पश्चिम बंगाल में 4 मई यानी आज विधानसभा चुनाव के लिए वोटों की गिनती शुरू हो चुकी है..यहां राजनीतिक मुकाबला मुख्य तौर पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच केंद्रित है. दोनों दल अपनी-अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं. इस क्रम में हम आपको खास मानी जाने वाली खड़गपुर सदर सीट का हाल बता रहे हैं.
खड़गपुर सदर एक जनरल कैटेगरी का विधानसभा चुनाव क्षेत्र है, जो पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले में है, और मेदिनीपुर लोकसभा सीट के सात हिस्सों में से एक है. 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में यहां बीजेपी से दिलीप घोष, कांग्रेस‑लेफ्ट गठबंधन से डॉ. पापिया चक्रवर्ती, तृणमूल से प्रदीप सरकार,बहुजन समाज पार्टी (BSP) से गोकुल खटिक और (CPIM) से मधुसूदन रॉय मैदान में हैं.
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8.00 AM- घड़ी की कांटे ने जैसे ही 8 बजाएं वोटों की गिनती शुरू कर दी गई.
7.50 AM- हावड़ा के मतगणना केंद्रों पर त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की गई है. हावड़ा मैदान स्थित योगेशचंद्र गर्ल्स स्कूल में बाली, उत्तर हावड़ा और मध्य हावड़ा विधानसभा क्षेत्रों के लिए मतगणना केंद्र बनाया गया है.
6.27 AM- पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए 148 सीटें चाहिए. यह संख्या याद रखें क्योंकि जैसे-जैसे रुझान आएंगे इन्हीं के आधार पर पता चलेगा कि कोई पार्टी बहुमत की तरफ जा रही है या नहीं.
खड़गपुर सदर का चुनावी इतिहास बार-बार नाम और सीमाओं में हुए बदलावों के कारण काफी दिलचस्प रहा है. इस क्षेत्र की पहली विधानसभा सीट 1951 में “खड़गपुर” के नाम से अस्तित्व में आई थी. 1957 में इसका नाम बदलकर 'खड़गपुर लोकल' कर दिया गया और यह दो सदस्यीय सीट बन गई. फिर 1962 में इसे दोबारा एक सदस्यीय सीट बना दिया गया, जो 1972 तक इसी रूप में बनी रही.
1977 में 'खड़गपुर लोकल' सीट को समाप्त कर दिया गया और इसकी जगह दो नई सीटें- खड़गपुर रूरल और खड़गपुर अर्बन बना दी गईं. इसके बाद 2006 में हुए एक और परिसीमन के चलते इन दोनों सीटों को भी खत्म कर दिया गया. 2009 के लोकसभा चुनाव और 2011 के विधानसभा चुनाव के साथ वर्तमान “खड़गपुर” और 'खड़गपुर सदर' सीटों का गठन हुआ.खड़गपुर सदर मूल रूप से एक शहरी विधानसभा क्षेत्र है, जहां के मतदाता खड़गपुर नगर पालिका और खड़गपुर-1 ब्लॉक के रेलवे सेटलमेंट इलाके में रहते हैं.
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2011 के बाद से यहां का चुनावी रुझान काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. 2019 के उपचुनाव समेत लगातार चार चुनावों में कोई भी पार्टी इस सीट को लगातार दो बार जीतने में सफल नहीं रही. 2011 में कांग्रेस के प्रमुख नेता ज्ञान सिंह सोहनपाल ने CPI(M) के अनिल कुमार दास को 32,369 वोटों से हराया था. उस समय कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का गठबंधन था.
2016 में BJP ने मजबूत प्रदर्शन करते हुए दिलीप घोष के नेतृत्व में सोहनपाल को 6,309 वोटों से पराजित किया. उस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही. हालांकि, 2019 के उपचुनाव में दिलीप घोष के लोकसभा सदस्य बनने के बाद सीट खाली हुई, और तृणमूल कांग्रेस के प्रदीप सरकार ने BJP के प्रेम चंद्र झा को 20,853 वोटों से हराकर जीत हासिल की. इसके बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में BJP ने फिर वापसी की, जब हिरण चटर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के प्रदीप सरकार को 3,771 वोटों के अंतर से हराया.
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क्या है खड़गपुर की असली पहचान?
खड़गपुर की पहचान सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सच में ‘मिनी इंडिया’ का रूप लिए हुए है। यहां देश के सबसे बड़े रेलवे वर्कशॉप्स में से एक स्थित है, जो इसकी औद्योगिक अहमियत को दर्शाता है। साथ ही, Indian Institute of Technology Kharagpur जैसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्था भी यहां मौजूद है, जो इसे शैक्षणिक रूप से खास बनाती है।
खड़गपुर में बड़ी संख्या में हिंदी भाषी प्रवासी मतदाता रहते हैं, जिससे यहां की सामाजिक संरचना काफी विविधतापूर्ण हो जाती है। यह इलाका औद्योगिक क्षेत्र और रेलवे टाउनशिप का अनोखा संगम है। इसी वजह से यहां के चुनाव केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति, सामाजिक समीकरण और विभिन्न समुदायों के संतुलन का भी इसमें महत्वपूर्ण प्रभाव देखने को मिलता है।