बहुजन समाज पार्टी के पूर्व नंबर टू और मायावती के बेहद करीबी रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी अब आधिकारिक तौर पर समाजवादी बन चुके हैं. कांग्रेस में घोर उपेक्षा का शिकार होने के बाद उन्होंने अपने लाव-लश्कर के साथ अखिलेश यादव की मौजूदगी में सपा का दामन थाम लिया है.
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अखिलेश यादव के सामने सपा में एंट्री के लिए कोई बड़ी शर्त नहीं रखी है, बल्कि खुद को पार्टी का वफादार नेता के तौर पर पेश किया है. हालांकि, जानकारों का मानना है कि उनकी नजर आने वाले वक्त में सूबे में खाली होने वाली राज्यसभा सीटों पर है.
वहीं, सपा को उम्मीद है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी के आने से यूपी में मुस्लिम वोटों का बिखराव रुकेगा और ओवैसी या चंद्रशेखर आजाद जैसे फैक्टर कमजोर होंगे. समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोटो में किसी तरह का डिस्टरबेंस नहीं चाहती और नहीं चाहती की कोई भी बड़ा मुस्लिम सियासी चहरा इधर उधर जाए जिससे माहौल खराब हो.
'फंड मैनेजर' की भूमिका में होंगे?
नसीमुद्दीन सिद्दीकी की पार्टी में एंट्री को लेकर सपा के भीतर एक और बड़ी चर्चा उनके मैनेजमेंट स्किल्स की है. बसपा में रहने के दौरान वे पार्टी के सबसे बड़े फंड मैनेजर माने जाते थे. चुनाव के वक्त पार्टी के लिए फंड जुटाने और संसाधनों का प्रबंधन करने में उनकी महारत सपा के लिए बड़ा एसेट साबित हो सकती है.ऐसे में अखिलेश यादव के लिए नसीमुद्दीन सिद्दीकी एक अलग भूमिका में हो सकते हैं.
उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, बीजेपी से मुकाबला करने के लिए सपा को फंड की अहम जरूरत है. ऐसे में उन्होंने सपा के लिए अच्छा फंड मैनेजमेंट कर दिया तो अखिलेश यादव के लिए एसेट साबित होंगे. हालांकि मायावती के बाद नंबर 2 माने जाने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी हमेशा काम को अंजाम देने वाले लोगों में रहे हैं, वह चाहे सियासी हो या फिर पार्टी की फक्शनिंग.
मुस्लिम चेहरों की बीच क्या करेंगे सिद्दीकी
नसीमुद्दीन सिद्दीकी को मालूम है कि समाजवादी पार्टी में मुस्लिम चेहरों की पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी यूपी तक भरमार है. मुस्लिम नेताओं की पूरी फौज के बीच ऐसे में उन्हें अगर अपनी जगह बनानी है तो उन्हें कुछ अलग करना होगा. नसीमुद्दीन के बेटे अफजल सिद्दीकी को सेट करना अखिलेश यादव के लिए कोई बड़ी बात नहीं है. एक दो सीटें अखिलेश यादव उन्हें देने में गुरेज नहीं करेंगे, अगर वो सचमुच में सपा के काम के साबित होते हैं तो?
आजम खान का विकल्प बनेंगे सिद्दीकी
नसीमुद्दीन सिद्दीकी के एंट्री केसाथ ही, यह भी कयास लगाए जा रहे थे कि क्या उन्हें सपा के कद्दावर नेता आजम खान के विकल्प के तौर पर लाया गया है? नसीमुद्दीन भले ही आजम खान की तरह मुस्लिम वोट बैंक में सर्वमान्य चेहरा कभी नहीं रहे, लेकिन उनकी अपनी एक अलग पकड़ है. बसपा प्रमुख मायावती जैसी तेवर वाली नेता के साथ करीब तीन दशक तक गुज़ारने के दौरान उनकी राजनीतिक रीढ़ में इतना लचीलापन आ चुका है कि वो सपा में आजम खान के सामने तनकर नहीं खड़े होंगे?
राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो नसीमुद्दीन सिद्दीकी का स्वभाव बेहद विनम्र है. ऐसे में आजम खान के साथ किसी तरह के टकराव के बजाय तालमेल बिठाकर चलने का रास्ता अपनाएंगे. नसीमुद्दीन सिद्दीकी का प्रभाव क्षेत्र भी आजम खान के मुरादाबाद मंडल से अलग है. फिलहाल अखिलेश यादव के सामने चुनौती नसीमुद्दीन के बेटे अफजल सिद्दीकी को सियासी तौर पर सेट करने और नसीमुद्दीन के पुराने समर्थकों को संगठन में जगह देने की होगी.