुछ महीनों में पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होंगे, जिसमें सभी दलों का कुछ न कुछ दांव पर लगा हुआ है. इन पांचों राज्यों के चुनावी नतीजे भविष्य की दशा और दिशा तय करने वाले हैं, लेकिन बीजेपी के अगुवाई वाले एनडीए और कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्षी इंडिया ब्लॉक दोनों के सामने सियासी चुनौतियां है.
बीजेपी के सामने सिर्फ असम की सत्ता को बचाए रखना ही नहीं बल्कि अपने सियासी विस्तार के लिए खुद को साबित करने का साल है, क्योंकि जिस तरह से कमबैक किया है, उसे बरकरार रखने का चैलेज है. वहीं, भारत जोड़ो यात्रा के जरिए 2024 में पटरी पर लौटी कांग्रेस की गाड़ी साल 2025 में फिर से बेपटरी हुई है. ऐसे में कांग्रेस के सामने फिर से वापसी पटरी पर लौटने के चुनौती 2026 में होगी.
बीजेपी और कांग्रेस ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय दलों के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण 2026 माना जा रहा है. ऐसे में लगातार सिमटते जा रहे वामपंथी दलों के लिए अपने आखिरी सियासी दुर्ग को बचाए रखने की चुनौती होगी. ऐसे में सवाल उठता है कि 2026 में एनडीए और इंडिया ब्लॉक के सामने क्या चुनौतियां होंगी?
बीजेपी के सामने 2026 में क्या चैलेंज है?
बीजेपी के लिए विशेष रूप से नया साल चुनौतियों से भरा है. देश के जिन राज्यों में चुनाव होना है, उसमें सिर्फ असम में बीजेपी की सरकार है और पुडुचेरी में उसके समर्थन से सरकार चल रही है. ऐसे में बीजेपी के सामने असम की सिर्फ सरकार को बचाए रखने की नहीं बल्कि जीत की हैट्रिक लगाने की और पुदुचेरी में एनडीए की अगुवाई वाली सरकार को बनाए रखने की भी चुनौती है.
दस साल से असम की सत्ता पर काबिज बीजेपी के लिए भले ही वापसी की उम्मीद दिख रही हैं, लेकिन उसे इस बार गौरव गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस से कड़ी चुनौती मिलने की संभावना है. ऐसे में कांग्रेस ने अपना दम दिखाया तो बीजेपी का गेम गड़बड़ा सकता है. पुडेचेरी में सियासी हालत ठीक नहीं है और मौजूदा सरकार के लिए रिपीट करना आसान नहीं दिख रहा है.
बंगाल और दक्षिण में होगा असल इम्तिहान
बीजेपी के सामने दक्षिण भारत के केरल और तमिलनाडु में अपनी ताकत साबित करने का अवसर के साथ पश्चिम बंगाल में दशकों से कमल खिलाने की ख्वाहिश को पूरा करने का चैलेंज है. बंगाल में तमाम प्रयासों के बावजूद पार्टी दूसरे नंबर पर ही अटकी हुई हैय ममता बनर्जी ने राज्य की सत्ता पर जिस मजबूती के साथ पकड़ बनाई हुई है, उससे बीजेपी के लिए काफी मशक्कत करनी होगी. बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे को उठाकर बीजेपी जरूर माहौल अपने पक्ष में करना चाहती है, लेकिन मुस्लिम वोटर और बंगाल अस्मिता का ममता दांव काफी भारी पड़ सकता है.
उत्तर भारत की तरह मोदी का जादू दक्षिण के राज्यों में नहीं चल पा रहा है. इसके चलते केरल और तमिलनाडु बीजेपी के लिए अभी भी दूर की कौड़ी बने हुए हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु में तमाम कोशिशों के बावजूद बीजेपी का खाता भी नहीं खुला था. ऐसे में वह यहां गठबंधन सहयोगियों के ही भरोसे है. केरल की दो ध्रुवीय राजनीति में बीजेपी तीसरा कोण बनाने की जुगत में है और तिरुअनंतपुरम के निकाय चुनाव में जीत से एक हौसला जरूर मिला है, लेकिन उसके बाद भी सियासी राह आसान नहीं है.
क्या सत्ता की पटरी पर लौटेगी कांग्रेस की ट्रेन
कांग्रेस के लिए 2026 का साल बीजेपी से भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है. देश के जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उसमें सिर्फ एक ही राज्य में कांग्रेस सत्ता में भागीदार है, वो तमिलनाडु है. ऐसे में कांग्रेस के भले ही खोने के लिए बहुत कुछ नहीं है, लेकिन अगर पांच राज्यों के चुनाव में जीत नहीं सकी तो उसके लिए आगे की सियासी राह काफी मुश्किलों भर हो जाएगी. पुडुचेरी और तमिलनाडु में कांग्रेस के सामने विपक्षी गठबंधन की पुरानी एकता बरकरार रखने की चुनौती है.
असम में वापसी की आस लगाए बैठी कांग्रेस बंगाल में सियासी हाशिए पर खड़ी है और तमिलनाडु में डीएमकी की पिछलग्गू है. कांग्रेस का पूरी संभावना केरल और असम से जुड़ी है. असम, पश्चिम बंगाल और केरल में इंडिया ब्लॉक के घटक दलों के बीच मुकाबला होना है. केरल में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ और वाम दलों की अगुवाई वाले एलडीएफ के बीच ही मुख्य मुकाबला होगा.
कांग्रेस के लिए केरल में समस्याएं कम नहीं हैं. पार्टी में नेतृत्व को लेकर खींचतान पहले से ही बनी हुई है. कांग्रेस की स्थानीय इकाई में गुटबाजी के अलावा प्रदेश नेतृत्व को ताकतवर महासचिव केसी वेणुगोपाल को लेकर भी आशंकाएं कम नहीं हैं कि सत्ता मिलने पर वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हो सकते हैं. इसके चलते केरल में भी चुनौती कम नहीं है, क्योंकि लेफ्ट पुरे जोश के साथ चुनाव मैदान में किस्मत आजमा रही है. पश्चिम बंगाल में टीएमसी का वामदलों और कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन के आसार नहीं दिख रहे.
लेफ्ट और ममता के लिए कैसी होगी चुनौती
वामदलों के लिए 2026 का साल सियासी अस्तित्व को बचाए रखने का है. लंबे समय से बंगाल और त्रिपुरा की सत्ता पर काबिज रहे वामदल अब इन दोनों राज्यों से बाहर हो चुकी है और अब सिर्फ केरल ही बचा है. ऐसे में अगर केरल की सत्ता से भी उनकी विदाई होती है तो लेफ्ट पास कुछ नहीं बचेगा. इतना ही नहीं लेफ्ट के लिए अपने आखिरी सियासी दुर्ग को बचाए रखने की चुनौती है.
वहीं, बंगाल में ममता बनर्जी की भी अग्निपरीक्षा का चुनाव है. पिछले 15 सालों से ममता बनर्जी बंगाल की सत्ता पर काबिज है, लेकिन उस बार बीजेपी उसे सत्ता से बाहर करने के हर एक दांव चल रही है. ऐसे में ममता बनर्जी के लिए सत्ता विरोधी लहर से निपटने और बीजेपी से दो-दो हाथ करने का है. ममता के लिए सिर्फ बीजेपी ही नहीं बल्कि लेफ्ट और कांग्रेस से भी मुकाबला करना होगा.
तमिलनाडु में डीएमके का गढ़ कुछ अभेद्य लगता है, क्योंकि जयललिता के निधन के बाद राज्य में कोई बड़ी चुनौती देने वाला नहीं है. AIADMK दो गुटों में बंट चुकी है और पार्टी में अभी भी खींचतान जारी है, जिसके चलते मुख्यमंत्री स्टालिन का काम आसान बना दिया है. हालांकि, पांच सालों के सत्ता विरोधी रुझान और भाजपा के समन्वित प्रयासों से विपक्षी गठबंधन में नई ऊर्जा स्टालिन के लिए चुनौती बढ़ाने का काम जरूर करेगी. ऐसे में देखना है कि 2026 में कौन अपनी चुनौतियों से पार पाता है?